दक्षिण बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय, गया के सभागार में “आईएनसीए” का 45वां तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय कांग्रेस “एडवांसेज इन कार्टोग्राफी फॉर ए बेटर टुमौरो” थीम पर संपन्न हुआ। विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर कामेश्वर नाथ सिंह ने कांग्रेस की थीम को इंगित करते हुए बताया कि इस कांग्रेस का मुख्य उद्देश्य 2047 तक विकसित भारत के विजन को प्राप्त करने का लक्ष्य माना गया है। सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ साउथ बिहार में नेशनल एटलस और थीमेटिक मैपिंग ऑर्गेनाइजेशन एवं सीयूएसबी के संयुक्त तत्वाधान में यह कॉन्फ्रेंस का आयोजित किया गया।
उद्घाटन सत्र के मुख्य अतिथि डॉक्टर सुनील कुमार बरनवाल, सीईओ, नेशनल हेल्थ अथॉरिटी (एनएचए) भारत सरकार ने डिजिटल कार्टोग्राफी को वर्तमान समय की सबसे क्रांतिकारी तकनीक बताते हुए कहा कि इसकी मदद से मैपिंग को अपनी जरूरत के अनुसार डिजाइन किया जा सकता है। उन्होंने बताया कि यह तकनीक “आयुष्मान-भारत योजना” सहित स्वास्थ्य क्षेत्र में बड़ा बदलाव ला सकता है, क्योंकि बीमारी व उपचार से जुड़ी अहम् जानकारी भविष्य में सीधे डिजिटल उपकरणों पर उपलब्ध कराई जा सकेगी।
कुलपति प्रोफेसर कामेश्वर नाथ सिंह ने विकसित भारत 2047 के विजन का उल्लेख करते हुए विस्तार से प्रकाश डाला कि भारत को 30 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने के लक्ष्य में कार्टोग्राफर्स, प्लानर्स, शिक्षाविदों और नीति निर्माताओं की संयुक्त भूमिका अधिक निर्णायक होगी। इस अवसर पर लोकल ऑर्गेनाइजिंग कमेटी एवं कुल सचिव प्रोफेसर नरेंद्र कुमार राणा ने कार्टोग्राफी को विज्ञान और कला का संयोजन बताते हुए कहा कि इसका उद्देश्य धरती की सतह को बेहतर समझना है। एनएटीएमओ के डायरेक्टर एवं आईएनसीए प्रेसिडेंट डॉक्टर विनोद कुमार सिंह ने कार्टोग्राफी की तेजी से विकसित होती तकनीक पर विस्तार से प्रकाश डाला।
एनआरएससी के निदेशक डॉक्टर प्रकाश चौहान ने 4-D डिजिटल मैपिंग की आवश्यकता को विस्तार से जानकारी दी। वहीं वॉइस एडमिरल लोचन सिंह पठानिया ने देश के समुद्री सीमा और आर्थिक क्षेत्र की दृष्टि से नाइट- टाइम और मैरि-टाइम कार्टोग्राफी के महत्व को विशेष रूप से रेखांकित किया। कार्यक्रम का संचालन सुश्री पूर्णिमा ने सफलतापूर्वक किया, वहीं आयोजन की देखे-रेख डॉक्टर मनजीत सिंह ने सावधानी पूर्वक की। नेशनल काटूर्नोग्राफी क्विज के विजेताओं को सम्मानित भी किया गया।
इस अवसर पर विश्वविद्यालय के खुले मैदान स्थित भव्य मंच पर सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन भी किया गया,जिसमें पश्चिम बंगाल के कलाकारों ने पारंपरिक पुरुलिया-छऊ नृत्य की शानदार प्रस्तुति दी। “छऊ” एक पारंपरिक अर्थ-शास्त्रीय नृत्य है,जो पूर्वी भारत में एक लम्बे अरसे से प्रचारित है और जो “यूनेस्को” की मानवता की “अमूर्त-सांस्कृतिक विरासत” सूची में दर्ज है।
कलाकारों के इस भव्य प्रस्तुति ने दर्शकों का मन मोह लिया। “छऊ” नृत्य को छौ-नाच भी कहा जाता है। मार्शल और लोक परंपराओं वाला यह एक अर्थ-शास्त्रीय भारतीय नृत्य है। यह तीन शैलियों में पाया जाता है। इनका नाम उस स्थान के नाम पर रखा गया है,जहां उनका प्रदर्शन किया जाता है। उन नामों में पश्चिम बंगाल का पुरुलिया-छऊ, झारखंड का सरायकेला-छऊ और उड़ीसा का मयूरभंज-छऊ प्रसिद्ध है। यह बड़े गर्व की बात है कि यह न केवल एक राज्य वरन् तीन-तीन राज्यों की शान हैं,जिसे “यूनेस्को” ने भी सराहा है। इतना ही नहीं इन्हें इसे विश्व विरासत की सूची में भी सम्मिलित किया है।
आज हम चर्चा करेंगे जो दक्षिण बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय, पंचानपुर-टिकारी, गया परिसर के खुले मंच पर कलाकारों द्वारा प्रस्तुत किया गया रंगारंग पुरुलिया “छऊ-नृत्य” की मनमोहक प्रस्तुतियों पर। पुरुलिया नृत्य की मूल विशेषता और अंतर यह है कि इसके नृत्य में प्रदर्शित किए जाने वाले मुखौटा अति सुंदर,आकर्षक,अद्वितीय और पारंपरिक होते हैं। मुखौटा मूलतः मुलायम कागज, मिट्टी, पतला गोंद, कपड़ा, महीन राख आदि से निर्मित होता है,जिसे धारण कर कलाकारगण अपनी आकर्षक भाव-भंगिमा को प्रदर्शित करते हैं।
यह विशेषता इस छऊ-नृत्य के अलावा अन्य दो महत्वपूर्ण छऊ-नृत्य के शाखाओं झारखंड के सरायकेला छऊ और ओडिशा के मयूरभंज छऊ से पृथक करता है। झारखंडी-छऊ अपेक्षाकृत सरल,छोटे और भावपूर्ण होते हैं। यह पुरुलिया छऊ की तरह अत्यधिक आकर्षक, दिखावटी और रंगीन चमक वाले नहीं होते। वहीं ओडीशा का मयूरभंज-छऊ बिना मुखौटा वाला छऊ-नृत्य होता है।




