अगस्त क्रांति में शहीद होने वाले कई क्रांतिकारी इतिहास के पन्नों में भी नहीं है
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आजादी का अमृत महोत्सव: अगस्त क्रांति में शहीद गया के तीन क्रांतिकारी
भारत छोड़ो आंदोलन यानि 1942 की अगस्त क्रांति में गया का योगदान भी काफी महत्वपूर्ण रहा है। पूरे देश में अंग्रेजों भारत छोड़ो की लहर चल चुकी थी। बिहार में भी वह लहर तेजी से फैली। उस लहर में पटना सचिवालय पर फहरते अंग्रेजों के यूनियन जैक को उतारकर क्रांतिकारियों ने भारत का राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा फहराने के क्रम में अंग्रेजों ने बिहार के सात सपूतों को गोलियों से भून डाला था। इन सात सपूतों में गया का ओबरा जो अब औरंगाबाद जिला में पड़ता है, वहां के खंराटी गांव का जगपति कुमार भी शामिल था। इस घटना और आंदोलन से प्रभावित होकर बिहार में क्रांति की लहर आग की तरह फैली। लोग टेलीफोन का तार काटने, रेल पटरी उखाड़ने, पुल ध्वस्त करने, तोड़-फोड़ कार्य करने आदि में लग गए।
इसी बीच ‘गया कॉटन मिल’ जो गया पटना रेल लाइन के सटे पूरब स्टेशन परिसर के अंतिम छोर पर है, उसमें कार्यरत भूईं राम साथी कैलाश राम हाथ में तिरंगा झंडा लिए जिसमें जगन्नाथ मिश्रा आदि क्रांतिकारियों का कारवां साथ हो लिया, वे सभी गया शहर के बीच स्थित कोतवाली थाने पर अंग्रेजों के फहर रहे यूनियन जैक को उतारकर उस पर भारत का तिरंगा ध्वज 13 अगस्त 1942 को फहरा दिया। इससे बौखलाए अंग्रेज क्रांतिकारियों के आंदोलन को कुचलने के लिए कोतवाली थाना के कोतवाल ने चारों तरफ से उन्हें घेरकर अंधाधुंध गोलियां चलवाई, जिससे इस गोलीकांड में गया के तीन होनहार युवा क्रांतिकारी भूईं राम, कैलाश राम और पं.जगन्नाथ मिश्र शहीद हो गए। ये तीनों क्रांतिकारी अविवाहित थे। इन क्रांतिकारियों के दिल में अंग्रेजों के प्रति नफरत और गुस्सा भरा था। वे वीर क्रांतिकारी शहीद खुदीराम बोस, चंद्रशेखर आजाद, सरदार भगत सिंह, अशफाक उल्ला खाँ, सुखदेव, राम प्रसाद बिस्मिल, रोशन सिंह,शहीद ऊधम सिंह, झांसी की रानी आदि की शहादत को जाना था। अतः सभी क्रांतिकारियों में अंग्रेजों के प्रति घृणा के भाव और उन्हें भारत से भगा देने की तमन्ना जाग उठी थी ।
उन दिनों विष्णु गणेश पिंगले मेरठ, करतार सिंह सराभा पंजाब और डॉक्टर खानखोजे नागपुर ने अमेरिका में जाकर क्रांतिकारियों का एक संगठन बनाया था जो “गदर पार्टी”नाम से जाना जाता था। “गदर” नामक पत्रिका भी वे वहां से प्रकाशित कर भारत में अमेरिका से पंजाब, बिहार,महाराष्ट्र, यूपी आदि जगहों में भेजते थे। यह पता लगते ही अंग्रेजों ने सन् 1915 में अंग्रेजों ने इन्हें फांसी पर चढ़ा दिया। तब वहां रह रहे क्रांतिकारियों ने गदर पार्टी का नाम बदलकर ” इंडियन इंडिपेंडेंस लीग” कर दिया और मुख्यालय काबुल (अफगानिस्तान) में बनाया। इसे रास बिहारी बोस ने जापान में स्थापना की जिससे वहां ‘आजाद हिंद फौज’ ने जन्म ली।
