Sunday, March 1, 2026
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पितरों का पर्व पितृपक्ष : पुन्नाम नरकात त्रायते इति पुत्र:

“पितरि प्रीतिमापन्ने प्रियंते सर्व देवता”

पितरों का पर्व पितृपक्ष आश्विन मास या कुंवार मास के कृष्ण पक्ष में 15 दिनों का होता है किंतु पितृ पक्ष की गणना जब भाद्र शुक्ल चतुर्दशी से मानी जाती है तब पितृपक्ष 17 दिनों का होता है। गयाजी में यह पर्व पूर्वजों के उद्धार के लिए अति पवित्र तीर्थ के रूप में प्रसिद्ध है जहां कोई भी व्यक्ति पवित्र मन से श्राद्ध कार्य संपन्न करता है ,उसे अश्वमेध यज्ञ करने का फल मिलता है ।उनके पितृगण सीधे स्वर्ग को जाते हैं । सच्चे अर्थों में वही पुत्र पिता का होता है जो अपने पितरों को नर्क से रक्षा करता है । “पुन्नाम नरकात त्रायते इति पुत्र:।” सामान्यतः मनुष्य अपने जीवन काल में अच्छे और बुरे कर्मों को करता है। मान्यता है कि पुण्यात्मा मनुष्य योनि अथवा देवयोनि को प्राप्त करता है, वहीं पापात्मा कीट ,पतंग ,पशु-पक्षी आदि योनियों में भटकता है ।

भारतीय संस्कृति में मात्रृ- पितृ ऋण से मुक्ति होने के लिए श्राद्ध को आवश्यक बतलाया है । शास्त्रों में पुत्र के लिए तीन बातें मुख्य बताई गई हैं -पहला जीवित अवस्था में माता पिता की आज्ञा का पालन करना । दूसरा गया में पिंड दान करना और तीसरा उनके निमित्त ब्राम्हण , दरिद्र आदि असहाय को भोजन और दान करना । यों तो गयाजी में सालों भर पिंडदान ,श्राद्ध ,तर्पण आदि करने का विधान है, किंतु पितृपक्ष में श्राद्ध करने का विशेष महत्व माना गया है ।
” पितृ तीर्थ गयानामं, सर्वतीर्थं वरम् शुभम् ।”

इस अवधि में सभी पितृगण गयाजी में पिंडदान , श्राद्ध, तर्पण आदि के लिए अपने पुत्रों वंशजों से विशेष आकांक्षा रखते हैं। गयाजी में श्राद्ध करने में कोई काल सीमा नहीं है। यहां किसी भी समय आकर श्राद्ध कार्य संपन्न किया जा सकता है ।तिथियों के श्राद्धों में 16 दिनों का श्राद्ध तथा सभी महीनों में आश्विन मास का श्राद्ध सर्वोत्तम माना गया है । इसके अलावा चैत्र मास में भी श्राद्ध करने का विधान है । संपूर्ण दिनों के श्राद्ध में 54 वेदियों पर पिंडदान , तर्पण आदि करने का विधान है । अकाल मृत्यु के कारण जो प्रेत योनि में जिस प्राणी की आत्मा भटकती रहती है उसकी आत्मा की मुक्ति गयाजी में ही श्राद्ध कार्य संपन्न करने से होती है । अज्ञात तिथि वाले प्राणी के लिए श्राद्ध अमावस्या को करने का विधान है ।
श्राद्ध के बारे में कहा गया है कि प्रेत और पीतर के निमित्त उनकी आत्मा की शांति के लिए श्रद्धापूर्वक जो अर्पित किया जाता है वही “श्राद्ध” है ।

कहा जाता है कि मृत्यु के बाद “दशगात्र” और “षोडशी” सपिंड दान तक मृत व्यक्ति की प्रेत संज्ञा रहती है। सपिंडन के उपरांत ही वह पितरों में मिलती है। शतपथ ब्राह्मण में वर्णित है कि वर्ष की गृष्म, बसंत और वर्षा ऋतु ये तीनों ऋतुएं देवताओं की होती हैं, वहीं शरद, हेमंत और शिशिर ऋतु को पितरों की ऋतुएं मानी गई है। इसमें एक माह पितरों के लिए एक दिन माना जाता है। इस प्रकार पितृलोक की दृष्टि से हमारा 15 दिन उनका 1 दिन और शेष 15 दिन उनकी एक रात्रि होती है । शुक्ल पक्ष की अष्टमी से लेकर कृष्ण पक्ष की अष्टमी तक पितरों का 1 दिन होता है, उसमें जो अमावस्या पड़ती है वह पितरों के लिए दिन का मध्य भाग होता है । इस कारण प्रति अमावस्या को मध्यान्ह में श्राद्ध कर्म करने का विधान है जो – “दर्श- श्राद्ध” कहलाता है। पितरों की आराधना दो प्रकार से की जाती है -एक तिल अर्पण अर्थात जल के साथ तेल मिलाकर पितरों के नाम से जल को छोड़ना, जिसे “तिलांजलि” कहते हैं । दूसरा प्रकार हवन कर्म के साथ होता है- इसमें पितरों के लिए हवन कुंड में अन्न,घी आदि के साथ मंत्रोच्चारण के साथ डाल कर की जाती है- इसे “पार्वण- श्राद्ध” कहते हैं।

