
“बुद्ध पूर्णिमा” बौद्ध जगत में परम् पावन और श्रेष्ठ माना जाता है,क्योंकि भगवान बुद्ध का जन्म, संबोधिज्ञान और महापरिनिर्वाण ये तीनों घटनाएं बुद्ध के जीवन काल में आज ही के दिन वैशाख पूर्णिमा को घटित हुई थी। अतएव यह दिवस आदिकाल से अति पवित्र दिवस के रुप में “बुद्धजयंती” और “बुद्ध पूर्णिमा” के नाम से ज्यादा प्रसिद्ध रहा है। विश्व में बुद्ध के सारे बौद्ध स्थल आज बुद्धं शरणं गच्छामि,धम्मं शरणं गच्छामि, संघम शरणम् गच्छामि से गुंजायमान हो उठे हैं। 623 ई.पूर्व में वर्तमान नेपाल स्थित कपिलवस्तु के राजा शुद्धोधन की रानी महामाया के गर्भ से भगवान बुद्ध का जन्म दो साल वृक्षों के नीचे लुम्बिनी उद्यान में हुई थी। राजा को पुत्ररत्न की प्राप्ति के अर्थ की सिद्धि हुई, इस कारण बालक का नाम “सिद्धार्थ” रखा गया। राजा ने बालक का भविष्य जानने के लिए बड़े-बड़े सिद्धियों, पंडितों और ज्योतिषियों को बुलाया।
सिद्धियों में सर्वश्रेष्ठ कालदेवल ने तो इस बालक को देखते ही यह कह डाला कि यह बालक बड़ा होने पर “सम्बोधि संबुद्ध” बनेगा। पहले तो कालदेवल ने बालक को देखते ही हंसे, फिर रो पड़े। यह देख राजा बहुत चिंता में पड़े और पूछा–महाराज! कि क्या बालक को कोई अनिष्ट होने वाला है ? नहीं, राजन! यह बालक बड़ा होकर ज्ञान को प्राप्त करेगा और “बुद्ध” बनेगा। मैं पहले इसलिए हंसा, क्योंकि मुझे यह सौभाग्य प्राप्त हुआ कि इस बालक के मुझे दर्शन हो गए और अब रो इसलिए रहा हूं कि जब यह बालक बुद्धत्व की प्राप्ति कर अपने ज्ञान को विश्व में बांटेगा तब मैं जिन्दा नहीं रहूंगा। अन्य ज्योतिषी ब्राह्मणों और विद्वान कौण्डिन्य ने भी इसी प्रकार की भविष्यवाणी की।
सिद्धार्थ सत्य की साधना में शाक्य मुनि बनकर छह माह तक भटकते रहे। यह काल बुद्ध का “आर्य पर्येषण काल” कहलाता है। उन्तीस वर्ष कीअवस्था में गौतम ने गृह त्याग किया था, यह गौतम का “महानिष्क्रमण काल” कहलाता है। इस बीच उन दिनों उत्तर भारत के प्रसिद्ध गुरु ‘अलार कलाम’ और ‘उद्दक रामपुत्र’ के पास पहुंचकर उन्होंने “योग” की शिक्षा ग्रहण की, फिर भी उन्हें जरा-मरण का उपाय नहीं मिला। तो फिर वे निरंजना नदी के तट पर समाधि लगाकर एक वृक्ष के नीचे बैठ गए,जहां उन्होंने कठिन “सद्व्रतिका व्रत” को ठान कर अपने शरीर को कृशकाय बना लिया। तब सेनानी ग्राम की एक ‘सुजाता’ नाम की बाला ने जिस वृक्ष के नीचे बैठकर वे तपस्या में लीन थे, वहां उन्हें “वृक्ष देवता” समझकर सोने की थाल में “पायस” लाकर अर्पित की और सखियों के साथ प्रदक्षिणा करते हुए गीत गायी, जिसके बोल के अर्थ थे कि “वीणा के तार को इतना न कसो कि वह टूट जाय और इतना ढीला भी न छोड़ो कि वह बजे ही नहीं”, अर्थात् “मध्यम मार्ग” का अनुसरण करो। यह सुनते ही उनका ध्यान टूटा और वे निरंजना नदी में स्नान कर सुजाता के अर्पित पायस को ग्रहण किया। कहा जाता है कि उस खीर को खाने के बाद वे बोधिमंड की ओर बढ़े और अन्दर पीपल वृक्ष के नीचे बैठकर ध्यान लगाया, जहां उन्हें “ज्ञान” की प्राप्ति हो गई अर्थात वे “संबोधि सम्बुद्ध” बन गये।
