“अभी उम्र कुल तेईस की थी, मनुज नहीं अवतारी थी,
हमको जीवित करने आई, बन स्वतंत्रता नारी थी।
बुंदेलों हरबोलों के मुंह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी।”
झांसी की रानी के प्रति कवित्री श्रीमती सुभद्रा कुमारी चौहान की ये पंक्तियां अंग्रेजों के अत्याचारों एवं देश को गुलामी से मुक्ति दिलाने के लिये अपने प्राणों की बाजी लगा देने वाली नीर्भिक, साहसिक एवं मातृभूमि के प्रति सच्ची भक्ति रखने वाली वीर वीरांगना लक्ष्मी बाई के प्रति लिखी गई थी।
लक्ष्मी बाई का जन्म 19 नवंबर 1835 ईस्वी में वाराणसी के अस्सी घाट में एक महाराष्ट्रीयन ब्राम्हण परिवार मोरोपंत तांबे और माता भागीरथी बाई के घर हुआ था। बचपन से वह काफी चंचल तथा निर्भीक थी। मोरोपंत बाजीराव पेशवा द्वितीय के यहां उनके पिता प्रधान सेवक पद पर कार्य करते थे। जन्म के बाद माता ने उसका नाम “मणिकार्णिका” रखा था,किंतु प्यार से लोग उसे “मनु” कहते थे। जबकि बाजीराव पेशवा उसकी चंचलता से मुग्द्ध होकर उसे”छबीली” नाम से पुकारते थे।तीन साल की उम्र में ही उसकी माता का देहांत हो गया था। मां के निधन के बाद वह पिता के साथ ‘बिठूर’ आ गई थी । बिठूर में आते ही वह बाल्यावस्था में ही अपने साहस का एक अद्भुत परिचय दी थी।
अंग्रेजों ने जब जबरन अपना झंडा यूनियन जैक राजा श्रीमंत बाजीराव पेशवा के ध्वज को उतार कर अपना प्रभुत्व प्रदर्शन करने तथा रियासतों के बीच भय पैदा करने के उद्देश्य से फहराया था। इस अन्याय के विरुद्ध किसी ने कोई आवाज उठाने तक की हिम्मत नहीं की थी। परंतु साहसिक मणिकर्णिका ने आधी रात को ही अंग्रेजों के उस फहरते यूनियन जैक को उतार कर उस पर बिठुर राज के केसरिया झंडे को लगा दिया था। दूसरे दिन जब यह अंग्रेजों ने देखा तो देखते ही वे बौखला उठे और पता लगाने के लिये अपने सैनिकों को कहा कि आखिर यह काम किसने किया है ? उसे पता लगाओ और पकड़ कर मेरे सामने लाओ, उसे मृत्यु के घाट उतार दिया जायेगा। किंतु सच्चाई की बात तो किसी को पता थी नहीं। अतः पता लगाने के लिये लोगों पर जुल्म ढाना अंग्रेजों ने शुरू कर दिया। निर्दोष लोगों को बडे़, बुढे,महिला, युवक,युवतियाँ सबों को कोडो़ं से पीटना आरंभ कर दिया, अन्य यातनाएं देने लगे। फिर भी कुछ पता उन्हें नहीं चला। परंतु जब मणिकर्णिका सखियों के साथ खेल रही थी तब उस वक्त जब उसकी सखियों ने पूछा कि तुम पीठ में पीछे क्या छुपा रखी हो? तब मनु ने उस युनियन जैक को सबों के सामने दिखाया और कहा चलो अब हम इसे पतंग बनाते हैं।
उसी दिन बठुर राज के किले में “महारानी विक्टोरिया” की एक आदम कद प्रतिमा पूरे भारत में अपनी सत्ता कायम करने और उसे प्रदर्शित करने के उद्देश्य से स्थापित की गई थी। उस मूर्ति को अनावरण करने के लिए बडे़ अंग्रेज अफसर, बड़ी संख्या में सैनिक तथा लोग एकत्रित हुए थे। तब उस सुरक्षा भरी भीड़ में सैनिकों के बीच कुबड़ का रूप धारण कर पीठ पर बारूद का गोला छिपाये क्रांतिकारी वीर उस स्थान पर आये और मूर्ति में बारूद स्थापित कर वहां से निकल गये। इसी बीच अंग्रेजों के उच्च अधिकारियों को आने का समय भी हो गया था।जब इसकी सूचना ज्योंहि अंग्रेज अफसरों को मिली तब वे सभी सैनिक सहित वहां से उन्हें आगवानी करने के लिए निकल पड़े। इसी अवसर का लाभ उठा कर क्रांतिकारियों ने महारानी विक्टोरिया की प्रतिमा को विस्फोट कर उड़ा दिया और उसी समय मनु ने भी अपने पतंग का धागा काट कर धधकती अग्नि में अंग्रेजों के ध्वज को भेंट कर दी। इससे अंग्रेज अब और भी बौखलाये,किंतु उन्हें कोई चारा नहीं चला और न फिर अंग्रेजों ने अपनी रानी विक्टोरिया की मूर्ति को ही इन क्षेत्रों में स्थापित करने की हिम्मत जुटा पायी।
–क्रमश:




