
धर्म का मूल आधार सत्कर्म, सद्विचार और परोपकार है
पूजा-पाठ, व्रत, उपवास, तीर्थयात्रा और धार्मिक परंपराओं का अपना महत्व है। ये मनुष्य की आस्था को अभिव्यक्त करने और आत्मिक अनुशासन विकसित करने के माध्यम हो सकते हैं। किंतु इनका वास्तविक महत्व तभी सार्थक होता है, जब इनके प्रभाव से व्यक्ति के विचारों और व्यवहार में सकारात्मक परिवर्तन दिखाई दे।










