अगर राज्यों की सरकारें अपने-अपने मजदूरों को रोजगार प्रदान करने में सक्षम होती तो आज उन्हें यह दिन नहीं देखना पड़ता। राजनीतिक दलों ने मजदूरों को अपने-अपने हिसाब से सियासत के सांचे में ढाला है और सरकारों ने कभी उनकी सुध नहीं ली। आज वह कर्मभूमि से पलायन कर अपनी जन्मभूमि की ओर लौट रहे हैं। यक्ष प्रश्न है कि, क्या हजारों की संख्या में लौटने वाले उन मजदूरों को राज्यों की सरकारें रोजगार मुहैया कराने में सक्षम हो पायेंगी ?
कोरोना ने देश की अर्थव्यवस्था को डिरेल (बेपटरी) कर दिया है तो हाशिये पर जीने वाला मजदूर वर्ग आज सड़क पर आ चुका है। उच्च वर्ग इन चुनौतियों में भी अवसर तलाश रहा है जबकि मध्य वर्गीय परिवार अनिश्चितताओं के भंवर में फंसा है। विकास की रफ्तार में एशिया महादेश के कई देशों को पीछे करने वाला भारत महज कुछ महीने में ही अपनी चमक खो रहा है। गूगल पर ऐसी तस्वीरों की भरमार है जिसे देखने के बाद मजदूरों और मजबूरों की बेबसी पर आपको निःशब्द होना पड़ जायेगा। केन्द्र एवं राज्य सरकारों के दावे और हकीकत में आसमान-जमीन के अंतर हैं।
आश्चर्य इस बात की है कि अब पक्ष और विपक्ष के नेता गरीबों की सुध लेते देखे जा रहे हैं। अगर इसी तरह सत्ता और विपक्ष की पार्टियां गरीबों की सुध लेने लगे तो यकीन मानिये एक साल के अंदर देश से गरीबी खत्म हो जायेगी। लेकिन ऐसा नहीं होगा, क्योंकि कोरोना महामारी के इस विकराल दौर में भी राजनीतिक पार्टियां गरीबों के नाम पर सियासत कर रही है। अगर इससे पहले गरीबों की सुध ले लिये होते तो आज उन्हें हजारों किलोमीटर पैदल चलने की जरूरत नहीं पड़ती। वह अपने घर-परिवार को छोड़कर हजारों किलोमीटर दूर आजीविका की तलाश में नहीं जाते।
बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखण्ड, पश्चिम बंगाल और उड़ीसा के ज्यादातर मजदूर ही महानगरों में मिलते हैं। कुछ मजदूरों को छोड़ दें तो उनमें अधिकांश मजूदर अंसगठित क्षेत्रों से जुड़े हैं। उन्हें जो काम मिल गया वह वही काम करने लगे। लिहाजा इन मजदूरों की डेटा न राज्य सरकार के पास है और ना ही केन्द्र के पास। लेकिन ये मजदूर सियासी पार्टियों के वोट बैंक जरूर हैं। नेताओं को ये मजदूर चुनाव के दौरान ही याद आते हैं। बड़ी-बड़ी घोषणायें होती है और बड़े-बड़े वादे होते हैं। अगर उन घोषणाओं और वायदों को अमल में लाये गये होते तो आज ये सभी मजदूर प्रवासी की जिंदगी नहीं जी रहे होते। वह सरकार से बड़ी उम्मीद पालकर नहीं बैठे हैं। उन्हें तो बस दो वक्त का भोजन और कुछ जरूरी सुविधायें चाहिए। लेकिन ऐसा करने में सरकारें अब तक नाकाम रही हैं।
ये मजदूर हमेशा ही सियासत की बिसात पर चौसर का काम करते हैं। कई राजनीतिक पार्टियां उनके कंधों पर पैर रखकर सत्ता का स्वाद चख चुकी है। लेकिन आज उनकी सुध लेेने वाला कोई नहीं है। अपने घर परिवार से दूर होकर प्रवासी के रूप में अन्य राज्यों में आजीविका के लिए जद्दोजहद करना उन मजदूरों के लिए कितना भारी पड़ा है उसे वह आजीवन नहीं भूल पायेंगे। आज जो हालात उन मजदूरों के सामने हैं उसे देखकर मानवता कांप जायेगी। लेकिन सरकारों के दिल नहीं पसीज रहे।
जब हालात सरकार के नियंत्रण के बाहर हो गये। देश भर के लाखों मजदूर सड़क मार्ग से एवं रेल की पटरियों के रास्ते पैदल ही अपने घर जाने पर मजबूर हो गये तो सरकार की चौतरफा आलोचना होने लगी। आलोचना से घिरने के बाद रेलवे ने श्रमिक स्पेशल चलाने का फैसला किया और राज्यों की सरकारों ने उनके लिए बसों की व्यवस्था की है। लेकिन अभी भी अनगिनत मजदूर अपने परिवारों के साथ सड़क पर पैदल ही तपती धूप में चलते देखे जा सकते हैं। कई मजदूर अपने छोटे बच्चों को कंधे पर लिये हुए हजारों किलोमीटर पैदल सफर तय करके घर पहुंचे है। तपती धूप में भूख-प्यास से बेहाल कई मजदूरों ने रास्ते मेें ही दम तोड़ दिया। कुछ हादसे विचलित करने वाले हैं। कई मजदूर सड़क और रेल दुर्घटना के शिकार हुए हैं। असमय काल के गाल में समाने वाले इन मजदूरों की क्या गलती थी। यही न कि ये सभी अपनों से दूर एक प्रवासी के रूप में महानगरों में आजीविका तलाशा।
अगर राज्यों की सरकारें अपने-अपने मजदूरों को रोजगार प्रदान करने में सक्षम होती तो आज उन्हें यह दिन नहीं देखना पड़ता। राजनीतिक दलों ने मजदूरों को अपने-अपने हिसाब से सियासत के सांचे में ढाला है और सरकारों ने कभी उनकी सुध नहीं ली। आज वह कर्मभूमि से पलायन कर अपनी जन्मभूमि की ओर लौट रहे हैं। यक्ष प्रश्न है कि, क्या हजारों की संख्या में लौटने वाले उन मजदूरों को राज्यों की सरकारें रोजगार मुहैया कराने में सक्षम हो पायेंगी ?




