
शिक्षा में सुधार लाने के लिए व्यावहारिक पक्ष को भी देखना होगा। अन्यथा सिर्फ सरकारी आदेश का कडा़ई से पालन कराने से ही शिक्षा में सुधार संभव नहीं है। विस्फोटक स्थिति दिन प्रति दिन बनती जा रही है। सरकार द्वारा जारी तुगलकी फरमान से शिक्षा विभाग में सुधार के बजाय कहीं इसका विपरित परिणाम ना देखने को मिलने लगे।
———————————-
बिहार सरकार द्वारा शिक्षा विभाग के माध्यम से शिक्षा में सुधार को लेकर जो सकारात्मक कदम उठाए गए हैं ,वे एक ओर तो सराहनीय है, किंतु दूसरी ओर अव्यवहारिक, असामाजिक और तुगलकी फरमानों से त्रस्त शिक्षा विभाग आज नागरिकों के कोप का भाजन होता दिख रहा है।
नये सत्रारम्भ अंतर्गत प्राथमिक विद्यालयों में अधिक से अधिक बच्चों का नामांकन हो, इसके लिए आदेश जारी किए गए हैं कि प्राइमरी कक्षा में छात्र-छात्राओं का नामांकन के लिये उनका नाम आधार कार्ड से जुड़ा होना आवश्यक है,साथ ही एफिडेविट के माध्यम से नाम पता आदि भी सत्यापित हो।
लेकिन व्यवहारिक पक्ष है कि जिस बच्चे के मां-बाप गरीब,मजदूरी कर अपने बाल- बच्चों को पढ़ा रहे हैं वे कितने दिनों तक दैनिक मजदूरी को छोड़- छोड़ कर ब्लॉक का चक्कर लगायेंगे, तब उनका यह कार्य सिद्ध होगा। ब्लॉक के कर्मचारी तथा अधिकारीगण किसी भी काम को जल्द निपटाना नहीं चाहते। वे इन कामों को शीघ्र करने में आना-कानी करते रहते हैं,जबतक की उन्हें चढ़ावा नहीं मिल पाता और तब कहीं उनका यह काम हो पाता है। यह विषय आज के समय में गंभीर होता जा रहा है।
दूसरी और विद्यालय के प्रधानों को सख्त निर्देश दिया गया है कि अधिक से अधिक बच्चों का नामांकन आप नियत अवधि के बीच करें अन्यथा वेतन कटौती के साथ अनुशासनात्मक कार्रवाई भी की जाएगी। बच्चे बिना नामांकन के विद्यालय आना भी नहीं चाहते। इसके लिए सरकार यह व्यवस्था क्यों नहीं कर पाती है कि विद्यालय में नियत तिथि पर जा-जाकर इस कार्य का निष्पादन स्वयं और शीघ्रता से कर ले, ताकि आसानी से यह कार्य संपन्न भी हो जाए और परेशानी भी लोगों को नहीं झेलना पड़े।
दूसरी ओर एक भी बच्चा दलित, अल्पसंख्यक, ओबीसी, अत्यंत पिछड़ा वर्ग, आदिवासी जनजाति आदि का कोई छूट नहीं पाए जिनका नामांकन विद्यालय में नहीं हुआ है। यह आदेश सही भी है, किंतु इसके लिए प्रशासन स्कूल दर स्कूल जाकर बच्चों का आधार कार्ड एवं एफिडेविट सर्टिफिकेट आदि बनवा क्यों नहीं देती है, ताकि विद्यालयों में आसानी से अधिक से अधिक छात्रों का नामांकन भी हो जाय और गार्जियन तथा विद्यालय के प्रधानों का सिर दर्द भी दूर हो जाए।
इस वर्ष की भीषण गर्मी में दर्जनों बच्चे बीमार पडे़,बहोश हुए शिक्षकों की भी यही गति हुई। विशेष कर शिक्षिकाएं जिन्हें दूर से विद्यालय आना पड़ता है, उनकी हालत तो और भी बदतर हो जाती है।
एक अन्य अव्यवहारिक बात अभी यह भी देखने को मिल रही है कि ग्रीष्मावकाश से शिक्षकों को वंचित कर दिया गया है। विद्यालय तो बंद कर दिया गया है, परंतु शिक्षकों को अनिवार्य रूप से प्राप्त 6:00 बजे से 1:30 बजे तक विद्यालय में उपस्थित रहना अनिवार्य है, अन्यथा उनके वेतन में कटौती की जाएगी और कार्रवाई भी की जायेगी। ऐसे उनका वेतन भी प्रति माह उन्हें नियत समय पर नहीं दी जाने की शिकायत है। ऐसे में शिक्षा और शिक्षण कार्य दोनों में सुधार कैसे संभव है, यह समझ से परे है।
शिक्षा में सुधार लाने के लिए व्यावहारिक पक्ष को भी देखना होगा। अन्यथा सिर्फ सरकारी आदेश का कडा़ई से पालन कराने से ही शिक्षा में सुधार संभव नहीं है। विस्फोटक स्थिति दिन प्रति दिन बनती जा रही है। सरकार द्वारा जारी तुगलकी फरमान से शिक्षा विभाग में सुधार के बजाय कहीं इसका विपरित परिणाम ना देखने को मिलने लगे।
एक सरल और सर्वव्यापी व्यवहारिक शिक्षा में सुधार का रास्ता और भी स्पष्ट दिखता है कि यदि सभी सरकारी वेतन भोगी अधिकारियों के बच्चे- बच्चियों का नामांकन उनके निकट के सरकारी विद्यालयों में करा दी जाय और वे बच्चे वहीं के विद्यालय में पठन-पाठन करना आरंभ कर दें,तो निःसंदेह शिक्षा विभाग को किसी भी प्रकार की शिक्षा में सुधार लाने के लिए अन्य दुबारा विशेष मिहनत करने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी।




