बौद्ध परंपरा में बुद्ध पूर्णिमा का बड़ा महत्व है। बौद्ध जगत में यह दिन परम पावन और श्रेष्ठ माना जाता है । सिद्धार्थ गौतम के जीवन से जुड़ी तीन प्रमुख घटनाएं आज ही के दिन घटित हुई थी। वैशाख पूर्णिमा के दिन भगवान बुद्ध का जन्म हुआ था । आज ही के दिन उन्हें सम्बोधि की प्राप्ति हुई थी,जिससे वे सम्यक्-संबुद्ध बने और तब से वे “बुद्ध” कहलाये। आज ही के दिन उन्हें महापरिनिर्वाण की भी प्राप्ति हुई थी। विश्व के तमाम बौद्ध तीर्थ स्थल बुद्ध पूर्णिमा के दिन “बुद्धम् शरणम् गच्छामि, धम्मं शरणम् गच्छामि, संघं शरणं गच्छामि” से गूंजायमान हो उठते हैं ।
हिमालय की गोद में नेपाल और भारत की सीमा से सटे कोशल गणतंत्र की राजधानी कपिलवस्तु थी । वहां के राजा शाक्य वंशी शुद्धोधन थे । उनकी महारानी महामाया थी । ईसा के 563 वर्ष पूर्व रानी महामाया संतानवती होने वाली थी । प्रथम पुत्र के जन्म देने के समय प्रथा के अनुसार पीहर जाने का विधान था ।
राजा ने पीहर जाने हेतु रास्ते में सारी सुविधाओं की व्यवस्था करवा दी थी । रानी अपनी परिचारिकाओं और अंग रक्षकों के साथ पीहर की ओर प्रस्थान की । रास्ते में उन्हें लुंबिनी वन का मनोरम दृश्य मिला उसे देख रानी वहां कुछ देर विश्राम करने की ईच्छा प्रकट की । घने साल वृक्षों की छाया में सुगंधित स्थान पा कर महामाया विश्राम करने लगीं, तभी उन्हें प्रसव पीड़ा आरंभ हो गई। सभी परिचारिकाओं की देखरेख में वैशाख पूर्णिमा के दिन रानी महामाया ने पुत्र रत्न को जन्म दिया । जिस स्थल पर तथागत जन्मे थे उस स्थल पर सम्राट अशोक ने अपने सिंहासनारोहनण के 20 वें वर्ष में एक लौह स्तंभ गड़वाया था, वह स्थल रूमनदेई के नाम से विख्यात है ।
उसमें लिखा है “हिद बुद्धे जाते” अर्थात बुद्ध ने यहीं जन्म लिया । बुद्ध को जन्म लेते ही त्रिकालदर्शी महर्षि कालदेवल आये और बिना किसी औपचारिक सम्मान को ग्रहण किए सर्वप्रथम उन्होंने बुद्ध का दर्शन किया । धरती पर इस महामानव को पाकर महर्षि अत्यंत हर्षित हुए और बाद में रो पड़े । यह देख राजा बहुत घबरा कर महर्षि से पूछा कि महाराज! हमारे बालक का कोई अनिष्ट होने वाला तो नहीं है ? तब महर्षि ने उन्हें समझाया कि हे राजन! आप प्रसन्न हों, मैं तो पहले इसलिए हर्षित हुआ कि इस धरती पर हमें सम्यक्- संबुद्ध के दर्शन का मुझे सौभाग्य प्राप्त हुआ और रो इसलिए रहा कि जब यह बालक सम्यक्- संबुद्ध बनकर संसार को ज्ञान बिखेरा उस समय तक मैं काल कलवित हो जाउंगा। बालक के भविष्य की सत्यता को और जानने के लिए राजा ने आठ जानकार ज्योतिषियों को पांचवें दिन बुला लिया ।
