मांगणियारों का रहन-सहन हिन्दुओं और मुसलमानों दोनों से मिलता-जुलता रहा है। औरंगजेब के समय में इन्हें मुसलमान बनाये जाने के बाद भी आजतक ये हिंदुओं की रस्म-रिवाजों की भांति शादी-विवाह, श्राद्ध व नुक्ता कार्य आदि संपन्न करते हैं। इनकी औरतों की वेश-भूषा भी हिंदुओं की भांति है। ओढ़नी, कांचली, घाघरा, कुर्ती आदि हिंदू औरतों की तरह ही ये पहनती हैं।
17 वीं सदी में भारत में मुगल बादशाह औरंगजेब का शासन था। उसने संगीत कला में निपुण, गांव-गांव में मांग कर गुजारा करने वाली “मांगणियार” जाति को जबरन मुसलमान बनाया था। यह जाति आज भी उदर पूर्ति के लिए संगीत कला में दक्ष होते हुए भी गांव-गांव में जाकर दर-दर ठोकरें खाते हुए भीख मांगने को मजबूर हैं। मांगने से पूर्व ये खमाघणी- ‘अन्नदाता’ और ‘शुभराज्’ शब्द का प्रयोग करते हैं। देश को आजाद हुए करीब आठ दशक बीतने को है,परन्तु आजतक इनके साथ तिरस्कार का ही व्यवहार मिलता रहा है। इनके उत्थान के लिए किसी भी सरकार ने आजतक कोई क्रियाशील कदम नहीं उठायी है। इनकी दशा,रहन-सहन व दरिद्रता देखनी हो तो उनके निवास स्थान पर देखा जा सकता है। इनके टूटे-फूटे घर, झोपड़ियां, अधूरे बिना फर्श के मकान उनके दरिद्रता की कहानी कहते हैं। मांग कर जीवन बसर करने के कारण ही इन्हें “मंगणियार” से पुकारा जाता है।
मान्यता है कि मांगणियार की उत्पत्ति परिहार वंश के राजपूतों से हुई है। राठौड़ वंश के थरपार राजा ‘नागणेचिया देवी’ का परम भक्त था। वह अत्यंत दयालु एवं धार्मिक प्रवृत्ति का था। किंतु वह अचानक कोढ़ रोग से पूर्ण रूप से ग्रसित हो गया और उसकी मृत्यु हो गई। तब राजा के ज्योतिषियों ने बताया कि उनकी आत्मा की शांति के लिए उनके वंश के किसी एक को जोगी बनना होगा। परंतु उनके परिवार व वंश का कोई भी व्यक्ति तैयार नहीं हुआ। तब आखिरकार देवी का पुजारी ही जो परिहार जाति के राजपूत थे,वही इस कार्य को करने के लिए तैयार हो गये। तब इस योगी को खाने-पीने, रहन-सहन, शादी, मरण आदि पर होने वाले सारे खर्च को राज परिवार की ओर से वहन किये जाने की घोषणा की गई। तब वही जोगी- “राजा” के दाह संस्कार स्थल पर लगातार 12 दिनों तक बैठा गीत गाता रहा। यह परंपरा आज भी मांगणियार जाति के लोग उस परंपरा को निभाते हैं।
धीरे-धीरे राज परिवार की ओर से सहायता देना बंद हो गया। तब ये मांगणियार लोग अपने भरण-पोषण के लिए गांव-गांव जाकर और बजाकर भीख मांगना आरंभ कर दिया। तबसे उच्च श्रेणी के लोग इनका तिरस्कार करने लगे। इसी तिरस्कार का प्रतिफल हुआ कि यह एक अलग जाति का रूप ले लिया और तबसे ये ‘देघड़ा मांगणियार’ कहलाने लगे।
आज इनकी अनेक उपजातियां हैं यथा–देघड़ा, सोनलिया, घोला, ठाठी, डूम, दमामी मीर,मीरासी,गुणसार,जीणा,संजात,डगा,मोड़, लंगा आदि नामों से ये जातियां भारत में पायी जाती हैं। पूर्व में ये पूर्णतः हिंदू थे,परंतु औरंगजेब के जमाने में इन्हें जबरन मुसलमान बना दिया गया। “लंगा” कही जाने वाली मांगणियार जाति सिर्फ मुसलमानों के यहां ही गान-बजान करने जाती है।
