Monday, March 2, 2026
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“टिकारी सर्किल”: जब ब्रिटिश शासन ने बड़े जमींदारों और रियासतों के सारे अधिकार छीन लिए

ब्रिटिश काल में अंग्रेज बड़े रियासतों पर प्रशासनिक नियंत्रण रखने एवं बड़े जमींदारों से कर वसूलने के लिए “सर्किल” की स्थापना करते थे। उन दिनों टिकारी रियासत एक बड़ा रियासत दरभंगा, हथुआ, डुमरांव आदि की तरह था । टिकारी राज की रियासत 7,500 वर्ग कि.मी.में फैली थी तथा इसमें 2,046 गांव शामिल थे। पूर्व में इसमें 715 राजस्व गांव सम्मिलित थे, जिससे साढे़ सात लाख की वार्षिक आय होती थी, वही 1940 में यह आय बढ़कर 50 लाख की हो गई थी। तब से लगातार टिकारी राज की तूती ब्रिटेन तक गूंजती रही। सन् 1757 के पहले जमींदारों के पास न्यायालय, अपनी सेना,अपना ध्वज आदि रखने का पूर्ण अधिकार था, जिसे सिराजुद्दौला के पतन के बाद अंग्रेजों ने ‘ईस्ट इंडिया कंपनी’ के माध्यम से बडे़ रियासतों के सारे अधिकार छीन लिए। यहां तक की सेना रखने तक का भी अधिकार ले लिया। उन्हें सिर्फ बड़े जमींदार बनाकर उनसे टैक्स वसूलते और जो जमींदार टैक्स नहीं देते उनकी जमींदारी को वे नीलाम कर देते।
उत्तरी भारत के ‘र्इंडो-गैंजेटिक-प्लेन’ में टिकारी राज एक समृद्ध प्रसिद्ध बडी़ रियासत थी। अंग्रेज लोग उन दिनों भारत पर शासन बंगाल के मुर्शिदाबाद से करते थे। टिकारी राज का नियंत्रण अंग्रेज अधिकारी गया के ‘व्हाईट हाउस’ और ‘रेड हाउस’ में रह कर करते थे। आधा गया उन दिनों टिकारी राज का ही था। गया का टिकारी रोड राजा का बनवाया हुआ आज भी गया में मशहूर है।

ऐसे तो टिकारी का इतिहास काफी प्राचीन करीब तीन हजार वर्ष पूर्व से मिलता है, जब भारत के इतिहास में मगध का इतिहास महत्वपूर्ण था, किंतु मध्य काल में 18 वीं शताब्दी के प्रारंभ 1707 ई.से धीर सिंह व वीर सिंह के जमाने से क्रमबद्ध इतिहास टिकारी राज का मिलता है। यू.पी. के रहने वाले अजब सिंह के पुत्र वीर सिंह कन्नौज से अपने पूर्वजों का पिंडदान करने गया जी आए थे। उन्हें यहां का वातावरण बहुत अच्छा लगा, अतएव वे यहां बस जाना चाहते थे । इस हेतु उन्होंने उतरेन के नवाब हिम्मत खाँ की सेना में आकर भर्ती हो गए। वे अपनी वीरता,सैन्य दक्षता, पराक्रम तथा नेतृत्व कर्ता आदि गुणों से फौजदार बनकर कई परगनों पर कब्जा जमाया। जिसका समाचार जानकार व देख कर पाली तत्कालीन अजिमाबाद (पटना) के सुबेदार सैय्यद हुसैन अली खाँ के विश्वास पात्र अधिकारी कंचन सिंह ने अपनी पुत्री का विवाह इनसे कर दिया । पत्नी को लेकर वे पहले उतरेन में ही रहने लगे,जहाँ उन्हें एक पुत्र त्रिभुवन सिंह पैदा लिया । बाद वे ऐतिहासिक एवं प्राचीन बौद्ध कालीन विशाल गांव लाव के दुर्ग व महल में रहने लगे और इसे ही मुख्यालय बनाया। वहां उन्हें दो पुत्र पैदा हुए । दूसरा पुत्र सुंदर सिंह जो लाव में पैदा लिया वह अति बलशाली, तेज,सुंदर और पराक्रमी निकला। उसी वंश में अंतिम राजा कैप्टन गोपाल शरण हुए, जो आजादी के पूर्व तक टिकारी राज के ‘महाराजा’ बने रहे।अलिवर्दी खाँ के जमाने में सुन्दर सिंह अपनी राजधानी टिकारी रखी । अंग्रेजों ने दरभंगा,डुमरांव,हथुआ आदि रियासतों की तरह टिकारी राज रियासत को भी अपना न्यायालय, अपनी आर्मी तथा झंडा आदि रखने के अधिकार से वंचित कर दिया । परन्तु उन दिनों गया आने वाले हिन्दू, बौद्ध आदि यात्रियों से जो “पिलग्रिम (यात्री) टैक्स” वसूला जाता था, उनमें से 10℅ प्रतिशत हिस्सा टिकारी राज को मिलने का हक प्रदान कर दिया, जिससे टिकारी राज को अपनी वृहत् जमीन्दारी बन गई और ये बडे़ जमींदार के रूप में गिने जाने लगे ।