इसी दिन बालक का नाम भी सिद्धार्थ रखा गया । उनमें से सात ज्योतिषियों ने बतलाया कि यह बालक यदि राजमहल रह गया तो महा पराक्रमी चक्रवर्ती सम्राट बनेगा और यदि वीत राग को पसंद किया तो यह माया जाल से हटकर सम्यक्- संबुद्ध अर्हत पद को प्राप्त करेगा । परंतु आठवें महर्षि कौण्डिण्य ने बालक के 32 लक्षणों को देखकर यह दृढ़ता पूर्वक कहा कि इस बालक की एक ही गति निश्चित है वह यह कि यह वीत राग को पसंद कर संन्यासी बनकर सम्यक्-संबुद्ध होकर संसार को नया धर्म देगा । इस बीच महारानी महामाया महामानव बुद्ध को जन्म देकर सातवें दिन ही संसार को छोड़ दी । तब उनका लालन-पालन महारानी की छोटी सगी बहन महा प्रजापति गौतमी मौसी (जा माता) ने किया । इसी कारण वह “सिद्धार्थ गौतम” भी कहलाये ।
आशंकित राजा शुद्धोधन ने माया मोह में सिद्धार्थ को बांधने के लिए महाराजा दंडपाणी की सुंदरी कन्या यशोधरा से 16 वर्ष की अवस्था में ही विवाह कर दिया । सिद्धार्थ इस बीच वेद ,उपनिषद, कुश्ती, युद्ध विद्या आदि की शिक्षा गुरु से महल में ही प्राप्त कर ली । पिता द्वारा तीनों ऋतु ओं के अनुरूप बनाए गए वैभवशाली भवन में अपनी पत्नी यशोधरा के साथ रहने लगे । कुछ दिनों बाद यशोधरा ने एक पुत्र को जन्म दिया जिसका नाम सिद्धार्थ ने राहुल रखा । एक दिन सिद्धार्थ राजकुमार महल से बाहर उद्यान जाने की इच्छा प्रकट की,तब उनका सारथी चार सुंदर श्वेत अश्व- युक्त रथ को लेकर सामने आया और उन्हें उद्यान की ओर ले चला । इसी बीच सिद्धार्थ की नजर एक बृद्ध पर पड़ी, उसे देख वे चकित होकर छंद से पूछे – छंद! यह कौन है ? सारथी ने बतलाया यह थका वृद्ध है राजकुमार ! आयु के भार से यह दब गया है अंत में सबों की यही अवस्था आती है । कुमार ने रथ को महल की ओर लौटा लेने को कहा ।
दूसरी बार उद्यान की ओर जाते समय सिद्धार्थ को एक रोगी पर नजर पड़ी वह अशक्त हो कर कराह रहा था । तब फिर राजकुमार ने छंद से पूछा – यह कौन है ? छंद ने उन्हें बताया कि सभी प्राणी व्याधिधर्मी है। तीसरी बार जब राजकुमार उद्यान की ओर निकले तब एक मृतक पर नजर पड़ी तब फिर छंद से पूछा – यह सजा- संवारा रंगीन चादर ओढ़े हरित पलंग पर सोया कौन जा रहा है ? तब छंद ने बताया- कि यह अर्थी जा रही है राजकुमार ! यह भौतिक संसार को छोड़ चुका है । इसके पार्थिव शरीर को लेकर लोग श्मशानघाट ले जा रहे हैं , जहां इसे चिता पर सुलाकर अग्नि को भेंट देंगे । तब फिर कुमार ने पूछा कि, क्या हम सबों की शरीर की यही गति होती है ?
