यही परिस्थितियां पहले अफगानिस्तान में बनी थी, जिससे तालिबान का सामाजिक आधार बना। अफगानिस्तान में पहले सहन किया गया, फिर स्वीकार किया गया और अंततः सत्ता सौंप दी गई। आज बांग्लादेश भी उसी दौर से गुजर रहा है, लेकिन इसकी पटकथा दशकों पहले लिखी गई थी।
पिछले कुछ वर्षों में बांग्लादेश में धार्मिक कट्टर संगठनों का सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव बढ़ा है। सरकार ने कई मौकों पर स्थिरता और सड़क पर हिंसा के डर से इन ताकतों के साथ सख्ती के बजाय समझौते का रास्ता चुना। यही वह ऐतिहासिक भूल थी, जो कभी अफगानिस्तान में की गई थी, जहाँ तालिबान को पहले सहन किया गया, फिर स्वीकार किया गया और अंततः सत्ता सौंप दी गई।
बांग्लादेश का जन्म 1971 में धर्मनिरपेक्षता, भाषा-स्वाभिमान और लोकतांत्रिक आकांक्षाओं के गर्भ से हुआ था। आज उसी धर्मनिरपेक्षता से सबसे दूर खड़ा दिखाई देता है। जिस देश ने पाकिस्तान के इस्लामी राष्ट्रवाद से अलग होकर अपनी पहचान बनाई, वही देश अब धीरे-धीरे उसी अंधी धार्मिक कट्टरता की ओर बढ़ रहा है, जिसने अफगानिस्तान को तालिबान के हवाले कर दिया। सवाल यह नहीं है कि बांग्लादेश अफगानिस्तान बन जाएगा या नहीं, सवाल यह है कि क्या वह उस रास्ते पर तेज़ी से आगे बढ़ चुका है?
बांग्लादेश का संविधान आज भी औपचारिक रूप से धर्मनिरपेक्षता की बात करता है, लेकिन ज़मीनी सच्चाई इससे उलट है। बीते एक दशक में, बाग्लादेश में इस्लामी कट्टर संगठनों की राजनीतिक और सामाजिक स्वीकार्यता बढ़ी। नास्तिक, लेखक, ब्लॉगर, प्रोफेसर और अल्पसंख्यक लगातार निशाने पर रहे।
हिफाज़त-ए-इस्लाम जैसे संगठनों ने खुलेआम शरीयत आधारित मांगें रखीं। सरकार ने अस्थिरता के डर से इन ताकतों से समझौते का रास्ता चुना। यही परिस्थितियां पहले अफगानिस्तान में बनी थी, जिससे अफगानिस्तान में तालिबान का सामाजिक आधार बना। पहले सहन किया गया, फिर स्वीकार किया गया और अंततः सत्ता सौंप दी गई। आज बांग्लादेश भी उसी दौर से गुजर रहा है, लेकिन इसकी पटकथा दशकों पहले लिखी गई थी।
बांग्लादेश में क़ौमी मदरसों की संख्या तेज़ी से बढ़ी है। इन मदरसों का बड़ा हिस्सा सरकारी निगरानी से बाहर है। पाठ्यक्रमों में आधुनिक शिक्षा का अभाव, मौलाना द्वारा कट्टर धार्मिक व्याख्याएं की जाती हैं। काफ़िर, मुरतद और इस्लाम का दुश्मन जैसे विचार नयी पीढ़ियों में भरे जा रहे हैं। यही मॉडल अफगानिस्तान में अपनाया गया था, जहां बंदूक से पहले ’दिमाग़ों पर कब्ज़ा’ किया गया।
बांग्लादेश में कट्टरता अब केवल मदरसे तक सीमित नहीं, बल्कि, मोहल्लों के इमाम, सोशल मीडिया के इस्लामी इन्फ्लुएंसर और स्थानीय स्तर पर धार्मिक सभाओं के ज़रिये यह सामान्य जीवन में घुलती जा रही है। इसका परिणाम यह सामने आ रहा है कि, हिंदू, बौद्ध और ईसाई समुदाय जो कभी बांग्लादेश की सांस्कृतिक विविधता की पहचान थे आज भय और असुरक्षा में जी रहे हैं।