टैक्स संग्रह करने तथा टिकारी राज का शासन अपने कब्जे में रखने के लिए अंग्रेजों ने मोरहर नदी के पश्चिमी तट पर एक “सर्किल” का निर्माण करवाया,जहाँ राजा मित्रजीत ने पूर्व में ‘पंचदेवता’ नामक धार्मिक स्थल और मंदिर का निर्माण करवाया था तथा सुन्दर तालाब और भवन भी बनवाए थे। उसी मंदिर परिसर के आगे अंग्रेजों ने कोठी जो सर्किल कहा जाता था,निर्माण करवाया। उसमें जाने के लिए एक बडा़ गेट बनवाया जो लाल सुर्ख़ियों से दस फीट चौड़ी सड़क के साथ सुशोभित था। सड़क के दोनों ओर अशोक और इक्लीप्ट्स के पेड़ लगवाये वे सर्किल की शोभा बढा़ते थे। सर्किल भवन लोहे के मजबूत गाटर से निर्मित थे,जो भव्य सुंदर एवं आकर्षक थे।कोठी में तीन बड़े हॉल बने थे ,जो आपस में एक दूसरे से जुड़े हुए थे। मेन हॉल में चारों तरफ से दरवाजे खुलते थे। मेन हॉल के दाएं और बाएं उत्तर और दक्षिण में 20-20 कमरे बने थे, जो 25 ×25 फीट के लंबे- चौडे़ थे। एक 40″ इंच की मोटी दीवारों से बनी “बारादरी” भी थी । बीच के हॉल की दीवारों में ठंड से बचने के लिए दीवारों में अंगिठी सज्जित थे। शिवालय परिसर के सामने एक दो मंजिला बँगला निर्मित था, जहां बैठकर राजा नदी का अक्सर आनंद लेते थे। इसी कमरे से सटे मोटी दीवारों से युक्त एक अनोखा गोल भव्य तालाब भी निर्मित था, जिसमें रंग-बिरंगी मछलियाँ नैयनाभिराम के लिए पलती थीं।

प्राचीन काल से ही इस पवित्र पंचदेवता स्थल पर छठव्रती “छठ व्रत” का त्योहार करते थे। वे तालाब में स्नान करते और ‘पंचदेवता’ स्थित सूर्य सहित मंदिर में स्थापित अन्य देवताओं पर जल अर्पण और सूर्य भगवान की आराधना करते थे। किंतु, बाद में बाढ़ की विभीषिका ने तालाब को तोड़ दिया। जिसके टूट जाने से अब व्रती पवित्र नदी में ही स्नान कर छठ व्रत के नियमों का पालन करते हैं। फिर भी, यहां आज भी छठव्रतियों की भारी भीड़ होती है। मंदिर परिसर में छठ व्रत का मेला लगता है।

मंदिर परिसर के सामने उत्तर में एक लाल बिल्डिंग है, जो पहले ‘कचहरी’ के रूप में प्रयुक्त होता था। वही टिकारी- बेलागंज मार्ग में ‘पंच देवता’ के पास ही मोरहर नदी तट के सटे पश्चिमी किनारा जो चकमठ गांव तक जाता है, वहां तक प्राचीन जमाने में राजा का सुन्दर बाग था, जो विभिन्न प्रकार के फलों और फूलों से सुशोभित रहता था । वह पत्थर और चूने के दीवारों से आवृत और सुरक्षित था, जिसके अवशेष आज भी नदी के किनारे देखने को मिलते हैं।

पूर्व से लेकर हाल तक के वर्षों तक ज़ो इस सर्किल में जाने के रास्ते लाल सुर्ख़ियों से सज्जित और अशोक तथा इक्लिप्टस के पेड़ों से सुश़ोभित थे,उसे अच्छी हालत में मैंने अपनी आंखों से देखा था। आजादी के बाद भी वह ऐतिहासिक स्थल बहुत दिनों तक एक सुरक्षित स्मारक के रूप में शोभायमान था। फिर बाद के वर्षों में सरकारी उपेक्षा और राजघराने की दुर्दशा के कारण यह ऐतिहासिक स्मारक बर्बाद हो गया ।

फिर भी कुछ हाल के वर्षों में 1966 ई.से लगायत 1970-71 ई. तक सर्किल परिसर में “बुनकर सहयोग समिति” द्वारा रंगीन कंबल बुनने और निर्माण की ट्रेनिंग लोगों को दी जाती थी,जिससे बडी़ संख्या में लोग यहां से ट्रेनिंग पाकर देश के विभिन्न भागों में रोजगार प्राप्त कर जीवन-यापन कर रहे हैं। सरकार की उपेक्षित नीति से यह ट्रेनिंग केंद्र बंद हो गई है और वह यूनिट भी अब यहां से खत्म कर दी गई है। बाद के वर्षों में सर्किल परिसर को स्थानीय लोगों के हाथों बेच दी गई है, जहाँ अब खेती होती है। इस प्रकार टिकारी राज का यह महत्वपूर्ण ऐतिहासिक विरासत अब इतिहास के कब्र में दफन हो चुका है।

 

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