सारथी ने बतलाया- हां राजन् ! सभी प्राणी जराधर्मी है। एक दिन पुनःराजकुमार अपने रथ पर सवार होकर सारथी के साथ उद्यान की ओर जब निकले तब उन्होंने राजपथ पर एक सन्यासी को आते देखा । राजकुमार ने छंद से पूछा यह कौन है ? सारथी ने बतलाया यह सन्यासी है राजकुमार ! यह सांसारिक बंधनों से मुक्ति पाने के लिए वैराग्य जीवन धारण कर लिया है । उसका कषाय वस्त्र, शांत- चित्त, धरती की ओर सन्यासी की नजर सिद्धार्थ को बहुत भाया और मन ही मन निश्चय किया कि संभव है मुक्ति का यही सही मार्ग हो ।
सिद्धार्थ महल की ओर लौट आए और फिर चिंतन में मग्न हो गए । सिद्धार्थ ने सोंचा कि दुखों से मुक्ति का मार्ग कोई अवश्य होगा उसे ढूंढना होगा। इस सोंच में एक दिन उन्होंने राज महल त्यागने का निश्चय कर लिया और 29 वर्ष की अवस्था में उन्होंने आधी रात को अपने प्रिय पत्नी यशोधरा और नवजात शिशु राहुल को छोड़कर महल से निकल पड़े । सोचा कि अपने कोमल शिशु का मुख एक बार देख लूं और गोद में उसे ले लूं ,किंतु उसकी मां कहीं जग ना जाए जो उसे अपने अंक पाश में बांधे सो रही है । उसे जग जाने के भय से अपने ऊपर काबू रखकर महल से प्रभारियों से नजर बचाकर पूर्व से अपने प्रिय घोड़े कंथक पर सवार होकर अनोमा नदी तट पर जा पहुंचे । वहां तक शाक्यों का राज्य था । उसके उस पार मगध साम्राज्य का क्षेत्र पड़ता था ।
वहां उन्होंने अपना रेशमी वस्त्र और आभूषण उतार कर सारथी छंद को दे दिया, फिर स्वयं कषाय वस्त्र धारण कर अपनी तलवार से सिर के बाल को काट डाला और हाथ में भिक्षा पात्र लेकर छंद और कंथक को लौट जाने को कहा। किंतु, वे दोनों लौटना नहीं चाहते थे । अंत में उन्हें बहुत समझाया-बुझाया और वस्त्र, आभूषण पिता को दे देने के लिए कह कर छंद को लौटा दिया तथा पिता और यशोधरा को भी समझा देने को कहा । कहा जाता है कि उनका अति प्यारा कंथक घोडा़ बार-बार उन्हें मुड़-मुड़ कर देखता और अश्रु बहाता ,जब वे आंखों से ओझल हो गए तब वह अपना प्राण वहीं त्याग दिया । सन्यासी वेश धारण कर सिद्धार्थ के यह गृह त्याग की घटना “महाभिनिष्क्रमण” कहलाता है ।
सिद्धार्थ अब गांव-गांव भिक्षा-पात्र लेकर जाते और जो कुछ भी उन्हें मिलता उसे ही खाकर अपना जीवन व्यतीत करते । इस प्रकार भटकते हुए वे मगध राज्य की राजधानी राजगृह पहुंचे । यह सुनते ही राजा बिंबिसार स्वयं उनसे मिलने आए और उन्हें अपने पिता, प्यारी पत्नी तथा अबोध बालक के पास लौट जाने को कहा । बहुत समझाया किंतु जब सिद्धार्थ नहीं माने तब उन्होंने यहां तक कहा कि आप यहीं बस जाएं, आप हमारे परम मित्र के पुत्र हैं ,मैं अपना आधा राज्य आपको दे दूंगा, फिर भी वे एक न माने ।
उधर सिद्धार्थ के गृह त्याग और आध्यात्मिक मार्ग पर निकल पड़ने की बात ज्योंहि महर्षि कौण्डिन्य को मिली तो वे अपने चारों मित्र भद्दिय, महानाम, वप्पा और अश्वजीत को साथ लेकर सिद्धार्थ के पास आ मिले और सभी एक साथ गुरु की खोज में निकल पडे़ । उन दिनों उत्तर भारत में गुरु आराड कलाम की बहुत प्रसिद्धी थी। अतः ये सभी उन्हीं के पास पहुंचे । उन्होंने इन्हें अनंत तक पहुंचने की स्थिति तक की शिक्षा दी। उन दिनों यह “सातवां ध्यान” कहलाता था ।यहां तक पहुंचने में सिद्धार्थ को कोई देर न लगी। गुरु ने उन्हें “आकिचन्यायतन अरूप समापत्ति” और सांख्य दर्शन की भी शिक्षा दी । किन्तु सिद्धार्थ जिस मुक्तिपथ की खोज में निकले थे, वह उनके वश की बात न थी। उन्होंने बताया कि सिद्धार्थ! जिसे तुम पाना चाहते हो वह सीखाने वाला तो इस संसार भर में कोई नहीं है ।
