Sunday, March 1, 2026
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पितृपक्ष मेला स्थगित करने के विरोध में गया पाल पंडा समाज एवं श्री विष्णुपद मंदिर प्रबंधन समिति

 राज्य सरकार तथा स्थानीय प्रशासन ने कोरोना की वजह से गया में पितृपक्ष के दौरान

पिंड दान, तर्पण और श्राद्ध पर लगायी रोक 

गया पाल पंडा समाज तथा श्री विष्णुपद मंदिर प्रबंधन समिति एवं पास के दुकानदारों ने राज्य सरकार तथा जिला प्रशासन द्वारा शारीरिक दूरी का हवाला देकर मंदिर तथा पितृपक्ष मेले को इस वर्ष स्थगित कर देने के निर्णय का विरोध  करते हुए 31 अगस्त से पिंड दानियों की सुविधा को ध्यान में रखते हुए पितृपक्ष मेले तथा मंदिर को खोलने का निर्णय लिया है । नगर निगम मेयर, उप मेयर एवं मंदिर समिति के सदस्यों की एक विशेष बैठक निजी होटल में की गई और इस बात का निर्णय लिया गया । उपस्थित लोगों का कहना था कि एक तो 5 महीने से लॉकडाउन के कारण पंडा समाज तथा दुकानदारों के बीच आर्थिक तंगी की स्थिति बन गई है, वहीं दूसरी ओर एक पखवारे के पितृपक्ष मेले को भी बंद कर पिंड दानियों तथा पंडा समाज के सामने आर्थिक, सामाजिक एवं धार्मिक भावना पर कुठाराघात किया गया है ।

बिहार टूर एण्ड ट्रैवल्स के अध्यक्ष तथा गया के वरिष्ठ पंडा गोपाल लाल महतो का कहना है कि जब सरकार बद्रीनाथ, वैष्णो धाम, वाराणसी आदि के मंदिरों को तीर्थ यात्रियों के लिए कोविड-19 के भयावह हालात रहने के बावजूद भी खोलने की अनुमति दे रखी है। फिर देश – विदेश से अपने पूर्वजों को मोक्ष दिलाने हेतु आने वाले तीर्थ यात्रियों को मंदिर तथा पितृपक्ष मेले में आने के लिए इस वर्ष शारीरिक दूरी का हवाला देकर मेले को क्यों बंद कर दिया गया है ।

गया विष्णुपद में विष्णु-चरण एक वेदी है और अन्य 45 बेदियां हैं, जहां प्राणी अपने पितरों को आवागमन से मुक्ति दिलाने हेतु इसी पितृपक्ष मेले में पिंड दान, तर्पण और श्राद्ध करने आते हैं । यह परंपरा सदियों से चली आ रही है । इस परंपरा पर प्रतिबंध लगाना पिंडदानी तथा हिंदू धर्मावलंबियों के आस्था पर कुठाराघात एवं अन्याय पूर्ण है ।

श्राद्ध का आरंभ एवं स्वर्ग- नरक की धारणाओं का विकास वैदिक काल की समाप्ति से माना गया है । यम को मृतकों का राजा तथा स्वर्ग का दयालु शासक माना गया है । यम ही पितरों की आत्मा को आनंद लाभ कराते हैं ।

गया विष्णु धाम में पिंड दान व श्राद्ध कर्म कराने से अच्छे फल की प्राप्ति होती है । माना जाता है कि इससे 20 पुरखों का उद्धार होता है । यही कारण है की भारत के समस्त वैष्णव मंदिरों में सर्वाधिक पवित्र गया का विष्णुपद मंदिर को माना गया है । प्रसिद्ध पुराविद् बुकानन ने यहां 45 ऐसे वेदियों की सूची दी है, जहां पहले मराठे और धनिक बलि चढ़ाने आते थे। आर्किलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार 10 वीं शताब्दी में एक शिलालेख अक्षय वट के पास मिला है जिसके अनुसार उस समय यह स्थान यात्रियों के लिए एक पवित्र बेदी के रूप में पूजित था । वहीं चीनी यात्री हेनसांग के अनुसार उन्होंने अपने यात्रा वृत्तांत में गया को एक हिंदू शहर बताया है ।

