Monday, March 2, 2026
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1765-1883 : मगध की शान “टिकारी राज किले” में दफन हैं कई ऐतिहासिक राज (पार्ट-3)

टिकारी राज किले के राजा फतेह सिंह के छोटे भाई नेहाल सिंह के बडे़ पुत्र पीताम्बर सिंह को राजा फतेह सिंह की विधवा रानी लग्न कुंअर द्वारा गोद लिए जाने से राजा बने । इस पर बुनियाद सिंह की पत्नी मुर्शिदाबाद कोर्ट में अपना फरियाद पेश की कि उसका पुत्र मित्र जीत सिंह राज का सही हकदार है ।
क्योंकि, नेहाल सिंह से बड़े बुनियाद सिंह थे, इसलिए अंग्रेज जनरल ने उनके पुत्र मित्र जीत सिंह को “अखंड एवं ज्येष्ठ अधिकार नियम के तहत सही राज का हकदार घोषित किया। इस उलझी स्थिति को आपस में समझौता के तहत पीतांबर सिंह को 26 बाबू याना नानकर गाँव और मुकसुदपुर का गैरिसन (सैनिक) किला मिला । मुकसुदपुर राजा चंद्रशेखर प्रसाद नारायण सिंह ने अपनी सारी संपत्ति माता भगवती को रजिस्ट्री के द्वारा समर्पित कर दी । भगवती मंदिर अभी भी सुरक्षित है, किंतु किला ध्वस्त हो चुका है।
1765 ई० में बालक मित्र जीत सिंह को अंग्रेजों की ओर से टिकारी राज का सही हक, जमीनदारी, सनद, खिल्लत तथा राजगी प्राप्त हुई। इन्हें एक सजाया हुआ बास्केट एवं चमकती तलवार अंग्रेजों की ओर से उपहार मे प्रदान की गई । साथ ही बंगाल सुबा में टिकारी राज की मान्यता भी अंग्रेजों ने प्रदान कर दी गई ।
राजा मित्र जीत सिंह बड़े होकर राज को भली-भांति संवारा और टिकारी राज को उन्होंने सुधार के साथ-साथ व्यवस्थित और विस्तार किया। शिरीष कुटुंबा एवं शेरघाटी परगने का अधिकांश भाग और नरहट समाई के कुछ भागों को अपने राज में मिलाया । अरवल, काबर और दादर परगनो में राज को बढ़ाने हेतु हिस्सा खरीदा । रामगढ़ में भी हिस्सेदारी खरीदी । इस प्रकार अपने बुद्धि, विवेक और बल पर काफी संपत्ति अर्जित की । ये प्रजा के हित में अनेक कार्य किए। इन्होंने सिंचाई के उत्तम प्रबंध किये। नहर, नाले,पैइन, जलाशय, आहर, कुएं, धर्मशाला, मंदिर, स्कूल, अस्पताल और सड़कें आदि जगह -जगह पर बनवाए । उन्होंने 1810 ईस्वी से 1814 ईस्वी तक अपने राज्य से नील की खेती को बंद करवा दी । इस प्रकार लोकप्रिय राजा बन गए । इन्होंने किले का भी काफी विस्तार किया । इन्हें दो पुत्र पैदा हुए । एक बड़े पुत्र का नाम हित नारायण सिंह था, जिनका जन्म 1802 ईस्वी में हुआ । दूसरे पुत्र मोद नारायण सिंह हुए, जिनका जन्म 1804 ईस्वी में हुआ ।
