Monday, March 30, 2026
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Homeकला संस्कृतिविश्व रंगमंच दिवस : "अभी नहीं-कभी नहीं" मगही नाटक का सफल मंचन

विश्व रंगमंच दिवस : “अभी नहीं-कभी नहीं” मगही नाटक का सफल मंचन

बिहार के गया जिला अंतर्गत “कला-ज्योति संस्कारशाला” के बैनर तले प्रख्यात रंगकर्मी ‘शंभू सुमन’ द्वारा रचित व निर्देशित “अभी नहीं कभी नहीं” मगही नाटक का अभूतपूर्व मंचन कर कलाकारों ने दर्शकों व श्रोताओं का दिल जीत लिया। इसे लोगों ने भरपूर प्रशंसा की और श्री शंभू सुमन को खूब बधाइयां दी। यह नाटक चूंकि वर्तमान में मोबाइल से बच्चों पर पड़ रहे प्रभाव एवं दुरुपयोग पर आधारित नाटक होने के कारण यह लोगों को बहुत पसंद आया।

वर्तमान युग में युवा तथा नई पीढ़ी के बच्चे और बच्चियां चूंकि विशेष कर मोबाइल देखने में दिन-रात व्यस्त रहती हैं, वह उन्हें बर्बादी की ओर घसीट रही है। प्रतिदिन लोग इसके माध्यम से ठगी के शिकार पढ़े-लिखे लोग भी हो रहे हैं।अनेकों ऐसे उदाहरण हैं जो लोग ठगी के शिकार होकर अपने प्राणों तक दे देते हैं अथवा बहुत बड़ी राशि उन्हें चुकाना पड़ता है। वे अनेक तरह के प्रलोभन मोबाइल के माध्यम से देकर उन्हें अपनी जाल में फंसा लेते हैं और वे उसके शिकार हो जाते हैं। आज का यह मंचन लोगो को मोबाइल के माध्यम से होने वाले दुष्परिणामों से न केवल आगाह किया वल्कि उनकी आंख की पट्टी ही खोल दी।

अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त रंगकर्मी श्री शंभू सुमन ने विश्व रंगमंच दिवस के अवसर पर नाट्य शास्त्र के प्रख्यात रचयिता भरत मुनि रचित “नाट्यशास्त्र” पर विशेष प्रकाश डालते हुए भारतीय रंगमंच के इतिहास में नाटक तत्वों की उत्पत्ति का इतिहास को भी बतलाया। उन्होंने यह भी बताया कि इसमें “नृत्य” भारतीय रंगमंच की प्रथम इकाई है। इसकी पुष्टि प्राग्-ऐतिहासिक चित्र दीर्घाओं, विशेषतया प्रस्तर गुफाओं और शैलाश्रयों में चित्रित रुप में मिलती है,जो प्रस्तर सतहों पर श्वेत अथवा हेमेटाइट-पेंटिंग्स के रूप में बड़ी संख्या में प्राप्य हैं।

उन्होंने यह भी बताया कि ईसापूर्व गुफा वासियों यानी आदिमानव के साथ आरंभ हुआ, वह भारतीय रंगमंच ईसापूर्व दूसरी शताब्दी में संस्कृत रंगमंच का रूप ले लिया,जो धार्मिक और अभिजात वर्ग के लोगों द्वारा ही प्रदर्शित करने का एकमात्र माध्यम बना रहा। इसके बाद आधुनिक युग में 17 वीं व 18वीं शताब्दी में रंगमंच धीरे-धीरे प्रख्यात कला के रूप में विकसित हुआ, जो “भारतीय-शास्त्रीय नृत्य-नाटक” के रूप में अभिहित हुआ और वह काफी लोकप्रिय हुआ।
“इस प्रकार हम पाते हैं कि ‘नाटक’ अपने आप में एक पूर्ण विधा है,जिसमें गीत, संगीत, संवाद और अभिनय सभी एक साथ रंगमंच पर होते हैं।”

इस अवसर पर पॉलिटेक्निक कॉलेज गया की प्राध्यापिका श्लोनी अक्षिता ने भरत मुनि के “नाट्य शास्त्र” पर प्रकाश डालते हुए बताया कि_” पुरुषों की नकल और उनकी लोकावृति यानी उनके कार्य ‘नाट्यशास्त्र’ को तकनीक अथवा कला को विकसित करने का सफल प्रयास किया है।एक व्यवस्थित तरीके से “नाटक” को जन्म दिया है।” वहीं इस अवसर पर वार्ड काउंसलर श्रीमती ने श्री शंभू सुमन द्वारा बच्चों में स्वत प्रस्फुटित कला को शास्त्रीय रूप दिलाने में बहुत बड़ी भूमिका निभाई है। इन्हें जितना भी धन्यवाद दूं वह कम होगा। इससे पूरा गया जिला ही नहीं वल्कि पूरा बिहार गौरवान्वित हुआ है। इन्हें मैं हृदय से धन्यवाद देती हूं।

इस अवसर पर संस्थान की ओर से अंग वस्त्र देखकर सम्मानित किया गया, वहीं सभी कलाकारों को भी प्रशस्ति पत्र और मोमेंटम देकर उन्हें सम्मानित किया गया। रंगमंच में भाग लेने वाली कलाकारों में दीपिका कुमारी, शिल्पा कुमारी, विद्या कुमारी, युवराज नंदन, आराध्या, विनायक, कश्यप कुमारी, शताक्षी आदि प्रमुख हैं।

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