
गया तीर्थ भारत में सभी तीर्थों से श्रेष्ठ तथा महान बताया गया है। यह पितृतीर्थ, भगवान विष्णु की नगरी होने के कारण सभी तीर्थों में श्रेष्ठ तथा शुभ माना गया है।
‘‘पितृतीर्थ गया नाम सर्व तीर्थ वरं शुभम्।‘‘
बिहार प्रांत में गया वह प्रसिद्ध तीर्थ स्थल है जहां हिन्दू धर्मावलंबियों के पितरगण श्राद्ध से संतुष्ट होकर आयु, प्रज्ञा, मोक्ष, तथा स्वर्ग आदि सुखों की प्राप्ति करते हैं। गया तीर्थ का नाम ऋग्वेद में भी आया है। इसके अलावा वाल्मीकि रामायण, महाभारत, अत्रि स्मृति, बृहस्पति स्मृति, वायु पुराण, अग्नि पुराण, गरुड़ पुराण आदि ग्रंथों में गया के माहात्म्य का विस्तार से चर्चा की गई है। महाभारत में गया को एक अति उत्कृष्ट, पवित्र और बड़े महात्म्य का तीर्थ माना है। ग्रथों में बताया गया है कि तीर्थों की महत्ता तब होती है, जब वहां कोई प्राणी सिद्धि प्राप्त करता हो या किसी अवतारी पुरुष की लीला संपादित हुई हो अथवा किसी देवता विशेष का घटनाक्रम में वास स्थान रहा हो। महाभारत तथा अन्य प्राचीन ग्रंथों में गया की महत्ता की कथा विस्तार से मिलती है ।
गया की महत्ता गय नामक एक राजर्षि की कथा से जुड़ी हुई है। महाभारत के अनुसार राजर्षि गय अमूर्तरमा के पुत्र थे। राजर्षि गय बड़े दिव्य और पवित्र महात्मा थे। उन्होंने एक बहुत बड़ा और अपूर्व यज्ञ संपन्न किया था। इस प्रकार के यज्ञ राजर्षि गय ने ब्रह्म सरोवर के निकट अनेकों बार किये थे। महाभारत में ऐसे संपन्न किये यज्ञों का विस्तार से वर्णन मिलता है। इससे यह स्पष्ट होता है कि महाभारत काल में यह स्थान साधना स्थल के रूप में काफी विख्यात था। मान्यता है कि यहां साधना करने वालों को शीघ्र ही सिद्धि प्राप्त हो जाती है।
गया के एक पर्वत का नाम भी महाभारत काल में गय-पर्वत बताया गया है। गया की महत्ता फल्गु नदी के योगदान से जुड़ा है। फल्गु नदी को इसी कारण महानदी भी कहा गया है। गया एक ओर जहां विष्णुपद सेवित स्थल के रुप में विख्यात है, वहीं इसे भगवान शिव का साक्षात निवास स्थल भी बताया गया है। यहां कौरवों के भाई पांडवों को पूरा चातुर्मास बिताने की बात कही गई है। यहाँ की पवित्र प्रसिद्ध महानदी फल्गु में स्नान, तर्पण और पिंडदान से जहां देवता और पितर तृप्त होते हैं, वहीं ब्रह्मसर तथा धर्मारण्य में जाने से ब्रह्म-लोक की प्राप्ति होती है। गृधवट के पास भस्म स्नान का विधान है, जो वर्तमान में भस्मकूट नाम से विख्यात है। यह पवित्र स्थल शिव का स्थान माना गया है।
यहां ब्रह्म योनि पर्वत पर योनि द्वार है, जहां जाने से मनुष्य योनि संकट से छुटकारा पा जाता है। प्राचीन ग्रंथों में वर्णन है कि गया में निवास करने से अश्वमेध, गोमेध, राजसूय जैसे महत्वपूर्ण यज्ञों का फल मिलता है। यहां विष्णु और शिव के अलावा धर्मराज का भी निवास रहा है, जो धर्मारण्य साधना की अपूर्व भूमि मानी गई है। यह स्थल धर्मारण्य नदी के उस पार दूर तक फैला हुआ है। यहीं मतंग ऋषि का भी आश्रम था, जो अब मतंग वापी के नाम से जाना जाता है। भगवान बुद्ध भी यहां ज्ञान की खोज में प्राग-बोधी में आकर तपस्या की थी।
यहां चैतन्य महाप्रभु ने ईश्वर पुरी नाम संत से दीक्षा ली थी और वे गया जी की पवित्र भूमि, जहां पितरों को मोक्ष मिलता है, को जानकर अपने पिता एवं पूर्वजों का श्राद्ध करने के लिए इस्वी सन 1509 में यहां आए थे। बताया जाता है कि चैतन्य महाप्रभु जिनके बचपन का नाम निमाई था, उन्हें यहां के संत ईश्वरपुरी ने श्राद्ध कर्म करने के उपरांत प्रवास काल में कृष्ण- कृष्ण रटने को कहा था, तब श्री निमाई ने अपने अन्य शिष्यों के सहयोग से ढोलक, मृदंग, चंग आदि वाद्य यंत्रों के साथ सभी मिलकर उच्च स्वर में भक्ति भाव में लीन होकर कृष्ण-कृष्ण रटने लगे। फिर यही कृष्ण-कृष्ण, हरे कृष्ण-हरे कृष्ण, कृष्ण-कृष्ण हरे हरे और हरे-राम हरे -राम, राम -राम हरे हरे मंत्र का सृजन हुआ, जो आज तारक ब्रह्म-महामंत्र कहलाता है। इस प्रकार इस मंत्र का सृजन स्थल भी यही गया तीर्थ ही है। साथ ही गया-तीर्थ भारतीय संस्कृति का एक परम पवित्र स्थल है। विशेषकर श्राद्ध कर्म के लिए गया अन्य तीर्थों की अपेक्षा ज्यादा महत्वपूर्ण मानी गई है ।