यह जाति संगीत कला में अत्यंत निपुण होती हैं। मांगणियारों में ढोल बजाने वाले को-ढोली, नगाड़ा बजाने वाले को-नगारसी, छोटे जागीरदारों की सेवा करने वाले को-दमोगी, वेश्याओं के यहां तालीम देने वाले को-उस्ताद, वेश्याओं के सहयोगी को-कंजर, पिछड़ी जाति के संपर्क में रहने वाले को-मछाता, चिमटा आदि बजाने वाले को-भीड़ और राज दरबार में पीढ़ी वाचन करने वाले-मीर मीरासी आदि विभिन्न स्थानों पर विभिन्न नामों से ये पुकारे जाते हैं। ये हिंदू और मुसलमान दोनों में पाये जाते हैं।
मांगणियारों का रहन-सहन हिन्दुओं और मुसलमानों दोनों से मिलता-जुलता रहा है। औरंगजेब के समय में इन्हें मुसलमान बनाये जाने के बाद भी आजतक ये हिंदुओं की रस्म-रिवाजों की भांति शादी-विवाह, श्राद्ध व नुक्ता कार्य आदि संपन्न करते हैं। इनकी औरतों की वेश-भूषा भी हिंदुओं की भांति है। ओढ़नी, कांचली, घाघरा, कुर्ती आदि हिंदू औरतों की तरह ही ये पहनती हैं। मांगणियारों की औरतें भी यही पहनावा पहनती हैं। मांगणियार हिंदू पुरुषों की वेशभूषा भी धोती, तेवटा, अंगरखी, कुर्ता, साफा आदि पहनते हैं। गरीबी के कारण चांदी के गहने का प्रयोग करते हैं। कुछ सुखी परिवार सोने के आभूषण का प्रयोग करते हैं। यहां तक की शादी में फेरे भी पड़ते हैं और निकाह भी पढ़ा जाता है। शादी के लिए हिंदुओं में दहेज देने का रिवाज है तो ये भी ऐसा ही करते हैं। वे लोग हिंदुओं को राम-राम, जय श्री कृष्ण, जय गोपाल, जय केसरिया नाथ, जय माताजी कह कर, तो मुसलमान को सलाम वालेकुम, वालेकुम सलाम कह कर अभिवादन करते हैं।
ये हिंदू मुसलमान आदि सभी संप्रदायों में मांगते हैं। ये लोग बड़े ही बातूनी होते हैं और शोभा आदि का बखान करने में अत्यंत निपुण होते हैं। किन्हीं को बातों में रिझाना उनके लिए बहुत ही सरल है। तूरही, ढोल, नगाड़ा, कमाशा, सारंगी, अल गुंजा, नौबत, तबला, हारमोनियम आदि साजों से ये लोग अपने संगीत के माध्यम से जनमानस को अपनी ओर भरपूर आकर्षित करने में बड़े ही दक्ष होते हैं। गाने-बजाने में मांगणियारों के स्त्री पुरुष दोनों ही भाग लेते हैं।
गाने- बजाने की दक्षता के साथ शराब पीने और अफीम खाने की भी ये शौकीन होते हैं। अक्सर सामूहिक बैठकों में जिन्हें ये “रियाण” कहते हैं, ये लोग उपस्थित होकर खूब गाते बजाते हैं एवं उपस्थित सज्जनों की प्रशंसा कर उन्हें रिझाकर शराब पीने और अफीम खाने में आगे रहते हैं।
उनकी बहन-बेटियां आज भी दर-दर की ठोकरें खाती हुई भीख मांगती हैं। शादी- विवाह एवं अन्य खुशी के अवसर पर मांगणियारों की औरतों के गाने का विशेष कार्यक्रम होता है। मांगणियारों में 98% लोग बजाकर अथवा भीख मांग कर अपनी उदर की पूर्ति करते हैं। कुछ खेती एवं नौकरी करके भी गुजारा करते हैं। आजादी के बाद भी इनकी गुलामी की बेड़ियां अभी तक नहीं टूट पायी है। गाने बजाने में दक्ष इन मांगणियारों का यदि संगठन बनाकर इन्हें सहयोग और सहारा प्रदान किया जाए तो ये हमारे देश और समाज के लिए अधिक उपयोगी सिद्ध हो सकते हैं और देश का गौरव बढ़ सकता है।




