Monday, March 2, 2026
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आइडियल फ्रेम और नेपोटिज्म से बॉलीवुड को नुकसान

हाल के वर्षो में कई बेसिर पैर की फिल्में हिट होेने के कारण कई फिल्म निर्माता-निर्देशक उसी ढर्रे पर चलने लगे हैं। इसके दुष्परिणाम यह निकले कि किसी एक फिल्म पर कई बरसों तक मेहनत कर अच्छी फिल्म बनाने वाले निर्माता-निर्देशक अब फिल्म बनाने से कतराने लगे हैं। क्योंकि वह पुराने ढर्रे को छोड़ने को तैयार नहीं हैं जिससे उनकी विश्वसनीयता कायम है। वहीं नये फार्मेट में वह खुद को फिट महसूस नहीं कर पा रहे हैं। कई निर्देशक ऐसे हैं जिन्होंने बॉलीवुड मेें कई सफल फिल्में दी है। लेकिन वह एक अदद हिट फिल्म के लिए कई सालों से तरस रहें हैं। कुछ फिल्में ऐसी भी बन रही है जिसमें निर्देशकों और कलाकारों को काफी मेहनत करनी पड़ती है और फिल्म रिकॉर्ड तोड़ कमाई भी करती है। हालांकि वैसे निर्देशकों की संख्या बहुत कम है जो इस बदलते दौर में रिस्क लेने को तैयार हैं।

अर्थपूर्ण फिल्में बनाने वाले निर्माता-निर्देशक धीरे-धीरे बॉलीवुड से गौन होते जा रहे हैं। कुछ निर्माता-निर्देशक दशकों बाद बॉलीवुड में अर्थपूर्ण कहानियों के साथ लौट रहे हैं लेकिन उन्हें निराशा हाथ लग रही है।

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समय-समय पर भारतीय सिनेमा का पैटर्न बदला है। व्यवस्थाएं बदली है और यहां तक की दर्शकों का नजरिया भी बदला है। बॉलीवुड ने कलान्तर से लेकर आज तक कई मुकाम को हासिल किया है और आज बॉलीवुड की पहचान अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर है। विशेषकर 60-70 के दशक से वर्तमान तक की कहानी, चित्रण और निर्माण की प्रक्रिया पर गौर करें तो ऐसा लगता है कि सबकुछ बदल चुका है। पिछले एक- डेढ़ दशकों में तकनीकी स्तर पर फिल्म निर्माण की प्रक्रिया भले ही मजबूत हुई है फिर भी हम बहुत कुछ पीछे छोड़कर बहुत तेजी से आगे बढ़ रहे हैं, और हम उसकी तलाश वर्तमान की फिल्मों में अतृप्त आत्मा की तरह कर रहे हैं। फिल्मों में फैटेंसी के दौर आने के बाद फिल्मों की गुणवता गौन हो गई है। अब बेेसिर पैर की कहानी और गाने लिखे जा रहें हैं। जिसमें निर्माता-निर्देशक अश्लीलता और छिछोरेपन डॉयलॉग को लोकप्रियता भुनाने की कसौटी मानकर चलने लगे हैं।

लगभग 2005 तक की ज्यादातर फिल्मों में निर्देशक इस बात का बखूबी ख्याल रखते थे कि उनकी फिल्म को समाज के हर वर्ग के दर्शक देख सकें। सामाजिक और पारिवारिक नजरिया का विशेष ध्यान रखा जाता था। 80 और 90 के दशक की फिल्में और गाने वर्तमान की फिल्मों पर आज भी भारी पड़ जाते हैं। वहीं सधी हुई कहानी और कर्णप्रिय संगीतों ने कई अभिनेता और अभिनेत्रियों को बॉलीवुड में स्थापित किया है। वहीं तनाव भरी जिंदगी में लोग आज भी पुराने गानों को सुनकर रिलैक्स महसूस करते हैं। उस समय फिल्म का आधार मजबूत कहानी और कर्णप्रिय गाने होते थे। धीरे-धीरे बॉलीवुड से ये दोनों गायब होते गये, और आज के जमाने में चेहरा केन्द्रीत फिल्में तैयार होने लगी, जहां न अच्छी कहानी की जरूरत है और ना ही अच्छे गाने की। जिसमें कई हीरो अपने दम पर फिल्म को हिट कराने का माद्दा रखते हैं और ऐसा हो भी रहा है। भले ही वह बाजार में वो कुछ भी परोस दे। यही कारण है कि कई बार वैसे अभिनेता दर्शकों द्वारा बुरी तरह नकार दिये गये हैं। फिर भी निर्माता-निर्देशक अगला दांव भी उन्हीं पर खेलने को तैयार हैं। वहीं कई प्रतिभासम्पन्न कलाकार काम न मिलने के कारण घर बैठे हैं।

