Monday, March 2, 2026
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योग दिवस-2020 : नृत्य में योग का महत्व

इस वर्ष 2020 की परिस्थिति में योग दिवस ने कुछ विषम परिस्थितियों का सामना किया| कोरोना काल, इस सदी का सबसे बड़ा सूर्य ग्रहण, साथ ही चीन का धोखा | ऐसे में योग दिवस को घर पर रहकर ही सबने मनाया | सामूहिक आयोजन कुछ कम हुए परन्तु आज covid की इस घडी में सबने योग के महत्व को पहचाना तथा अपनी इम्युनिटी के लिए योग कितना उपयोगी है इसका ज्ञान सभी को हुआ |
ऋषि मुनियों की धरती रहा भारत देश, यहाँ पर बहुत सी ऐसी अद्भुत पद्धतियाँ विकसित हुईं हैं, जिनकी मिसाल दुनिया में नहीं मिलती है। 1000 वर्षों पूर्व अखंड भारत में एक मणि हुए ऋषि पतंजलि, जिन्होने शरीर को शरीर की क्रियाओं द्वारा निरोगी रखने की एक ऐसी प्रकिया का निर्माण किया जिसका नाम है योगा । योगियों का वह व्यायाम जो उन्हे आहार और औषधियों के बिना स्वस्थ रखता है । ऐसे ही आसनो को अपनाया था सुरक्षित रख उन्हे आज भी सभी के लिए लाभदायक बनाया ।
हमारे गुरुओं, योग बाबाओं तथा साधू संतों द्वारा आज संसार के समक्ष योग का एक ऐसा अद्भुत रूप उभरा है जिसका संसार का उसके ही दूषित वातावरण में प्राकृतिक उपचार संभव हुआ है । योग कोई औषधि नहीं है, न ही कोई तंत्र अथवा मंत्र है । यह तो केवल एक साधना है जो मानव शरीर को तंदरुस्त तथा स्वस्थ रखने की प्रतिक्रिया है।
आज योगाभ्यास द्वारा हम अपने जीवन को निरोगी बना सकते हैं। योग एक ऐसा व्यायाम है जो हमारे शरीर का भौतिक तथा मानसिक संतुलन बनाए रखता है। इसलिए भारतीय नृत्यों में योगा को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। शारीरिक संतुलन व शरीर की लोचकता को बनाए रखने के लिए नियमित अभ्यास में लाया जा रहा है। प्राणायाम द्वारा शारीरिक क्षमता को बढ़ाया जा रहा है। सभी योगिक नृत्य की भंगिमायेन बन रहीं हैं। भारतीय रक्षक कलाएँ जिन्हे आज छाऊ, कलरीपाइटीऊ, थंगता इत्यादि पूर्ण रूप से योगा पर आधारित है। शास्त्रीय कलाएँ हो अथवा लोक नृत्य कलाएँ सभी किसी न किसी तरह योग से संबंधित क्रियाएँ हैं ।
योगा को नृत्य की भाँति ही संगीत द्वारा ताल में निरूपित किया गया है। योग एक प्राचीन क्रिया है, यह तो सभी जानते हैं परंतु राजनीति मे भी इसका प्रयोग कभी-कभी होने लगता है। पुरानी सरकारो ने भी 2 दशक पूर्व भारतियम नामक कार्यक्रम शुरू किया था जिसमें योगा के साथ-साथ शरीर को निरोग रखने के लिए नृत्य और संगीत का प्रयोग किया था। जिसमें सभी लोक नृत्य कलाएँ, रक्षक कलाएँ शामिल की गईं थी और राष्ट्रीय पैमाने पर इनका आयोजन किया गया। महाराष्ट्र की कला मलखम, रोप , पूर्वी भारत से छाऊ और मणिपुरी थंगता का उल्लेख है। पंजाब का गतका, भंगड़ा गुजरात का डांडिया आदि इन सभी लोक कलाओं को मंच पर एक साथ प्रस्तुत कर योग बनाया गया था ।
भारतियम को राष्ट्रीय स्तर पर पूरे देश में फैलाया गया था। विद्यालयों में विशेषकर कुछ नृत्य और शारीरिक अध्यापकों की नियुक्ति कर इसे अनिवार्य बनाया गया था। योग भी जिनमे से एक था।
भारतियम ने शारीरिक व्यायाम पर विशेष ध्यान केंद्रित किया परंतु इनके शुभारंभ के पश्चात यह क्रियाएँ कहाँ लुप्त हो जाती हैं कोई नहीं जानता। सरकार की तरफ से लाखों रुपये खर्च कर बच्चों में जागरूकता फैलाई जाती है। परंतु यह सब बाद में कहाँ और क्यों लुप्त होती है पता नहीं। योग-नृत्य दोनों ही सुंदर और शुद्ध रूप हैं। यह सत्य है की टी.बी., अस्थमा और कैंसर जैसे लाइलाज रोगों का इलाज इन प्राकृतिक साधनाओं द्वारा बिना औषधि के किए जा सकता है। शुगर जैसी बीमारी को नियंत्रित करने के लिए योगा और नृत्य काफी सहायक है। रक्त चाप और चिंताएँ केवल ध्यान लगाने से शरीर पर प्रभावित नहीं होतीं। योग और नृत्य को अगर नियमित प्रयोग का विषय बनाया जाए तो यह आज मेडिकल साइन्स के लिए राहत का कार्य बन सकता है।
