पालघर मुद्दाः बॉम्बे हाईकोर्ट में नहीं चली कपिल सिब्बल की दलील
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यह आर.भारत और आचार्य विक्रमादित्य की नैतिक जीत है जबकि, कांग्रेस के लिए सबक
पालघर में दो साधुओं की लिंचिंग मुद्दे पर कांग्रेस और रिपब्लिक भारत की लड़ाई में आखिरकार कांग्रेस को बॉम्बे हाईकोर्ट से खाली हाथ लौटना पड़ा। पिछले ढाई महीने से चली आ रही इस रस्साकस्सी में दंभ और अहंकार के बल पर कांग्रेस ने जो सोचा था, परिणाम उसका उल्टा हुआ है। बॉम्बे हाईकोर्ट ने दो टूक सुनाते हुए कि इस केस को निरस्त कर दिया है, कि इस केस में कोई दम नहीं है।
कांग्रेस की तरफ से वकील और कांग्रेस के शीर्ष नेता कपिल सिब्बल ने अर्नब गोस्वामी के साथ देश के जाने-माने टीवी पैनलिस्ट आचार्य डॉ. विक्रमादित्य को भी नामजद किया था। उनपर आरोप था कि वह पालघर मुद्दे के बहाने देश में साम्प्रदायिक माहौल खराब कर रहे हैं। जबकि आचार्य विक्रमादित्य ने हिन्दू संतों पर लगातार हो रहे हमले से आहत होकर कहा था कि महाराष्ट्र सरकार अपनी जिम्मेदारी से भाग रही है। उन्होंने यह भी कहा था संतों की हत्या पर बड़ी-बड़ी हस्तियां और सेलेब्रिटी गायब हैं जो छोटी-छोटी बातों पर तख्तियां लेकर सड़कों पर उतर जाते हैं। मुखर होकर बोलने के कारण कांग्रेस ने आचार्य विक्रमादित्य को भी नामजद कर दिया।
सुनवाई के दौरान बॉम्बे हाईकोर्ट ने आचार्य विक्रमादित्य के मसले पर कहा है कि इनके बयान में ऐसा कुछ नहीं जिससे साम्प्रदायिक माहौल बिगड़ सकता हो। बॉम्बे हाईकोर्ट ने आचार्य विक्रमादित्य के खिलाफ दर्ज मामले को निरस्त कर दिया है और रिपब्लिक भारत टीवी चैनल के एडिटर अर्नब गोस्वामी के खिलाफ दर्ज सभी मामलों को निलंबित कर दिया है। कोर्ट ने कांग्रेस के आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि आचार्य विक्रमादित्य ने पालघर में साधुओं की लिंचिंग मामले पर आमिर खान एवं बड़ी सेलेब्रिटियों की खामोशी पर सवाल उठाया तो इससे साम्प्रदायिक माहौल कैसे बिगड़ सकता है। कांग्रेस की ओर से पूर्व केन्द्रीय मंत्री और कांग्रेस के शीर्ष नेता कपिल सिब्बल पैरवी कर रहे थे।
पालघर में दो साधुओं की लिंचिंग में हत्या का मुुद्दा इतना तूल पकड़ा कि महाराष्ट्र में कांग्रेस समर्थित सरकार से जब सवाल पूछा गया तो पूछने वालों के खिलाफ बॉम्बे हाईकोर्ट में एफआईआर दर्ज करा दी गई थी। टीवी चैनल रिपब्लिक भारत ने इस मामले को जोर-शोर से उछाला था। संपादक अर्नब गोस्वामी ने इस मुद्दे पर नियमित पैनल डिबेट की थी। अर्नब गोस्वामी ने सोेनिया गांधी को एंटोनियो माइनो कहकर कुछ सवाल पूछे थे जो दस जनपथ को नागवार गुजरा था। उन्होंने कहा था कि पालघर में अगर हिन्दू संतों की जगह कोई मुस्लिम की हत्या की गई होती तो सोनिया गांधी अर्थात एंटोनियो माइनो की क्या प्रतिक्रिया होती।
दस जनपथ के दरबारियों ने रिपब्लिक भारत के एडिटर इन चीफ अर्नब गोस्वामी पर मानहानि के आरोप लगाते हुए कई एफआईआर दर्ज करा दिये गये। जबकि डिबेट पैनल मेें शामिल होने वालेे कई पैनलिस्ट को भी नामजद किया गया था। पैनलिस्ट पर आरोप था कि वह हिन्दू मुस्लिम करके देश का माहौल बिगाड़ रहे हैं।
कांग्रेस समर्थित महाराष्ट्र सरकार की पुलिस ने अर्नब गोस्वामी से 12-12 घंटे पूछताछ की और इसी क्रम कई बार उनको घंटों तक टॉर्चर रूम में बैठाकर मानसिक प्रताड़ना दी गई। लेकिन कांग्रेस को इससे कुछ भी हासिल नहीं हुआ सिवाय बदनामी और किरकिरी के।
जबकि, बॉम्बे हाईकोर्ट में इस मसले पर कांग्रेस ने कोई ठोस दलील पेश करने की जगह सोनिया गांधी के अपमान, एवं रिपब्लिक भारत औैर कुछ पैनलिस्टों द्वारा साम्प्रदायिक माहौल बिगाड़ने की बात कांग्रेस के वकील करते रहे। अंत में हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलों को सुनने के बाद इस केस को निरस्त कर दिया।
पिछले ढाई महीने से हाईकोर्ट में यह मसला चल रहा था लेकिन कांग्रेस के तरफ से दी जा रही दलील से कोर्ट कभी संतुष्ट नहीं हुआ। दंभ और अहंकार में कांग्रेस द्वारा उठाये गये यह कदम कांग्रेस के लिए ही सिरदर्द बन गये हैं। आर. भारत एवं आचार्य विक्रमादित्य के पक्ष में बॉम्बे हाईकोर्ट का यह फैसला कांग्रेस के लिए सबक है कि आप कोर्ट और कानून का डर दिखाकर किसी की अभिव्यक्ति की आजादी नहीं छीन सकतेे।