दुर्गा पूजा पर हमले, मंदिरों की तोड़फोड़, काफिरों की ज़मीनों पर कब्ज़ा, झूठे ईशनिंदा आरोप जैसी धटनाएं बांग्लादेश में बढ़ी है। अफगानिस्तान में भी यही हुआ था, पहले शिया हज़ारा, फिर महिलाओं के साथ उत्पीड़न- धर्मांतरण और फिर हर असहमत आवाज़ को दबा दी गई और एक विचारधारा उनपर थोप दी गई।
बांग्लादेश की महिलाएं अभी भी काम कर रही हैं, शिक्षा में आगे हैं, सार्वजनिक जीवन में मौजूद हैं, उनकी सोच प्रगतिशील है। सवाल है कब तक ? आज बांग्लादेश में महिला कलाकारों और पत्रकारों पर फतवे जारी हो रहे हैं। महिला कर्मचारियों को काम करने पर रोक लगायी जा रही है। इस्लामी संस्कृति के नाम पर मजहब के ठेकेदार शरिया की मांग कर रहे हैं। अब बांग्लादेश में नैतिकता, और मानवाधिकार की बात करना बेमानी है। तालिबान ने भी शुरुआत यहीं से की थी, पहले संस्कृति की रक्षा, फिर इस्लामी आदेश, और अंततः महिलाओं को चारदीवारी में कैद कर दी गई।
आज बांग्लादेश जल रहा है। लेकिन सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोग मूकदर्शक बनकर तमाशा देख रहे हैं। क्योंकि उन्हेें पता है कि आने वाले समय में बांग्लादेश की पहचान किस रूप में होने जा रही है। राजनीति की सबसे खतरनाक भूल- कट्टरता से समझौता, बांग्लादेश की सत्ता ने सबसे बड़ी भूल यह की कि, कट्टरपंथ को चुनौती देने की बजाय, उससे सौदेबाज़ी चुनी। चुनावी गणित, सड़क पर हिंसा का डर और सत्ता-संरक्षण ने सरकार को कट्टर संगठनों के खिलाफ सख्ती से रोका, धार्मिक भावनाओं के नाम पर कानूनों को नरम बनाया, और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अंकुश लगाया।
अफगानिस्तान में भी सरकारें सोचती रहीं तालिबान को साथ लेकर चलेंगे। नतीजा सबके सामने है। अमेरिका और यूरोप, मानवाधिकार पर भाषण देते हैं लेकिन रणनीतिक हितों पर चुप हो जाते हैं। बांग्लादेश में, अल्पसंख्यक उत्पीड़न, अभिव्यक्ति पर हमले, धार्मिक हिंसा सब दिख रहा है, लेकिन प्रतिक्रिया केवल चिंता तक सीमित है। बांग्लादेश का अफगानीकरण केवल उसका आंतरिक संकट नहीं होगा।
बांग्लादेश में चरमपंथ का हावी होना भारत के लिए सबसे बड़ा खतरा है। पूर्वाेत्तर भारत की सुरक्षा, सीमा पार कट्टर नेटवर्क, शरणार्थी संकट, धार्मिक उग्रवाद का बढ़ना भारत के लिए भारत के लिए यह रणनीतिक खतरा है, जिसे केवल कूटनीतिक शिष्टाचार से नहीं टाला जा सकता। लेकिन, बांग्लादेश अभी अफगानिस्तान नहीं बना है। लेकिन वह उसी ढलान पर खड़ा है, जहां से वापसी कठिन होती है।
ज़रूरत है कट्टर संगठनों पर बिना समझौते सख्ती, अल्पसंख्यकों की सुरक्षा को राष्ट्रीय प्राथमिकता, शिक्षा में वैज्ञानिक और मानवीय दृष्टि और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का संरक्षण करने की। नहीं तो, इतिहास एक बार फिर साबित करेगा कि धर्म के नाम पर सत्ता पाने वाली ताकतें, अंततः धर्म और सत्ता दोनों को बर्बाद कर देती हैं।