वैसे तो योग कला प्राचीन धरोहर है परंतु कुछ चार देशकों से इसकी महत्वता हमारे जीवन में उभरी है। आज से 4 दशक पूर्व धीरेन्द्र ब्रहमचारी नामक व्यक्ति ने दिल्ली में विश्वायतन योग आश्रम बना कर लोगों में योग की विशेषताओं को जागृत करवाया । इस आश्रम में लोगों को योगा की दीक्षा देकर योगा का प्रचार किया। तथा वहाँ पर तैयार योग कलाओं को शिक्षा से जोड़ने का कार्य किया । योगिक क्रियाएँ मंत्रों के उच्चारण और उनके अर्थ पर आधारित है। परंतु यह किसी धर्म का प्रतीक नहीं है। भगवान बुद्ध की शांत मुद्रा तथा आसन हमे ध्यान की ओर केंद्रित करती हैं। इन सभी आसनों और क्रियाओं को नृत्य में बखूबी अपनाया है।
हमारी नृत्य कलाएँ जैसे छाऊ की बात करे तो इनमे प्रयोग होने वाले चक्र आसान, वज्र आसान, धनुरासन , पद्मासन आदि तैयारी के लिए प्रयोग किए जा रहे हैं। ऐसे ही अन्य कला कलरीपाइटू में भी ताड़ आसन, हल आसन, भुजंगासन आदि प्रयोग किए जा रहे हैं। त्रिलोकासन तो सभी शास्त्रीय नृत्यों में नृत्य की एक भंगिमा बनी हुई है। जिस प्रकार योग साधना द्वारा शरीर पर हमारा नियंत्रण हो जाता है। उसी प्रकार नृत्य साधना द्वारा भी शरीर को नियंत्रित किया जा सकता है लेकिन दोनों शब्दों द्वारा साधना का प्रयोग आवश्यक है। पिछले एक दशक में स्वामी रामदेव तथा उनकी संस्था पतंजलि ने योग साधना और योग पर सभी लोगों का ध्यान आकर्षित किया है।
बाबा रामदेव ने योग के प्रति विश्वास जगाया है। यह साबित किया है की अनेक रोगों का उपचार बिना औषधि के भी संभव है। देश में तथा विदेशों में भी योग का प्रचार हो रहा है। बाबा रामदेव ने योग को जीवन का महत्वपूर्ण कार्य बताया है कि केवल साँस को नियंत्रित कर आप अपने शरीर का संतुलन रख रोगों को दूर रख सकते हैं। पतंजलि पूरे देश में आयुर्वेद का प्रचार कर लोगो में देशी की भावना को जागृत कर रहे हैं। पतंजलि ने देसी वस्तुओं का निर्माण कर देश के लोगों में एक ऐसा विश्वास जगाया है की वह अपनी संतुष्टि कर सके और निरोगी रहे।
21 जून 2015 से संगीत नाटक अकादमी भी योग पर्व मना रहा है।  संगीत नाटक अकादमी की सचिव हेलेन आचार्या  ने बताया कि 2015 में हमारे पास जो सामग्री UNESCO के लिए तैयार थी उसे हमने आगे योग दिवस के लिए प्रस्तुत किया है। यह कार्यक्रम ‘योगा पर्व’ तीन भागों में विभक्त कर इसे तीन अलग अलग मंचों पर प्रदर्शित कर संचालित किया गया। योगा चक्र प्रदर्शिनी को ललित कला दीर्धा में दर्शाया गया। जिसमे लगभग 150 कलाकारों का भारतीय कार्य था। मेघदूत अभिमंच पर योग नृत्य और संगीत के कार्यक्रम प्रस्तुत किए। जिनमे नाटक और संवाद और योगा के गुरुओं द्वारा योगों को विस्तार रूप से प्रस्तुत किया।
प्राकृतिक चिकित्सा से संबंधित विषयों को रविन्द्र भवन में लगाया गया। मन्दाकिनी त्रिवेदी, मसाको ओनों, रंजना गौहर तथा ईशा फ़ाउंडेशन के योग संबंधी कार्यक्रम को प्रस्तुत किया। इसमें संगीत नाटक अकादमी के साथ लाली कला अकादमी, साहित्य अकादमी, I.G.N.C.A तथा राष्ट्रीय संग्रहलय ने साथ मिलकर इस कार्य को किया। यह पहला प्रयास है भारतीय और एशियाई देशों के कार्यों को एक दीर्घा में प्रदर्शित किया गया। नए कलाकारों को भी इस उत्सव में सम्मिलित किया गया है।
प्रधानमंत्री ने भी योग कार्यक्रमों को को प्रोत्साहित करने हेतु इस योग सप्ताह में भाग लिया। प्रधानमंत्री की योजना हेतु सभी लोगों तक योगा को पहुँचाया जाए जिससे सभी को योग की जानकारी मिले।
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