टिकारी राज का किला अब अवशेष मात्र है
भारत में बिहार राज्य के गया जिला अंतर्गत टिकारी राज का ऐतिहासिक किला महाभारत कालीन बाणासुर के साम्राज्य से फलता-फूलता बौद्ध ,मौर्य, मुगल ,ब्रिटिश और आधुनिक काल तक के इतिहास को अपनी छाती में संजोए हुए है।’ग्लिम्पसेज ऑफ हिस्ट्री एंड आर्कियोलॉजी’ के अनुसार टिकारी राज का किला नगर के पश्चिमी किनारे पर नॉर्दन ब्लैक- पॉलिश -वेयर के एक प्राचीन टीले पर बना है।
टिकारी किले से मात्र 10 कि०मी० पूरब बाणासुर का शोणित पुर राजप्रसाद तथा उसकी पुत्री उषा का अति प्रसिद्ध आराध्य स्थल शिवमंदिर ‘वानावर ‘ पर्वत पर है । उसी से आगे मगध की प्रसिद्ध राजधानी राजगृह अवस्थित है। यहां ग्रे-वेयर और ब्लैक- वेयर के अवशेष काफी मात्रा में मिले हैं तथा पंचमार्क सिक्के भी प्राप्त हुए हैं । ‘विक्रम विश्वविद्यालय ‘उज्जैन के प्राचीन इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व के विभागाध्यक्ष पुराविद् पद्मश्री डॉक्टर विष्णु श्रीधर वाकणकर ने इसका संबंध देवास रोड स्थित वीजासनी टेकरी के समकालीन टेकारी की प्राचीनता एवं नामकरण को बताया है । इन दोनों स्थलों पर समान रूप से पुरावशेष पाए गए हैं ।
मगध विश्वविद्यालय के शोधकर्ता डॉक्टर जनक नंदन प्रसाद सिन्हा एवं अन्य इतिहासकारों ने इसका पूर्वकालिक संबंध टिकारी से 3 कि०मी० पूरब ‘लाव’ नामक प्राचीन ऐतिहासिक गांव से बताया है। विस्मृत इतिहास के बीच टिकारी राज का इतिहास मुगल काल के पतन से मिलता है। राजनीतिक अस्थिरता और अभिलाषी मुगल साम्राज्य के बीच स्थानीय बलशाली और प्रभावशाली व्यक्तियों ने अपने खानदान और अपने प्रदेश क्षेत्र को क्षेत्रिय सर्वोच्चता को प्राथमिकता देने का स्वप्न देखा। परिणामत: बंगाल (बिहार ) और उड़ीसा का सूबेदार भी अवध, डेकन और अन्य बड़े तथा छोटे सूबेदारों की तरह स्वतंत्र हो गए। कमजोर केंद्रीय सत्ता हो जाने के कारण बलशाली लोगों के बीच तनाव उत्पन्न हुआ। लोगों में स्थानीय राजधानी बनाने की होड़ प्रबल हो चली ।
इस बीच मराठा घुसपैठ “अब्दाली”का हमला और ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रवेश के कारण शक्ति प्रदर्शन ने वृहत् सैनिक बाजार को जन्म दिया । स्वतंत्र सैनिक बल ,उनके लिए लड़ाई लड़ते जो उन्हें ज्यादा से ज्यादा रकम देते अथवा प्रादेशिक मान्यता व राजस्व देने का वचन देते। औरंगजेब की मृत्यु (1707 ई०) के बाद उसका बड़ा पुत्र मुअज्जम बहादुर शाह राजगद्दी पर( 1707 ईस्वी से 1712 ईस्वी )तक बैठा । उस समय टिकारी के उतरेन नामक गांव का नवाब हिम्मत खां और सेनापति शेर खां के पास यू ० पी०का एक युवक वीर (धीर) सिंह अपने पूर्वजों का पिंडदान करने के लिए विष्णुपद -गया में आया और पिंडदान करने के बाद उसे यहीं बस जाने की ईच्छा जगी, इसलिए वह टिकारी के पास उत्तरेन नामक गांव के नवाब हिम्मत खां की सेना में नौकरी करने लगा । उसने 1709 ई० में लाव दुर्ग पर राजा की आज्ञा से चढ़ाई कर कब्जा जमाया और वहीं रहने लगा । उन दिनों सैयद हुसैन अली खां बिहार का नवाब था ।
