Monday, March 2, 2026
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तक्षशिला विश्वविद्यालय : चरमपंथी उन्माद के कारण हुए विध्वंस की गवाही दे रहे टूटे-फूटे शिलालेख

वर्तमान समय में अभी भी वहां तोडी़ गई मूर्तियों और प्रतिमाओं के ढेर सारे अवशेष बिखरे पडे़ हैं, जिसे 1980 में यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर में लिए जाने के बाद उसे देखने दूर-दूर से सैलानी व पर्यटक आते हैं।

विश्व का सर्वप्राचीन शिक्षा और विद्या का केंद्र तक्षशिला अरब और तुर्की के मुसलमानों ने यहां आकर लूट के साथ साथ ज्ञान की भूमि, मंदिर,मठ और मूर्तियों को पूरी तरह से नष्ट और विध्वंस किया। विश्वविद्यालय ईसापूर्व छठी शताब्दी से सातवीं शताब्दी के बीच बना था। इस विश्वविद्यालय की प्रसिद्धी 700 ई.पू. से 500 ई. तक शीर्ष पर बनी रही। बाद में शक, हुण और मुस्लिमों द्वारा बर्वादी की भेंट चढ़ी। विश्व प्रसिद्ध यह विश्वविद्यालय अफगानिस्तान के गांधार देश की राजधानी तक्षशिला में स्थापित थी, जो वर्तमान में भारत से पाकिस्तान बने अलग देश में पंजाब प्रांत के रावलपिंडी जिले की मात्र एक तहसील तथा विश्वस्तरीय पुरातात्विक स्थल के रूप में जानी जाती है।

यह स्थल पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद से मात्र 32 किलोमीटर की दूरी पर उत्तर- पूर्व में अवस्थित है। इसके पास से ही जी.टी. रोड गुजरती है। इस स्थल को 1980 में यूनेस्को ने विश्व धरोहर की सूची में सम्मिलित कर लिया है। वर्ष 2010 में विश्व विरासत फण्ड ने इसे उन 12 स्थलों में सम्मिलित किया है, जो पूर्ण रूप से क्षति के कगार पर थे। यूनेस्को ने अपनी रिपोर्ट में इसकी बर्वादी का प्रमुख कारण अपर्याप्त प्रबंधन, लूट, युद्ध, संघर्ष और इसको विकास न करने की मंशा बताया है।

प्राचीन भारत में गंधर्वों का देश गान्धार सिंधु नदी के दोनों किनारों पर अवस्थित था । त्रेतायुग में भरत पुत्र तक्ष और पुष्कल दोनों भाइयों द्वारा तक्षशिला और पुष्करावती नामक अपनी-अपनी राजधानियों को बनाने, बसाने और वहां राज करने की चर्चा वाल्मीकि रामायण में मिलती है। तक्षशिला सिंधु नदी के पूर्वी तट पर अवस्थित था ।

गौतम बुद्ध के जमाने में गांधार प्रदेश के राजा पुक्कुसाति थे। परंतु , छठी शताब्दी में ही फारस का शासक कुरुष ने सिंधु प्रदेश पर आक्रमण कर कब्जा जमा लिया, जो करीब 200 वर्षों तक उसके उत्तराधिकारियों द्वारा शासित रहा। सिकंदर आक्रमण के समय तक्षशिला एक बड़ा नगर के रूप में प्रसिद्ध था। यहां घनी आबादी थी, उपजाऊ भूमि से युक्त कुशल व्यवस्था से यह प्रदेश शासित था । सिकंदर से वहां के शासक ने मित्रता बना ली थी। उसकी मृत्यु के बाद उसका पुत्र आंभी भी सिकंदर का मित्र बन गया था।

बाद में चंद्रगुप्त मौर्य ने भारत के उत्तरी पश्चिमी सीमा क्षेत्रों से सिकंदर के सिपहसालारों को मारकर भगा दिया और तक्षशिला पर आधिपत्य जमा कर उत्तरापथ की राजधानी बना ली। बाद उसका पुत्र बिंदुसार, पौत्र सूसीम और प्रपौत्र कुणाल भी वहां का शासक बना रहा। परंतु मौर्य शासकों के पतन के बाद यूनानियों ने उस पर कब्जा जमाया। फिर 1 ली शताब्दी ईसापूर्व में सीथियों और बाद ईस्वी सन् 1 ली शताब्दी में शकों ने आधिपत्य जमाया। कनिष्क और उसके निकट के वंशजों का भी क्षेत्र पर आधिपत्य रहा। इसके बाद के वर्षों का इतिहास यहां का अंधकार पूर्ण है।