जबकि, कुछ फिल्में ऐसी भी बन रही है जिसमें निर्देशकों और कलाकारों को काफी मेहनत करनी पड़ती है और फिल्म रिकॉर्ड तोड़ कमाई भी करती है। हालांकि वैसे निर्देशकों की संख्या बहुत कम है जो इस बदलते दौर में रिस्क लेने को तैयार हैं। पिछले कुछ सालों के दौरान कुछ ऐसी फिल्में भी हिट रही जिसमें सेक्स और रोमांस का तड़का खूब लगाया गया। हालांकि उनमें युवा वर्ग की भीड़ काफी दिखी, क्योंकि उसमें युवाओं के लिए मसाला भर दिया गया था। उन फिल्मों को न समाज से कोई लेना-देना रहा और ना ही गुणवत्ता का। कुछ फिल्मों में तो गालियां इतनी ठूंस दी गई जिसे आम जिंदगी में भी लोग बोलने से हिचकते हैं। लेकिन ऐसी कई फिल्में बड़ें पर्दे पर हिट रही।

नतीजा यह निकला कि हाल के वर्षो में बेसिर पैर की फिल्में हिट होेने के कारण कई फिल्म निर्माता-निर्देशक उसी ढर्रे पर चलने लगे। इसके दुष्परिणाम यह निकले कि किसी एक फिल्म पर कई बरसों तक मेहनत कर अच्छी फिल्म बनाने वाले निर्माता-निर्देशक अब फिल्म बनाने से कतराने लगे हैं। क्योंकि वह पुराने ढर्रे को छोड़ने को तैयार नहीं हैं जिससे उनकी विश्वसनीयता कायम है। वहीं नये फार्मेट में वह खुद को फिट महसूस नहीं कर पा रहे हैं। कई निर्देशक ऐसे हैं जिन्होंने बॉलीवुड मेें कई सफल फिल्में दी है। लेकिन वह एक अदद हिट फिल्म के लिए कई सालों से तरस रहें है।

इसलिए अर्थपूर्ण फिल्में बनाने वाले निर्माता-निर्देशक धीरे-धीरे बॉलीवुड से गौन होते जा रहे हैं। कुछ निर्माता-निर्देशक दशकों बाद बॉलीवुड में अर्थपूर्ण कहानियों के साथ लौट रहे हैं लेकिन उन्हें निराशा हाथ लग रही है। उनकी फिल्में थियेटर में दर्शकों को खीच पाने में नाकाम हो जा रही है। उसकी वजह यह है कि पिछले कुछ सालों से दर्शक वर्ग आइडियल फ्रेम में फंस गया है। चर्चित चेहरे कुछ भी बाजार में परोस दें हमें उसे देखने की आदत सी पड़ चुकी है। लेकिन यह जरूरी नहीं है कि वह हर बार अच्छी ही फिल्में पेश करें। फिर भी हमें उन्हीं चेहरों को पर्दे पर तलाशने की आदत पड़ चुकी है। नतीजा बढ़ती मांग को देखते हुए वैसे एक्टर निर्माता-निर्देशकों को अंगुुली पर नचाना शुरू कर देते हैं। अपने मन मुताबिक पटकथा और कैरेक्टर में बदलाव कराने के कारण भी बॉलीवुड में कुछ ऐक्टर बदनाम हो चुके हैं। फिल्म निर्माण में उनका हस्तक्षेप इतना बढ़ जाता है कि वह अपने सहकर्मिर्यो के रोल भी कटवा देते है। जहां तहां कट मारने के कारण फिल्में वास्तविक लाइन से अलग हट कर चलने लगती है। ऐसे अभिनेताओं के साथ ज्यादातर निर्देशक काम नहीं करना चाहते। फिर भी सफलता की गारंटी बन जाने के कारण वैसे अभिनेताओं की मांग बाजार में बनी हुई है।

आज बॉलीवुड में नयी पीढ़ी तैयार हो चुकी है।  ये उन्हीं के बच्चे हैं जिन्होंने लम्बे समय तक बॉलीवुड पर राज किया है। लेकिन जरूरी नहीं हैं उनकी पीढ़ियां भी उन्हीं की तरह बॉलीवुड में अपनी पहचान बना सके। फिर भी उन्हें बार-बार मौका दिया जा रहा है। यहां तक की बॉलीवुड की नामचीन शख्सियतों के बच्चे बड़े बैनर से लॉंच किये जा रहे हैं। अभी हाल ही में एक सुपरहिट मराठी फिल्म की हिंदी रिमेक में दो स्टार किड्स को लॉंच किया गया है। लोग उस फिल्म की टीजर को देखकर मूल मराठी फिल्म से उसकी तुलना करते हुए कमतर आंक रहे हैं। समीक्षकों का कहना है कि फिल्में हिट होगी या फ्लॉप यह अलग बात हैं लेकिन स्टोरी को ध्यान में रखते हुए स्टार किड्स की जगह इनमें प्रतिभा सम्पन्न कलाकारों को मौका दिया जाना चाहिए था, जो कहानी के साथ न्याय कर सके। क्योंकि यह एक गंभीर विषय पर आधारित फिल्म है। इस तरह कई ऐसे किस्से है जिससे ऐसा लग रहा है कि बॉलीवुड में नेपोटिज्म और आइडियल फ्रेम को बढ़ावा दिया जा रहा है। जिससे बॉलीवुड में न्यू कमर और प्रतिभासंपन्न कलाकारों को अभिनय करने का मौका ही नहीं मिल रहा है। नुकसान यह है कि अगली पीढ़ी के लिए बॉलीवुड तैयार नहीं है। गिने चुने चेहरे पर ही करोड़ों के दांव लगाये जा रहे हैं।

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