एनडीए सरकार पर बेअसर यूपीए की धार
हाल ही में कांग्रेस के नये अध्यक्ष को लेकर पार्टी के शीर्ष नेताओं के बीच एक सप्ताह तक बैठक चली और मौजूदा राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में कांग्रेस की कमजोर होती सियासी ताकत पर भी आत्म मंथन हुआ है। जिसमें निष्कर्ष यही निकला कि राहुल गांधी को कांग्रेस पार्टी की कमान जल्द दी जा सकती है। पार्टी के विरोधी नेताओं ने भी राहुल गांधी को फिर से कांग्रेस के अध्यक्ष बनाने पर सहमति जता दी है। जिसकेे बाद यह कयास लगने शुरू हो गये कि गांधी परिवार से बाहर के आदमी को कांग्रेस की कमान नहीं दी सकती।
हालांकि सीताराम केसरी जैसे दिग्गज कांग्रेसी नेता को यह जिम्मेदारी तब मिली थी जब सोनिया गांधी राजनीति में नहीं आना चाहती थीं, राहुल गांधी उम्र में छोटे थे और प्रियंका गांधी की राबर्ट वाड्रा से शादी हो चुकी थी। लेकिन जैसे ही सोनिया गांधी ने सक्रिय राजनीति में कदम रखने का फैसला किया, सबसे पहले सीताराम केसरी के लिए दस जनपथ का दरवाजा बंद किया गया। देसी मिजाज के खांटी कांग्रेसी नेता सीताराम केसरी उसके बाद राजनीतिक पटल से ही गायब हो गये।
सोनिया गांधी के कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद केन्द्र में लगातार दो टर्म यूपीए का शासन उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि कही जा सकती है। इतना ही नहीं सोनिया गांधी की पार्टी लीडरशिप में देश के 16 राज्यों में कांग्रेस की सरकार बनी। नेहरू और इंदिरा के बाद सोनिया गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस का सबसे ज्यादा विस्तार हुआ है।
लेकिन, अब कांग्रेस पार्टी में नेतृत्व का अभाव दिखता है। पार्टी की कमान पिछले दो दशक से ज्यादा समय से लगातार गांधी परिवार के पास ही है। कांग्रेस के नये अध्यक्ष का चुनाव अब महज खानापूर्ति लगती है। कांग्रेस की कमान कभी सोनिया गांधी के पास तो कभी राहुल गांधी के पास, वर्तमान में भी यही हो रहा है।
तमाम अंतर्विरोधो के बावजूद कांग्रेस की कमान गांधी परिवार से बाहर के व्यक्ति को नहीं दी जा रही है तो विरोधी पार्टी के नेता यह कहने लगे हैं कि कांग्रेस एक परिवार की पार्टी बनकर रह गई है। हालांकि, मसला अब यह भी नहीं है कि पार्टी की कमान किसके हाथ में है। मसला यह है कि पार्टी दिशाविहीन और मुद्दाविहीन कैसे हो गई। चुनाव दर चुनाव परिणामों में कांग्रेस के सिमटते जनाधार और नीतिगत विफलताओं के साथ एक विपक्ष की भूमिका का निर्वहन भी ठीक से नहीं हो पा रहा है। जिसपर अब पार्टी के शीर्ष नेताओं के साथ-साथ सहयोगी दए भी कांग्रेस नेतृत्व पर सवाल उठाने लगे हैं।
बिहार में महागठबधन की सरकार नहीं बनने का ठीकरा भी कांग्रेस पर फोड़ा जा रहा है। राजद के कई नेताओं ने कहा है कि सीटों के बंटवांरे पर कांग्रेस ने खुद को ऐसे पेश किया जैसे बिहार में उनका बड़ा जनाधार है। महागठबंधन पर दबाव बनाकर कांग्रेस ने 70 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे लेकिन महज 21 सीट पर जीत दर्ज की है। अगर कांग्रेस को सीटें कम दी गई होती तो आज महागठबंधन के सामने स्थिातियां कुछ और होती।