महाराजा मित्र जीत सिंह ने अपने बड़े पुत्र हितनारायण सिंह को राज तिलक कर, उन्हें सम्मानित पोशाक दिया, ताकि वे राज्य का राजस्व देने तथा अन्य राज्य कार्य हेतु मुर्शिदाबाद जाया करें । बाद मे महाराजा मित्रजीत सिंह किसी कारण बस अपने बड़े लड़के हित नारायण सिंह से नारुष्ट हो गए और उन्होंने अपने छोटे पुत्र मोद नारायण सिंह को 1819 ईस्वी में पूरा राज बख्शीश कर दिया । तब हितनारायण सिंह ने बिहार के अजीमाबाद (पटना) प्रांतीय कचहरी में एक मुकदमा दायर किया, जो 13 फरवरी 1822 ई० को वह बख्शीशनामा रद्द कर दिया गया । तब दोनों भाइयों और पिता ने मिलकर आपसी समझौता किया,जिसमें सात आना भाग राज का मोदनारायण सिंह को मिला और शेष भाग नौ आना बड़े पुत्र हित नारायण सिंह को मिला और वे राजा बने ।
पिता की मृत्यु 1840 ईस्वी में हो जाने के बाद मोद नारायण सिंह सात आना राज के गद्दी पर बैठे, जो अपनी मृत्यु पर्यंत अर्थात् अट्ठारह सौ सत्तावन (1857) ईस्वी तक राजा बने रहे । इन्हें दो रानियाँ थीं । छोटे भाई की मृत्यु  हो जाने के बाद महाराजा हित नारायण सिंह सात आना भाग की संपत्ति को अपने मुख्य राज में मिला लेना चाहा । किंतु बिहार के अंग्रेज डिप्टी कलेक्टर ने इसे खारिज कर दिया ( Illustred Weekly ,India.11.feb.1981.p.27 ) । बाद में नौ आना राज 1841 ईस्वी में वजूद में आया। तब 1845 ई० में अंग्रेजों ने हितनारायण सिंह को “महाराजा ” घोषित किया ,जो 1863 ईस्वी तक नौ आना राज के राजा बने रहे । ये एक धार्मिक प्रवृत्ति के व्यक्ति थे, किन्तु उनकी पत्नी इंद्रजीत कुंअर काफी बुद्धिमान, तेज  तथा दूरदर्शी महिला थीं । उन्होंने अपने पति की राय से अपना भतीजा राम किशुन सिंह को गोद लिया। इसके बाद स्वयं रानी इंद्रजीत कुंअर तथा भतीजा राम किशुन सिंह दोनों मिलकर रामकिशुन सिंह की पत्नी राज रूप कुंअर को “विल” कर दिया, जिससे रानी राजरूप कुंअर राज की अधिकारीणी बन गईं । रानी राजरूप कुंअर काफी विद्या अनुरागी, धर्म परायण तथा उच्च विचार वाली थीं । उन्होंने अपने राज तथा राज्य से बाहर कई ऐतिहासिक एवं धार्मिक कार्य करवाये, उनमें टिकारी में टिकारी राज हाई स्कूल की स्थापना, टिकारी का राज अस्पताल तथा टिकारी नगरपालिका का निर्माण कार्य सर्वप्रथम है ।
उसके बाद उन्होंने धर्म के क्षेत्र में अयोध्या में ‘रसिक निवास’ तथा वृंदावन में ‘ठाकुरबाड़ी’ बनवाए । अपने जीवन काल में ही ये दोनों राम किशुन सिंह और उनकी पत्नी रानी राजरूप कुंअर अपनी एकमात्र पुत्री राधेश्वरी कुंअर को अपना राज  “विल “कर दिया, जिससे अब राज का अधिकारिणी उनकी पुत्री राधेश्वरी कुंअर हो गई । राम किशुन सिंह वर्ष 1875 ई० के अक्टूबर माह में स्वर्ग सिधारे, बाद में महारानी इंद्रजीत कुंअर भी 26 जनवरी 1878 को स्वर्ग सिधारीं । महारानी राजरूप कुंअर ने अपनी उत्तराधिकारिणी पुत्री राधेश्वरी कुंअर ( किशोरी मैंइया ) का विवाह मुजफ्फरपुर निवासी अंबिका प्रसाद सिंह उर्फ बाबू साहेब के साथ किया, जिनसे 1883 ईस्वी में एक पुत्र पैदा लिया, जो बाद में महाराजा कैप्टन गोपाल शरण सिंह से प्रसिद्ध हुए ।
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