प्रत्येक वर्ष 13 ऐसे भी विशेष दिन होते हैं जिसमें पितरों के लिए श्राद्ध करना ज्यादा फलदायक माना गया है- उनमें है प्रति मास की अमावस्या तिथि, दूसरा एक राशि से दूसरी राशि में सूर्य संक्रांति का समय, सूर्य ग्रहण, चंद्र ग्रहण, माघ मास का कृष्ण अष्टमी आदि। कहा गया है कि पितरों के प्रसन्न होने पर सारे देवता प्रसन्न हो जाते हैं । “पितरि प्रीतिमापन्ने प्रियंते सर्व देवता” । अश्विन मास की कृष्ण प्रतिपदा से लेकर अमावस्या तक 15 दिनों में जो तिथियां आती हैं उनमें कुछ खुफिया सूत्रों के लिए विशेष महत्व के श्राद्ध के लिए मानी गई हैं आश्विन कृष्ण प्रतिपदा यह नाना नानी के श्राद्ध हेतु अति उत्तम पंचमी अर्थात जिनकी मृत्यु अविवाहित की स्थिति में हुई हो उन्हें अश्विन पंचमी को क्लोज करनी चाहिए।

अष्टमी नवमी इसमें असमीना ऐसे में सौभाग्यवती यानी रहते जिस पानी की मृत्यु हुई हो इसी कारण इसे मातृ नवमी भी कहते हैं एकादशी और द्वादशी इस चिट्ठी को वैष्णव सन्यासी का श्राद्ध कहते हैं। अर्थात वैसे प्राणी जिन्होंने अपना सन्यास जीवन काल में धारण कर लिया और उनकी मृत्यु हो गई हो आश्रय चतुर्दशी इस तिथि को आत्महत्या करने वाले अथवा विच खाकर जिनकी मृत्यु हुई हो अथवा जिनकी अकाल मृत्यु किसी कारण बस हुई हो, वैसे प्राणी का श्राद्ध इसी तिथि को करने का विधान बच्चों की अकाल मृत्यु होने पर त्रयोदशी को ही श्राद्ध करने का प्रावधान माना गया है।

किसी कारणवश यदि प्राणी के मृत्यु दिवस अथवा अन्य अतिथियों को श्राद्ध करने से चूक गए हों या टीचरों की तिथि याद नहीं हो तो वैसे स्थिति में उन्हें अमावस्या तिथि पर सभी पितरों का श्राद्ध करने का विधान है महालय का श्राद्ध 17 दिनों का होता है। अनंत चतुर्दशी भाद्रपद से आरंभ होता है पूनम को विष्णु वैष्णो का श्राद्ध होता है ऐसी मान्यता है प्रदान करने के लिए सफेद या पीला वस्त्र धारण करने का विधान है कहा जाता है कि इस अवधि पितृ पक्ष ने किया श्राद्ध कर्म में भोजन दान आज सीधे ब्रह्मणों व पक्षियों द्वारा प्राणी को प्राप्त होता है कौवे और पीपल को टीचरों का प्रतीक माना गया है।

यही कारण है कि किसी भी प्राणी की मृत्यु होने के बाद जो अपने पिता को मुखाग्नि देता है वह जब कुछ आदि में पानी देकर प्राणी को जल अर्पण के बाद भोजन करने बैठता है तो इसके पूर्व वह अपने भोजन में से 1 अंक पहले को एको देने का विधान है उसी प्रकार दसमा के जैन प्राणी के श्राद्ध का सारा कार्य पीपल वृक्ष के नीचे ही संपन्न किया जाता है क्यों की कौवा और पीपल को पितरों का प्रतीक माना गया है। यही कारण है कि किसी भी प्राणी की मृत्यु होने के बाद जो अपने पिता को मुखाग्नि देते हैं वह जब तू शादी में पानी देकर प्राणी को जल अर्पण करते हैं उसके बाद भोजन करने के पूर्व वह अपने भोजन में से एक अंश पहले कौवे को देते हैं उसी के बाद वह वह अपना भोजन करते हैं। उसी प्रकार दशम के दिन पुरानी के श्राद्ध का सारा कार्य पीपल वृक्ष के नीचे ही संपन्न किया जाता है क्योंकि यह दोनों पीतल के प्रतीक माने गए हैं ।