कांग्रेस के कई शीर्ष नेताओं ने भी स्वीकार किया है कि चुनावों में कांग्रेस की हार अब नियति बन गई है। कपिल सिब्बल, तारिक अनवर जैसे नेताओं ने यह माना कि कांग्रेस का प्रदर्शन निराशाजनक रहा है। हाल में हुए कई उपचुनावो के परिणामों में भी कांग्रेस क्षेत्रीय पार्टियों से भी पिछड़ती दिखी। तब कयास लगाये जा रहे थे कि कांग्रेस के शीर्ष नेेताओं के बयानों के बाद पार्टी नेतृत्व द्वारा ठोस कदम उठाये जायेंगे। लेकिन जब राहुल गांधी को पार्टी की कमान देने पर सहमति बन गई तब प्रतिद्वंद्वी नेता कांग्रेस पर ताने मारने लगे कि मां-बेटा के बीच यह फिक्स गेम है, इसमें तीसरे की कोई जगह नहीं है। मीडिया की सुर्खियों में बने रहने के लिए पार्टी में यह सब करना पड़ता है।
वर्तमान मेें कांग्रेस अपने लिए कई मुश्किलें खड़ी कर चुकी है। कांग्रेस पर एक टैग लग चुका है कि यह एक परिवार की पार्टी है, जिसका नेतृत्व कभी सोनिया गांधी करती हैं तो कभी राहुल गांधी पार्टी की बागडोर अपने हाथ में ले लेते हैं। आज कांग्रेस के सामने प्रतिस्पर्धा बढ़ती जा रही है। जमीनी स्तर पर कांग्रेस की स्थिति को देखें तो यह क्षेत्रीय पार्टियों से भी कमजोर हो चुकी है। छोटे-छोटे सहयोगी दल कांग्रेस नेतृत्व को नसीहत देने लगे हैं कि पार्टी में आमूलचुल परिवर्तन की दरकार है। लेकिन नसीहत देने वालों पर कांग्रेस के दरबारी नेता हमलावर हो जाते हैं और उन्हें उनकी राजनीतिक हैसियत का अहसास कराने लगते हैं।
निष्कर्षतः देश की बड़ी आबादी अब कांग्रेस से दूरी बना चुकी है। बिखरे जनाधार को वापस लाने के लिए कांग्रेस के पास न नीतियां दिखती है और ना ही करिश्माई नेतृत्व। पार्टी के शीर्ष नेताओं के बीच आत्ममंथन भी हो रहा है तो उसमे सबसे पहले वह अपना हित देख रहे हैं। अगर कांग्रेस का नेतृत्व गांधी परिवार के बाहर के हाथ में गया तो पार्टी में उनकी हैसियत कितनी बचेगी, इसपर भी पार्टी के नेता आत्ममंथन कर रहे हैं।
देश के पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की किताब में इस बात का जिक्र है कि कांग्रेस नेतृत्व वर्तमान की चुनौतियों से निपटने में सक्षम नहीं है। प्रणब मुखर्जी कांग्रेस के पतन के लिए मनमोहन सिंह की सरकार को भी जिम्मेदार ठहराते हैं। मनमोहन सिंह के कार्यकाल में विरोधी यह आरोप लगाते रहे कि सरकार की नीतियों के संचालन पीएमओं से नहीं बल्कि दस जनपथ से हो रहे हैं। मनमोहन सिंह के कार्यकाल में भ्रष्टाचार और घोटालों की लम्बी फेहरिश्तों सेे भी कांग्रेस पार्टी को काफी नुकसान पहुंचा है।
चुनावों और उपचुनावों में कांग्रेस के निराशाजनक प्रदर्शन को लेकर पार्टी में अंतर्कलह है। लेकिन मुखर होकर बोलने वालों को पार्टी के शीर्ष नेता उन्हें साइडलाइन करने में जरा भी हिचकते। एक बड़ी लॉबी कांग्रेस में बदलाव अथवा सुधार नहीं चाहती है, जिसकी परिणति आज सामने है।
कांग्रेस में सुधार की गुंजाइश कितनी बची है कि यह पार्टी की नीतियों से ही पता चलता है। कांग्रेस पार्टी का हर विरोध एनडीए सरकार पर बेअसर साबित हो रहा है तो सहयोगी दल का कांग्रेस नेतृत्व पर सवाल उठाना लाजिमी है। महाराष्ट्र की सत्तारूढ़ सरकार में सहयोगी दल शिवसेना ने मुखपत्र सामना के माध्यम से कांग्रेस नेतृत्व पर सवाल उठाकर दुखती रग पर हाथ रख दी है। (जारी)




