बिहार का ऐतिहासिक, पुरातात्विक एवं बौद्ध जगत का अति महत्वपूर्ण प्रसिद्ध स्थल कुर्किहार उपेक्षा का अब तक दंश झेल रहा है। जबकि यहां से प्राचीन जमाने में कांस्य कला की अति उत्कृष्ट करीब 150 मूर्तियां 25 फीट नीचे एक टीले की खुदाई से वर्ष 1930 में एक सर्वेक्षण क्रम में अचानक मिली थी। ये मूर्तियां वर्तमान में कोलकाता और पटना म्यूजियम की शोभा बढ़ा रही हैं। विद्वानों का मत है कि यहां अष्ट-धातु तथा कांस्य प्रतिमा बनाने के कारखाने बौद्ध काल में थे, जो प्राकृतिक आपदा के कारण ध्वस्त हो गए और उसके टीले वर्तमान में यहां मौजूद हैं।
यहां से प्राप्त मूर्तियों में मुकुट-धारी बुद्ध की प्रतिमा ज्यादा प्रसिद्ध रही है । साथ ही बोधिसत्व, अवलोकितेश्वरा की भी विभिन्न मुद्राओं में मूर्तियां पाई गई हैं। इन मूर्तियों के मुख पर अपूर्व सौंदर्य एवं शांति विराजमान है। यहां से बौद्ध- देवी तारा की भी एक अद्वितीय मूर्ति प्राप्त हुई है। इस धातु-मूर्ति में कला एवं सौंदर्य पराकाष्ठा पर परिलक्षित है। मूर्ति के मुख पर आभा,ओज और लावण्य है। यहां से प्राप्त मूर्तियाँ अधिक तर चतुर्दिक हैं और किसी-किसी में प्रभामंडल भी दिखाया गया है। प्रभामंडल या तो गोलाकार हैं अथवा अंडाकार हैं। मूर्तियों के आधार को एकहरे अथवा दोहरे कमल दल से सज्जित किया गया है ।
यहां से प्राप्त ‘पद्मपानी’ बुद्ध की आकर्षक प्रतिमा जो पटना संग्रहालय में रखी हुई है, वह पटना संग्रहालय की एक महत्वपूर्ण संग्रह माना जाती है। मूर्ति का चेहरा हल्का अंडाकार, आंखें खुली, होंठ पतले और नाक तीक्ष्ण हैं। यह विभिन्न अलंकारों से सज्जित है। यहां से प्राप्त बुद्ध की एक खड़ी मूर्ति संग्रहालय में है,जो बहुत ही आकर्षक है। एक और अति आकर्षक मूर्ति ‘मुकुट-धारी’ बुद्ध की है उसका दाहिना हाथ अभय मुद्रा में और बायां हाथ से बुद्ध संघाटी पकड़े हुए हैं (Arch no.11028) है। चौथी मूर्ति भी कला की दृष्टि से अति महत्वपूर्ण है। बुद्ध की मूर्ति में सप्तस्थ पीठिका के ऊपर बने दोहरे कमलदल आकृति के पेडेस्टल पर भगवान बुद्ध अभय मुद्रा में है। पेडेस्टल पर यक्ष भी अंकित है।
पुराविद् कनिंघम ने उत्तर के गांव में एक ऊँचा स्थल 120 फीट चौड़ा पाया था,जो बौद्ध काल में ‘सुगत घर’ के नाम से प्रसिद्ध था। मेजर कनिंघम ने इसे बौद्ध जगत का “सुगत गंध कुटी” बताते हुए कहा है कि यह ऐतिहासिक बौद्ध स्थल गया और बिहार के बीच का सबसे बड़ा प्रसिद्ध नगर था। इस स्थल की खुदाई से प्राचीन काल के भारत में धातु कर्म और ढलाई की तकनीकी का पता लगाया जा सकता है,जो धरती के भीतर पड़े स्मारकों के प्रकृति को उद्घाटित करने में सहायक सिद्ध होगा। साथ ही कांस्य मूर्ति कला निर्माण का भी पता चल सकेगा ।
वर्ष 2007 में बिहार के मुख्यमंत्री नितीश कुमार यहां आए थे और उन्होंने यहां खुदाई कराने तथा इस स्थल को बुद्ध सर्किट से जोड़ने की बात कही थी,किंतु यह घोषणा तक ही अबतक सीमित रही है। इसके पूर्व भारत के राष्ट्रपति महामहिम ए.पी.जे.अब्दुल कलाम ने भी इस स्थल को एक महत्वपूर्ण पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने का सुझाव दिया था। बौद्ध विद्वान, खोजकर्ता एवं पुरातत्व के जानकार डा.शत्रुघ्न दांगी का मत है कि यदि इस स्थल की बृहद पैमाने पर खुदाई कराई जाए तो बहुत बड़ा रहस्य एवं विरासत मिलने की संभावना है। इससे पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा और सरकार को राजस्व की प्राप्ति में भी सहायक सिद्ध होगा।