हिंदू संस्कृति में मनुष्य की आध्यात्मिक भावना को प्रधानता दी गई है। मृत्यु मनुष्य के जीवन का ध्रुव सत्त्य है। हिंदू संस्कृति में मान्यता है कि मनुष्य की आत्मा पितृ लोक से गया धाम में पितृपक्ष के काल में अपने पुत्र व अपने वंशजों से तर्पण ,पिंडदान एवं श्राद्ध कार्य संपन्न करने हेतु अवश्य आएंगे, जिससे उन्हें स्वर्ग लोक की प्राप्ति होगी । शतपथ ब्राह्मण में 5 लोकों का उल्लेख है जिसमें- ब्रह्मलोक, देवलोक ,गंधर्व लोक, मनुष्य लोकऔर पितृ लोक शामिल है। शास्त्रों में कुछ दिव्य पितरों का भी उल्लेख मिलता है जिनेमें शोमेप ,रश्मिप, बहिषद,उपदूत ,आयंतुन,श्राद्ध मुक्त और नंदीमुख आदि हैं ।
वैदिक परंपरा के सनातन धर्म में पांच प्रकार के यज्ञ भी माने गए हैं, उनमें पितृ यज्ञ भी एक प्रधान यज्ञ है। धर्म शास्त्रों के अनुसार पितरों का निवास चंद्रमा का आधा भाग में माना गया है। मृत आत्मा एक से लेकर एक सौ वर्षो तक मृत्यु और पुनर्जन्म के बीच वास करती है।

पूरे भारत में श्राद्ध कर्म की प्रक्रिया किसी न किसी रूप में जुड़ी हुई हैं, किंतु तमिलनाडु में इसे “अमावसाई” कहते हैं, वहीं केरल में इसे “करिकडा- बाबू बेली” कहते हैं और महाराष्ट्र में इसे “पितृपंध खड़ा” कहते हैं। जहां तक विदेशों में श्राद्ध परंपरा प्रचलित है उनमें विदेशों के दक्षिण कोरिया में इसे प्रतिवर्ष तीन दिवसीय उत्सव के रूप में मनाते हैं जिसे कोरियावासी इसे “चुसीयोग” कहते हैं । यहां के लोग अपने पैतृक गांव जाकर इसे पारंपरिक ढंग से मनाते हैं । प्रातः जो उनके यहां स्वादिष्ट पकवान बनाया जाता है उसे वे इसे “सोंग- पायन” कहते हैं । वे अपने पूर्वजों की समाधि पर जाकर या घर के बाहर इन पकवानों को रखने के बाद स्वयं भी इसे खाते हैं। इस अवसर पर नृत्य संगीत का काफी भव्य आयोजन भी होता है।

चीन में इसे “किंग- मिंग” पर्व से जाना जाता है। इसमें भी वे अपने घरों को अच्छी तरह से साफ -सफाई कर साज -सज्जा से अलंकृत कर समाधि पर चाय नाश्ता और भोजन चढ़ाते हैं। जापान में इसे लोग “बोन-फेस्टिवल” के रुप में मनाते हैं। उनके मृत पूर्वजों माता-पिता,सगे- संबंधी आदि के प्रति श्रद्धा व्यक्त करते हैं यहां भी इसे उत्सव के रूप में मनाया जाता है। इंडोनेशिया में एक विचित्र परंपरा है कि वे मृत पूर्वजों , आत्मीय लोगों को प्रसन्न रखने हेतु प्रतिवर्ष कब्र से अपने परिजनों को निकालते हैं और शव को नवीन वस्त्र पहनाकर केश विन्यास करते हैं, उसके बाद शव को उस स्थान तक जुलूस के रूप में उन्हें ले जाते हैं जहां उनकी मृत्यु हुई थी ।फिर उन्हें मनोवांछित पकवान परोसते हैं । अंत में उन्हें पुनः शव को ले जाकर कब्र में दफना देते हैं।

पड़ोसी देश नेपाल में तो “गया- यात्रा” के नाम से बड़े ही धूमधाम से इसे मनाते हैं , क्योंकि नेपाल ही एक हिंदू देश के रूप में प्रसिद्ध रहा है। वहां गायों का भी काफी महत्व इस अवसर पर दिया जाता है । इसी कारण इसे गायों का उत्सव का यात्रा इसे “गाय -यात्रा”भी कहते हैं। इसके पीछे कारण यह है कि चूंकि गायों में सभी देवताओं का वास होता है, इस कारण मृत प्राणी की आत्मा को गाय समुचित राह दिखाएगी। उनकी आत्मा दिशा विहीन न होकर उचित पथ पर शांति मार्ग को अपनाएगी । इस प्रकार हम पाते हैं कि मृत प्राणी की मुक्ति के लिए पूरे विश्व में विभिन्न प्रथाओं के बीच मूल रूप से मृत प्राणी के प्रति श्रद्धा भाव रुपी “श्राद्ध -परंपरा” कायम है।

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