1711 ई० में वीर सिंह को द्वितीय पुत्र सुंदर सिंह का जन्म लाव में हुआ । सुंदर सिंह अपने नाना कंचन चौधरी जो पाली (पटना ) में सूबेदार हुसैन अली खान के साथ नायब सूबेदार के पद पर कार्य करते थे, वह वहाँ साथ रहने लगा। उसके नाना ने उसे पढ़ाई लिखाई के साथ-साथ युद्ध कला की भी शिक्षा दिलवाई । वह नाना जी के साथ बादशाह के दरबार में भी जाया करता था । वह बालक बडा़ होनहार निकला। उसके बारे में एक लेखक एस्कॉट ने अपने ‘फरिश्ता ‘में लिखा है कि सुंदर सिंह विवेकशील ,ईमानदार और असाधारण मेधा पुरुष था।
मगध के राजा के रूप में दक्षिण के पहाड़ियों पर भी उसका कब्जा था । सैयद बंधुओं का विशेष वर्चस्व 1708 से 1720 ई० तक दिल्ली दरबार में रहा । उन दिनों कंचन चौधरी इन सबों के विशेष प्रिय थे । इस कारण सुंदर सिंह को लाव और सोनौत परगना पर कब्जा मिल गया । सैयद बंधुओं का बाद में हत्या हो जाने के कारण कंचन चौधरी का पराभव हुआ । इस कारण सुंदर सिंह ने मुगल दरबार से दोस्ताना संबंध खत्म कर लिया और अपने 20 साल की उम्र से सदा मुगल प्रशासन की सैनिक टुकड़ियों से युद्ध करते रहे तथा उन्हें पराजित करते रहे । इसलिए जनता उन्हें जंग बहादुर सिंह भी कहते थे। प्रारंभ के युद्ध में सबसे पहले उन्होंने नवाब हिम्मत खां और उसके सेनापति शेर खां को चाँदी के मैदान मे 1735 ई० मे हराया एवं हिम्मत खां को मार डाला ।
युवराज राजा सुंदर सिंह के सैनिक विस्फोट का यह प्रथम शुरुआत थी । इसकी खबर दिल्ली बादशाह को मिली । तब बादशाह ने फैजुल्लाह खां के नेतृत्व में एक सैन्य टुकड़ी सुंदर सिंह को गिरफ्तार करने के लिए और उसके धन को लूटने के लिए भेजा । तब सुंदर सिंह ने इसे लोदीपुर के मैदान में न केवल हराया,बल्कि उसे जान से भी मार डाला । यह खबर दिल्ली बादशाह को मिली । तब सुंदर सिंह को पटना में नायब सूबेदार अली वर्दी खां के साथ युद्ध करनी पड़ी ।अलवर्दी खां सेना का स्वयं संचालन कर रहा था ।
अलवर्दी खां सुंदर सिंह के पराक्रम को देखकर इसे दोस्त बनाकर काम निकाल लेने का प्रयास किया, इसलिए उसने सुंदर सिंह को चार लाखऔर बंगाल के नबाव को 50 हजार रुपये देने को कहा । कुटुंबा के क्योर सिंह, नरहट के कामगार खां और रामगढ़ के राजा ने अपनी – अपनी सेनाओं के साथ इन्हें साथ देने के लिए आ जुटे ।तब सुंदर सिंह का हौसला और बुलंद हो गया और उसने अली वर्दी खां के शर्त को ठुकरा दी तथा युद्ध करने का प्रस्ताव भेज दिया । सुंदर सिंह पूरी जोश – खरोश के साथ अली वर्दी खां से युद्ध किया और उसे हरा दिया ।
इस युद्ध में सुंदर सिंह को ढेर सारे युद्ध के सामान एवं उसके कैंप से काफी धन और सामग्री भी प्राप्त हुए। उसका सेनापति मुस्तफा खां भाग निकला । जिससे सुंदर सिंह का हौसला और भी बुलंद हो गया ।यह जीत सुंदर सिंह के सूझ- बूझ, साहस और युद्घ -कौशल का ही प्रतिफल था । वह अपने सेनाओं को काफी इज्जत और आदर करता था । उसकी बोली में ओज और जोश थे ,जो सैनिकों को उत्साह भरने में सहायक सिद्ध होते थे ।