तब वे सभी पंच वर्गीय साथी दूसरे गुरु उद्दक रामपुत्र नामक आचार्य के पास गए । रामपुत्र ने उन्हें “आठवां ध्यान” की शिक्षा दी, जिसमें ध्यान की एक ऊंची अवस्था की स्थिति होती है जिसमें संवेदनशीलता और असंवेदनशीलता का कोई भेद नहीं रह जाता । आचार्य ने उन्हें “नैव सांग्यना संग्यातन” का भी ज्ञान प्रदान किया और सभी शिष्यों को गुरु पद संभालने की प्रार्थना की। फिर भी सिद्धार्थ ने इसे अस्वीकार कर दिया, क्योंकि उन्हें जरा- मरण का निदान ढूंढना था, जो अब तक उन्हें नहीं मिल सका था । तब वे अन्य गुरुओं के पास होते हुए उरूवेला पहुंचे ।
सिद्धार्थ गौतम ने यहां गुरुपादगिरी में घोर तपस्या की फिर भी उन्हें ज्ञान की प्राप्ति नहीं हुई । तब वे निरंजना के तटपर एक पीपल वृक्ष के नीचे अन्न-पानी त्याग कर शरीर को कृषकाय बना लिया । ध्यान में वे इतने लीन हो गए कि लगा की एक रात्री उनका प्राणांत हो जाएगा, तब उसी क्षण उनकी मां महामाया प्रकट हो गई और सामने खड़ी होकर अपने बेटे की यह दशा देख पूछी- कि तुमने यह दशा क्यों कर ली ? ध्यान में ही आहट पाकर वे पूछे कि तुम कौन ? तब उनकी मां बोली ” मैं अभागिन उस बालक की मां हूँ जिसे अपनी कोख में दस माह पालकर जन्म देने के बाद सातवें दिन ही उसे छोड़ कर सदा के लिए चल बसी थी । आज उसकी यह दशा देख उससे मिलने आई हूँ । तब सिद्धार्थ ने अपनी माँ से कहा कि हे माँ ! तुम्हारा यह पुत्र मृत्यु को प्राप्त नहीं करेगा । वह जरा- मरण का मार्ग ढूंढ कर संसार का कल्याण करेगा और नया धर्म देगा । ध्यान निमग्न गौतमीपुत्र के शरीर से स्वर्णिम आभा निकल रही थी ।
संयोग से पास के ही सेनानी ग्राम जो आज बकरौर कहलाता है, वहां के एक अमीर घर की बाला सुजाता को पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई थी। वह पुत्र की प्राप्ति होने पर वट वृक्ष देवता की पूजा करने तथा खीर चढाने की मनौती मानी थी । उसकी पूर्ति हेतु दासी तथा सहेलियों सहित वह वहां पूजा करने गई। सिद्धार्थ को देख वह समझ बैठी कि साक्षात यह वृक्ष देवता ही प्रकट हैं । उन्हें वह पूजा कर सोने की थाल में लायी खीर को खाने के लिए अर्पित की और सहेलियां परिक्रमा कर यह गीत गाने लगी- जिसका भाव था कि “वीणा के तार को इतना न कसो की वह टूट जाए और इतना ढीला न छोड़ो कि वह बजे ही नहीं” अर्थात् मध्यम मार्ग का अनुशरण करो ।
यही मध्यम मार्ग का रास्ता तथागत को भा गया और वैशाख पूर्णिमा के दिन उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई । वे सम्यक् -संबुद्ध बने और “बुद्ध” कहलाये। जहां उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई वह स्थान “बोधगया” के नाम से प्रसिद्ध हुआ और जिस ज्ञान को लोगों के बीच उन्होंने बांटा वह “बौद्धधर्म” के नाम से जाना जाता है। ज्ञान प्राप्ति के बाद उन्होंने विभिन्न सिद्धांतों का प्रतिपादन किया। उनमें चार आर्य सत्य, अष्टांगिक मार्ग, शील,समाधी और प्रग्या आदि तथा शांति,करुणा और मैत्रेय को पालन करने का उपदेश दिया। ज्ञान प्राप्ति के बाद सारनाथ में पंचवर्गीय भिक्षुओं के सामने उन्होंने जो प्रथम उपदेश दिया,वह बौद्ध जगत में “धम्म-चक्र-परिवर्तन” कहलाता है। बुद्ध का संदेश समस्त दक्षिण पूर्व एशिया सहित विश्व के अन्य देशों में भी प्रचारित है। बोधगया का विश्वदाय महाबोधि टेम्पल विश्व के समस्त बौद्ध मंदिरों में अति पवित्र, पूजित और सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।




