Monday, March 2, 2026
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ककोलत जलप्रपात: 160 फीट नीचे गिरती हुई झरने की शीतल निर्झर बूंदें मन को आह्लादित करती हैं

ककोलत, बिहार का सुप्रसिद्ध गौरवमयी जलप्रपात है, जो श्रृृंगारित प्राकृतिक सुषमाओं के बीच 160 फीट ऊँचे महावर पर्वत से अहर्निश प्रवाहित होकर सीधा धरती पर अवतरित होता है। ऊंचे शिखर से गिरने के कारण जल की शीतल निर्झर बूंदें मन और मस्तिष्क को बेहद आह्लादित करती हैं। झरने की बूंदों के बीच स्नान करने के बाद तो यहां बार-बार आने की और आनंद उठाने की इच्छा जागृत होती है ।

यह स्थल बिहार के नवादा जिला मुख्यालय से 33 किलोमीटर दूरी पर स्थित है। पटना-रांची राष्ट्रीय राजमार्ग पर रजौली के पास फतेहपुर मोड़ स्थित ’ककोलत-द्वार’ से गोविंदपुर जाने के मार्ग में थाली नामक स्थान से 3 किलोमीटर की दूरी पर ककोलत जलप्रपात है। इस मार्ग में प्रवेश करते ही जलप्रपात की शीतलता महसूस होने लगती है। बिहार पुरातत्व निदेशालय के निदेशक डॉ प्रकाश चरण प्रसाद ने इतिहासविद् डा.शत्रुघ्न दांगी के आग्रह पर जहानाबाद जिला स्थित वाणावर को सुरक्षित, संरक्षित एवं संवर्दि्धत करने के बाद नवादा जिले के इस ऐतिहासिक स्थल को विकसित करने का कार्य बिहार सरकार द्वारा करवाया था।

यहां प्रत्येक वर्ष 14 अप्रैल चैत्र मास यानी विसुआ को मेले के अवसर पर श्रद्धालुओं एवं पर्यटकों की भारी भीड़ जुटती है। अब यह मेला पर्यटन विभाग द्वारा तीन दिनों का आयोजित होता है। ककोलत झरने की खड़ी धार ऊपर से सीधी 160 फीट नीचे गिरने के कारण नीचे की तलहटी में काफी गहरी खाई बन गयी थी, जिससे प्रतिवर्ष मेले तथा अन्य अवसरों पर आने वाले श्रद्धालु व यात्री डूब कर मर जाते थे । इससे निजात दिलाने के लिए बिहार पुरातत्व निदेशालय ने इस खाई को ईंट व पत्थरों से भरवा कर कुंड का आकर्षक रूप दिया है। साथ ही स्त्रियों को स्नान के बाद वस्त्र बदलने के लिए कक्षों का निर्माण करवाया है।

झरने तक पहाड़ी पर चढ़ने के लिए सीढ़ियां, मनोरम प्राकृतिक उद्यान में विश्राम हेतु चबूतरे तथा कैफेटेरिया आदि का भी निर्माण करवाया है। यह स्थल प्राचीन काल से ही काफी शांत, मनोरम, प्रसिद्ध एवं लोकप्रिय रहा है। यही कारण है कि यहां कई ऋषि-महर्षियों ने तपस्या की और राजाओं के अलावा अंग्रेजों ने इसे अपना पसंदीदा पर्यटन केंद्र के रूप में प्रयोग में लाया।

प्रसिद्ध सर्वेयर फ्रांसिस बुकानन ने जब 1811- 12 ई. में इसे देखा व सर्वेक्षण किया तब जो उसने रिपोर्ट प्रकाशित किया उसके बाद से इस स्थल की प्रसिद्धि देश व विदेशों में और फैल गई। मार्च- अप्रैल से लेकर जून-जुलाई तक पर्यटकों का यहां नित्य आवागमन जारी रहता है, उसमें विशेष कर पश्चिम बंगाल ,मध्य प्रदेश ,उत्तर प्रदेश ,उड़ीसा ,झारखंड, छत्तीसगढ़ आदि मुख्य हैं। राष्ट्रीय तथा कई अन्य जलप्रपातों में यह ककोलत- जलप्रपात, गोवा-जलप्रपात, गुरसिंधु-जलप्रपात, सुखलदरी-जलप्रपात, परासडीह-जलप्रपात , करीदह-जलप्रपात, दुर्गावती-जलप्रपात, धुंआकुंड-जलप्रपत आदि के बीच यह जलप्रपात राष्ट्रीय स्तर के चर्चित जलप्रपातों में एक अलग अपनी पहचान बनाती है ।

जनश्रुति के अनुसार इस जलप्रपात से जुड़ी अनेक घटनाएं तथा लोक कथाएं इस क्षेत्र में प्रचलित हैं। एक पौराणिक कथा के अनुसार एक ऋषि से अभिशप्त एक राजा यहां अजगर रूप में झरने के पास रहने लगा । द्वापर युग में जब यहां पांडवगण अपना गुप्तकाल बिताने के क्रम में आये तब उनके दर्शन और आशीर्वाद से वह राजा अपने पूर्व के राजा रूप में आ गया । शाप से मुक्ति के बाद उस राजा ने भविष्यवाणी की कि अब से कोई भी प्राणी जो इस जलप्रपात में स्नान करेगा वह सर्प योनि में जन्म नहीं लेगा । इसी से मिलती जुलती एक और कथा प्रचलित है कि जब यहां कृष्ण और उनकी रानियां झरने में स्नान करने आयीं तब उनके दर्शन और वरदान से राजा कृत को गिरगिट योनि से विमुक्ति मिली थी। यही कारण है कि श्रद्धालुओं का तांता यहाँ सदा इस झरने में स्नान करने के लिए बना रहता है ।

बताया जाता है कि, इस लंबी पहाड़ी में अनेकों झरने हैं जो पहाड़ के दोनों ओर छोटे-छोटे झरनों के माध्यम से भूमि की सिंचाई के काम आते हैं। उसी कड़ी में यहां कोल-महादेव डैम सिंचाई हेतु इस जलप्रपात से ऊपर बना है। यह पर्वत पाषाण कालीन सभ्यता से भी जुड़ा हुआ है, क्योंकि इस पहाड़ी के सर्वेक्षण में अनेक पाषाण कालीन हथियार आदि पुरातत्व विभाग को मिले हैं, जो जिला मुख्यालय ‘नारदीय पुरातत्व संग्रहालय, नवादा’ में रखे गए हैं।

पर्यटन विभाग द्वारा अब तीन दिनों का ककोलत महोत्सव आयोजित होता है, जो प्रत्येक वर्ष चौदह अप्रैल से तीन दिनों तक चलता है। झरने के पास में एक अभी सिंहद्वार बना है, जबकि इसके पूर्व फतेहपुर मोड़ पर बिहार पुरातत्व निदेशालय द्वारा विशाल ककोलत द्वार का निर्माण करवाया गया था। बिहार का यह ठंडे जल का प्रसिद्ध तीर्थ स्थल है ।

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