इस लड़ाई में उसका अति प्यारा और बलशाली भतीजा कमांडर बेचू सिंह मारा गया । यह घटना लगभग 1736 -37 की है । कुछ दिनों के बाद एक षडयंत्र के तहत सुंदर सिंह को गिरफ्तार कर पटना लाया गया और कैदी बना लिया गया ।चूँकि सुंदर सिंह बादशाह की नजरों में विद्रोही था , इसलिए उसे तोप से उड़ाने का आदेश बंगाल के नवाब द्वारा भेजा गया । किंतु पटना का नायब सुबेदार अलिवर्दी खां सुंदर सिंह की विशेष प्रतिभा और अदम्य साहस को देख दोस्त बना लेना चाहा । इसके लिए उसनेएक प्रस्ताव के अनुसार सुंदर सिंह को सूबेदार की पत्नी और उसकी पुत्री सूजी बेगम के लिए नजराना के तौर पर एक लाख का सुंदर आभूषण और बेशकीमती वस्त्र आदि भेंट करने का प्रस्ताव दिया , जिसे सुंदर सिंह ने सहमति जताई । नजराना की बहुत अच्छी व्यवस्था की गई । इन नजरानो के साथ सुंदर सिंह को नवाब के पास मुर्शिदाबाद ले जाया गया । वहाँ दोनों महिलाओं के पास पहले नजराना पेश कर दिया गया । नजराना देखकर दोनों महिलाएं अति प्रसन्न हो गईं और सूबेदार से कह कर उसने इन्हें सजा से मुक्त करवा दी । सूबेदार ने उनसे नौ लाख जुर्माना के स्वरूप तलब की, जिसे सहमति सुंदर सिंह ने दी और वे स्वतंत्र हो गए ।
अब अली वर्दी खां तथा नवाब के प्रति ये निष्ठावान माने जाने लगे । बाद में बहुत सारी लड़ाइयों में अलीवर्दी खां को बहादुरी के साथ सुंदर सिंह ने साथ दिया और जीत दिलायी ।बंगाल के नवाब और दिल्ली दरबार के तरफ से भी ये पूरी ताकत और निष्ठा से लड़े । इस कारण इन्हें “राजा” की सनद एवं ‘शाह’ की उपाधि मुगल बादशाह “शाह आलम “ने आदर सहित दी। सुंदर शाह भी जीवन भर इस दोस्ती को निभाया ।
सन् 1713 ई० में मुर्शीद कुली खां बंगाल का सूबेदार बना । 1719 ई०में वह उड़ीसा का भी सुबेदार बना । इसने अपने काल में दिल्ली दरबार को भेजे जाने वाले राजस्व में काफी वृद्धि की । इसकी मृत्यु 1727 में हो गई । तब इन्हीं का दामाद शुजाउदौला गद्दी पर बैठा । यह भी 1739 में मर गया। तब उसकी उप पत्नी से उत्पन्न सरफराज खां सूबेदार बना । उसने 1740 में विद्रोह किया। अली वर्दी खां जो 1729 ई० से ही बिहार का नायब सूबेदार था, उसने अप्रैल 1740 में सरफराज खां को सुंदर सिंह की मदद से हरा कर मार डाला और बंगाल बिहार तथा उड़ीसा का नवाब बना । फिर उसने सम्राट मुहम्मद शाह को 2 करोड़ रुपए नजराना देकर सूबेदार का सनद प्राप्त कर लिया ।सन् 1941 ई० से अलवर्दी खां पूर्ण रूप से इन तीनों राज्यों का नवाब बन बैठा ।