पांचवी शताब्दी में हूणों ने भारत पर आक्रमण कर लूट मचाया शिक्षा केंद्रों और मंदिरों को क्षति पहुंचाया, बाद मुस्लिमों ने तक्षशिला को यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर में सम्मिलित करने के पूर्व तक इसके अस्तित्व को मिटाने में कोई कसर न छोड़ी ,क्योंकि उसे पता था कि विश्वविख्यात विद्या का केन्द्र नालंदा विश्वविद्यालय को 12 वीं शताब्दी में बख्तियार खिलजी ने विध्वंस कर भारतीय संस्कृति,शिक्षा और विद्या को सदा के लिए समाप्त करने हेतु आग तक लगायी थी।

बताया जाता है कि वैदिक काल के अंतिम वर्षों तक इसकी ख्याति नहीं बढी़ थी, जबकि शिक्षा एवं विद्या के केंद्र रूप में यह शीर्ष पर प्रतिस्थापित थी। बौद्ध काल में इसकी महत्ता चरम पर पहुँची। यहां आयुर्वेद, विधि, राजनीति, शस्त्र विद्या,धनुर्विद्या, दर्शन शास्त्र, ज्योतिष शास्त्र, युद्ध शास्त्र, सर्प शास्त्र, गणित, व्याकरण,वाणिज्य, राज धर्म, संगीत, नृत्य, तंत्र, चित्र कला आदि 64 विद्याओं की शिक्षा दी जाती थी। किंतु कर्म कांड की शिक्षा वाराणसी में दी जाती थी। यह विश्वविद्यालय हिन्दू एवं बौद्ध दोनों के लिये अति महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में प्रतिष्ठापित थी।

संस्कृत साहित्य के प्रख्यात वैयाकरण जो गांधार प्रदेश के ही शालातुर ग्राम के निवासी थे, यहीं से शिक्षा ग्रहण की थी। यहां के शस्त्र-शास्त्र विद्यालय में विभिन्न देशों के करीब 103 राजकुमार पढ़ते थे। यहां अनुशासन इतना कडा़ था कि राजकुमारों को भी दंड देने का प्रावधान था। गौतम बुद्ध के समकालीन प्रसिद्ध वैद्य जीवक,राजा प्रसेनजित आदि भी इसी विश्वविद्यालय से शिक्षा ग्रहण की थी।

महर्षि चाणक्य वहां के अध्यापक रहे थे। उन्होंने ही अपने शिष्य चंद्रगुप्त को साथ लेकर मौर्य साम्राज्य की स्थापना की थी । यह विश्वविद्यालय हिंदू एवं बौद्ध दोनों के लिए अति महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में प्रतिष्ठापित था। तक्षशिला विश्वविद्यालय ऐतिहासिक रूप से तीन महत्वपूर्ण मार्गों के संगम स्थल पर स्थापित था। पहला- उत्तरापथ, यानी ग्रैंड ट्रंक रोड जो गांधार से मगध को जोड़ता था। दूसरा- उत्तर पश्चिम का मार्ग, जो कापिश, पुष्कलावती आदि प्रमुख स्थानों से गुजरता था और तीसरा- सिंधु नदी मार्ग, जो श्रीनगर, मान सेरा, हरिपुर घाटी से रेशम मार्ग द्वारा उत्तर से दक्षिण हिंद महासागर को मिलाता था।

तक्षशिला की खोज जनरल कनिंघम ने सन् 1863 ईस्वी में जमीन में दबे मलवों की खुदाई कर इसकी भव्यता को पता लगाया था। यह स्थान व्यापार का भी बड़ा केंद्र था। यहां से मोतियां, चंदन, रेशम, मसाला आदि के व्यापार होते थे। यहां विकसित शहर थे, जहां पक्के मकान, जल निकासी की उत्तम व्यवस्था, बाजार प्रांगण,मंदिर, मठ आदि विद्यमान थे। 5 वीं सदी में चीनी यात्री फाह्यान यहां आया था, उसने अपने यात्रा वृतांत में यहां के शहर के साथ विश्वविद्यालय की भव्यता को विस्तार से वर्णन किया है, जिसे उन दिनों उसने अपनी आंखों से देखा था। किंतु ,जब सातवीं शताब्दी में चीन का ही एक भिक्षु श्यानजांग नामक यहां आया तो इसे विरान और ध्वस्त पाया।

इतिहासकारों का मत है कि शक और हूण आक्रांता जब भारत आए तो उन्होंने सिर्फ यहां लूटा किसी विरासत को बर्बाद नहीं किया । परन्तु अरब और तुर्की के मुसलमानों ने यहां आकर लूट के साथ साथ ज्ञान की भूमि, मंदिर,मठ और मूर्तियों को पूरी तरह से नष्ट और विध्वंस किया। वर्तमान समय में अभी भी वहां तोडी़ गई मूर्तियों और प्रतिमाओं के ढेर सारे अवशेष बिखरे पडे़ हैं, जिसे यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर में लिए जाने के बाद उसे देखने दूर-दूर से सैलानी व पर्यटक आते हैं।

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