18वीं सदी में इंदौर की महारानी अहिल्याबाई ने जयपुर के कुशल कारीगरों द्वारा विष्णुपद मंदिर का निर्माण प्रस्तर खंड की अष्टकोणीय सूची स्तंभीय भव्य विशाल मंदिर का निर्माण करवाई थी, जिसका गज मंडल 58 फीट चौड़ा तथा मंदिर की ऊंचाई 100 फीट है । गया में पिंडदान का कार्य पवित्र फल्गु नदी, जो प्राचीन जमाने में महानदी, मलय, सुमागधी ,अन्तः सलीला आदि नामों से जानी गई, वही जलधारा के रूप में आदि गदाधर को माना है । वहां स्नान कर 45 बेदियों पर पिंडदान करने तथा गया गदाधर को दर्शन करने का विधान है, जिससे पिंडदानी के सात पुरखों पीछे तथा सात पुरखों आगे का उद्धार होता है । पुष्करे तु कुरुक्षेत्रे गंगामां मगधेषु च । स्नातवा तारयते  जंतु सप्र सप्तावशंस्तवा ।। कूर्म पुराण में गया तीर्थ को महातीर्थ कहा गया है ।

मत्स्य पुराण के अनुसार पितृतीर्थ गया को सभी तीर्थों में श्रेष्ठ और शुभ माना है । इसकी पुष्टि अन्य ग्रंथों में भी की गई है । कहा गया है- पिता स्वर्ग ,पिता धर्म ,पितात्रि परम तप:। अग्नि पुराण में वर्णन है कि गया धाम में साक्षात विष्णु ही पित्रृ रूप में विराजमान हैं । पितरों के तर्पण पूजन तथा श्राद्ध आदि से देवता और पिता दोनों ही प्रसन्न होते हैं तथा प्राणी को तीनों ही ऋणों से मुक्ति मिल जाती है ।

श्राद्ध शब्द श्रद्धा से बना है । यों तो श्राद्ध -कर्म तथा पितर पूजा यहाँ सालों भर चलता रहता है, किंतु पितृपक्ष में मान्यता है कि सभी पितर अपने पुत्रों से श्राद्ध एवं तर्पण हेतु विष्णुपद पधारते हैं और इन दिनों पितरों को तर्पण व श्राद्ध करने से पितर मोक्ष को प्राप्त करते हैं तथा उन्हें आवागमन से मुक्ति मिल जाती है और वे स्वर्ग को प्राप्त करते हैं ।

गया तीर्थ में फिलहाल 45 बेदियां मुख्य हैं। उनमें विष्णुपद, रामशिला, प्रेतशिला, गया सिर, सीता कुंड ,मुंड पृष्ठा, कनखल, भीम गया, जिह्वा लोल, ब्रह्म कुंड, ब्रह्मसरोवर, रामगया, धर्मारण्य, काकवली, मतंग वापी, सोलह वेदी, आदिगदाधर, अक्षय वट आदि प्रमुख हैं ।

जगन्नाथ मिश्र के कार्यकाल में विष्णुपद मंदिर को लेकर विवाद खड़ा हुआ था, तब मामला सुप्रीम कोर्ट तक गया था ।

सुप्रीम कोर्ट में मंदिर समिति की ओर से यह दलील पेश की गई थी कि यह मंदिर अन्य मंदिरों की तरह नहीं है । विश्व में यह अकेला मंदिर है जिसमें विष्णु चरण एक पवित्र वेदी के रुप में पूजित है। सुप्रीम कोर्ट ने पंडा समिति के इस दलील को स्वीकार करते हुए मंदिर के पक्ष में फैसला दिया था और तब से यह विष्णुपद मंदिर एक बेदी के रूप में पूजित है ।

गया पाल पंडा समाज तथा श्री विष्णुपद मंदिर प्रबंधन समिति का कहना है कि, राज्य सरकार तथा स्थानीय प्रशासन ने पितृपक्ष मेले तथा विष्णुपद मंदिर को पूजा, अर्चना, श्राद्ध, तर्पण, पिंडदान आदि जैसे हिंदुओं के धार्मिक अनुष्ठान को बंद करने का आदेश दिया है वह अनुचित है । अतः राज्य सरकार तथा स्थानीय प्रशासन को जनहित में बंद रखने के आदेश को वापस लेना चाहिए |

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