इस लड़ाई में सुंदर सिंह की वीरता तथा अपनी सेना के साथ लड़ाई में उसे सहायता देने के कारण सुंदर शाह का रुतबा काफी बढ़ गया । इससे प्रसन्न हो अली वर्दी खां ने इन्हें काफी धन ,घोड़े ,हाथी और गहने तथा जवाहरात दी । राजा सुंदर शाह बिहार लौट गया । उन दिनों बिहार में नरहट , समाई और रामगढ़ तथा अन्य पहाड़ी इलाकों में विद्रोही सक्रिय थे , जिसे सुंदर शाह ने अली खां के सहयोग से बड़ी बहादुरी के साथ कुचलना प्रारंभ किया और रामगढ़ किला सहित अन्य सभी पहाड़ी इलाकों पर कब्जा जमा लिया । उधर मराठों पर कंट्रोल करने की तैयारी चल रही थी, कि अफगान सरदार मुस्तफा खां के नेतृत्व में अफगानों की एक बड़ी सेना द्वारा अजीमाबाद( पटना ) पर चढ़ाई कर दी गई ।
अलवर्दी खां का दामाद जैनुउद्दीन खां घबरा कर राजा सुंदर शाह को कुछ अन्य जमींदार दोस्तों के साथ सहायता करने का आग्रह किया । राजा सुंदर शाह ने अपनी सेना के साथ अजीमाबाद पहुंचकर युद्ध में भाग लिया और उन्हें विजय दिलायी । मुस्तफा खां वहां से भाग निकला ,किंतु बाद 20 जून 1745 ईसवी की लड़ाई में वह मारा गया । इस जीत से सुंदर शाह की वफादारी ,बहादुरी और निष्ठा में और भी निखार आई।
सुंदर शाह को इन कार्यों से इन सभी कार्यों से खुश होकर दरबार में विशेष ईज्जत दी गई । इनके लिए यात्रा के लिए विशेष व्यवस्था की जाने लगी। जिसमें “उन्हें खास तरह की झालर-पालकी ,ऊंट के पीठ पर नगाड़ा बजाते हुए ध्वज निशान युक्त सैनिक आदि साथ लिए चलते थे । इस तरह का तगमा और ईज्जत विरले ही किसी राजकुमार को उन दिनों नसीब थी “।इन्हें सदा मुर्शीबाद के नवाब, दिल्ली दरबार के ‘मोहम्मद शाह’ बादशाह तथा ‘अहमद शाह’ का प्यार और सम्मान मिलता रहा ।ये सदा अपने राज्य का विस्तार करते रहे तथा अपने दोस्तों की सहायता देते रहे । इन्होंने टिकारी राज के किले का भव्य रुप मे पुनर्निर्माण कराया और अपनी जायदाद को नौ परगनो इकिल,सनावत,उकनी,भेलावर,दक्खने र,आँती,पहरा,अभराथु, और महेर के अलावा तत्कालीन बिहार के जिले एवं रामगढ़ के जिले मे विस्तार किया।सन् 1741 से 1745 ई० के बीच कम से कम तीन बार मराठों के आक्रमण एवं लूटपाट से टिकारी राज को बचाया तथा उन्हें खदेड़ भगाने का साहसिक कार्य किया ।
मराठों का बिहार में उन दिनों काफी आक्रमण हो रहा था । सुंदर शाह ने प्रत्येक बार इन आक्रमणकारियों से डटकर मुकाबला किया और उन्हें यहां से खदेड़ भगाया। सन् 1745 ई० में बाजीराव पेशवा का भी टिकारी पर आक्रमण हुआ ,उसे भी भगाने में ये सफल रहे। मराठों की आक्रमण और सैयद उल मुतखरीन के आतंक से बचाने में यहां के नवाब अली वर्दी खां को साथ देने के इनाम स्वरूप दिल्ली के बाद शाह ने सुंदर सिंह को” राजा “की पदवी दी ।
बिहार पर कब्जा जमाने के उद्देश्य सुंदर सिंह ने तत्कालीन बादशाह ‘शाह आलम ‘को यहां आमंत्रित किया और उसे स्वयं अपनी एक बड़ी सेना लेकर साथ देने हेतु तैयार हुआ ,इसी बीच धोखे से उसके अपने ही सैनिक सुरक्षा गार्ड गुलाम गौस ने खडयंत्र के तहत बसंत पंचमी के उत्सव में मोरहर नदी के तट पर खनेटू गांव के मैदान में 1758 ई० खंजर से मार डाला। तब उसका भतीजा बुनियाद सिंह टिकारी राज की गद्दी पर बैठा।