कला ज्योति संस्कारशाला के संस्थापक एवं रंगकर्मी शंभू सुमन ने जिलाधिकारी गया को एक पत्र भेजकर शहीद स्मारक कोतवाली तथा शहीद स्मारक धामीटोला को अतिक्रमण से मुक्त कराने की मांग की है। उन्होंने बताया है कि अमर शहीद पंडित जगन्नाथ मिश्र एवं भूईं राम की स्मृति में बना स्मारक कोतवाली थाने के सटे दक्षिणी कोण पर स्थित है और अमर शहीद कैलाश राम का शहीदी स्मारक धामीटोला में स्थापित है। किंतु, ये दोनों ही ऐतिहासिक स्मारक प्रशासनिक उदासीनता के कारण तथा नागरिकों की उपेक्षा के चलते अपनी पहचान खोते जा रहे हैं। कोतवाली स्मारक के पास एक ओर जहाँ दातुन की दुकान सजी है, वहीं दूसरी ओर अमीर शहीदों की होर्डिंग की जगह “छम्मा छम्मा” जैसे होर्डिंग लगाकर अमर शहीदों का उपहास किया जा रहा है । इससे देश प्रेमियों के दिलों में दीवानों के प्रति नमन करने में ठेंस पहुंच रही है। दूसरे कैलाश राम के धामीटोला मे बने स्मारक पर भी अतिक्रमणकारियों का कब्जा है और उसके पास जूठे चाट के पत्तल आदि फेंके जाते हैं।
आज पूरे देश में आजादी का अमृत महोत्सव बडे़ धूम-धाम से मनाने में सरकारें व्यस्त हैं, जबकि देश की आजादी के लिए प्राणों की आहूति देने वाले अमर शहीदों के स्मारक सरकारी उदासीनता के कारण अपनी गरिमा खोते जा रहे हैं।
शहीद कैलाश राम अतरी थाने के खजूर गांव का निवासी था,जो काम की तलाश में गया आया था । वह यहीं टिकारी रोड स्थित एक तिलकुट की दुकान में काम करता था। क्रांति की आग में वह भी हाथ में तिरंगा लेकर कूद पड़ा था, जो 13 अगस्त को कोतवाल की गोली से धामी टोला के पास शहीद हो गया। उसके परिवार के लोग मानपुर के शेखा बिगहा में अभी जीवन बसर कर रहे हैं। इसका बड़ा भाई युवा में ही लापता हो गया था। छोटा भाई पूनाराम का बेटा गोपाल राम अपने परिवार के साथ शेखा विगहा में तिलकुट की दुकान खोला था ,फिर वह भी वर्षों से लापता है। उसके परिवार अब उसी दुकान को चला रहे हैं ।
पंडित जगन्नाथ मिश्र गया चौक के पास हनुमान मंदिर के निकट पुलिस की गोली से शहीद हुए थे। इस कारण उन्हीं के नाम पर शहीद रोड का नाम पडा़। श्री मिश्र के परिवार अभी शाहमीर तक्या के दुर्गा स्थान के पास रह रहे हैं।
इतना ही नहीं अगस्त क्रांति के दौरान क्रांतिकारियों ने 18 अगस्त को मखदुमपुर स्टेशन और 19 अगस्त को टेहटा स्टेशन की रेल पटरियों को उखाड़ फेंका था । वहीं 29 अगस्त को क्रांतिकारियों ने रफीगंज की सड़क को काट दिया ताकि अंग्रेजों की सेना को रसद नहीं पहुंच सके। 25 अगस्त को यद्यपि कि गया कॉटन मिल को खोल दिया गया,किंतु उपस्थिति मजदूरों की बहुत कम होती थी।
इस प्रकार हम पाते हैं कि आजादी के दीवानों की एवं क्रांतिकारियों की एक लंबी सूची गया में विद्यमान है। आवश्यकता है इसे उजागर करने की है, ताकि लोग उनके बारे में जानकारी प्राप्त कर सकें। आश्चर्य तो यह है कि क्रांतिकारियों तथा शहीदों के प्रति सरकार की ओर से कोई विशेष ध्यान नहीं दिया जाता है। प्रखंडों में लगे सेनानियों के प्रस्तर स्तंभों को भी क्रांति दिवस के अवसर पर न तो सजाया जाता है और न ही उन सेनानियों के कार्य कलापों को याद ही किया जाता है, जिससे कि आने वाली पीढी़ को देश और राज्य के प्रति श्रद्धा और भक्ति भावना सुदृढ़ बन सके ।