वह स्थल “बुद्ध गया” कहलाया और सिद्धार्थ गौतम “बुद्ध” कहलाए तथा जिस पीपल वृक्ष के नीचे उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई वह “बोधि वृक्ष” कहलाया। आज उसी बोधि वृक्ष के नीचे महाबोधि मंदिर परिसर में बुद्ध जयंती बुद्ध-पूर्णिमा पर्व बड़े उत्साह के साथ मनाया गया। इस अवसर पर विभिन्न देशों से सबड़ी संख्या में बौद्ध श्रद्धालुओं ने आकर बीटीएमसी की ओर से आयोजित भव्य पूजा परिसर में ध्यान लगाकर पूजा-अर्चना की,दीप जलाए तथा विश्व शांति की कामना की। इस समारोह में जिला पदाधिकारी सह बीटीएमसी के सभी सदस्य गण एवं समारोह को संचालन कर रहे डॉक्टर कैलाश प्रसाद और मुख्य अतिथि के रूप में विधानसभा अध्यक्ष डॉक्टर प्रेम कुमार तथा केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी जी उपस्थित रहे।
वहीं राज्य के मुख्यमंत्री बनने के बाद पहली बार सम्राट चौधरी गया पहुंचे और महाबोधि मंदिर एवं बोधगया मठ में पहुंचकर पूजा अर्चना की। सम्राट चौधरी ने गयाजी और बोध गया के प्रमुख स्थलों का दर्शन किया और कारिडोर का जायजा लिया। वे शंकराचार्य मठ के मुख्य गद्दी परिसर पहुंचकर माता वाराही देवी व अन्नपूर्णा देवी तथा अन्य देवी देवताओं का दर्शन किया एवं वहां पड़े अनेक प्राचीन बुद्ध मूर्तियों का अवलोकन किया। उन्होंने शंकराचार्य मठ में सनातन परंपरा के योगदान की चर्चा करते हुए मठ के योगदान की सराहना की।
उन्होंने कहा कि भारत में वर्षों से आक्रांता आते रहे हैं और भारत पर प्रहार करते रहें हैं,लेकिन भारत कभी समाप्त नहीं हुआ। सनातन समाज के लोग सबसे अधिक सहनशील होते हैं, इससे आक्रांताओं को भी कड़ा जवाब मिलता रहा है। नालंदा विश्वविद्यालय को आक्रमण कर जब जलाया था, तो उसमें 90 लाख पुस्तकें थी,जो 6 महीने तक जलती रही थी। जब प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी नालंदा विश्वविद्यालय को पुनर्स्थापना करने आए थे, तो कहा था कि नालंदा विश्वविद्यालय के इस पुराने खंडहर को बचाकर रखना है। ताकि हम दुनिया को दिखा सके कि हम लोग कितने सहनशील हैं और यह वही विश्वविद्यालय है जहां विदेश से लोग शिक्षा ग्रहण करने आते थे।
गौतम बुद्ध ने शांति का संदेश दिया था। मगध सम्राट अशोक ने अपने बेटा-बेटी को बौद्ध धर्म के प्रचार प्रसार के लिए श्रीलंका तथा अन्य देशों में भेजा था, जिससे विश्व में शांति स्थापित हुई थी। मुख्यमंत्री भारतीय परंपरा में धार्मिक समन्वय विषय पर आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी को संबोधित करते हुए ये बातें कहीं। बोधगया मठ में आयोजित सभा के संबोधन क्रम में सम्राट चौधरी ने 20 मिनट के अपने संबोधन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का कई बार नाम लिया और उनके कार्यों के प्रशंसा की और कहा कि उनके बताएं रास्ते पर हमने चलने का संकल्प लिया है, उसे मैं पूरा करुंगा।उन्होंने कहा प्रधानमंत्री और पूर्व मुख्यमंत्री सबके हितों का ध्यान रखकर काम करते रहे हैं।
किसी के साथ भेदभाव नहीं किया है। हमारी सरकार भी किसी के साथ कोई भेदभाव नहीं करेगी। साथही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश को और पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बिहार को समृद्ध बनाने के लिए बहुत सारे काम किये हैं। मैं भी उनके कार्यों की प्रशंसा करता हूं और बिहार को विकसित और समृद्ध करने का कार्य करूंगा। उन्होंने जो बिहार को संवारने का मुझे दायित्व सौंपा है, उस संकल्प पर मैं खरा उतरने की कोशिश करूंगा।
बीटीएमसी द्वारा मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को अंग वस्त्र,खादा और प्रतीक चिन्ह भेंट कर भव्य रूप से सम्मानित किया गया। संपूर्ण बोधगया बौद्ध पताकों से सुसज्जित तथा बुद्धम् शरणं गच्छामि, धम्मम् शरणं गच्छामि, संघम् शरणं गच्छामि के नारों से गुंजायमान रहा।




