सरोज खान जैसी कोरियोग्राफर शायद सदी में एक बार जन्म लेती हैं
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(1948-2020)
लॉकडाउन की प्रक्रिया देश में महामारी के बीच चल रही है, अनलॉक प्रक्रिया भी शुरू हो गयी है। इस दौरान देश की हर चीज़ बंद हो गयी परन्तु कुदरत की प्रक्रिया कभी भी लॉक नहीं हुई । बॉलीवुड की बात करें तो पहले इरफ़ान खान, फिर ऋषि कपूर और अनेकों कलाकार, गायक, संगीत निर्देशक और अब नृत्य की मशहूर कोरियोग्राफर सरोज खान अपना सफर पूरा करके इस संपूर्ण जगत को अलविदा कह गयी । ह्रदय गति रुक जाने से उनका इंतकाल हो गया ।
जैसा की नाम से लगता है कि वे इस्लामियत से ताल्लुक रखती थी, परन्तु यह एक सत्य है की वह एक हिन्दू परिवार से सम्बंधित थी । बाद में अपनी मर्ज़ी से निर्मला से सरोज खान बन गयीं । लगभग 13 वर्ष में इनकी शादी बी. सोहनलाल से हुई । दोनों की उम्र में काफी अंतर था । उन्हें रास नहीं आया और उन्होंने सरदार रोशन खान से दूसरा विवाह 1975 में किया ।
विभाजन के पश्चात इनका परिवार भारत आया था। पिता किशनचंद साधु सिंह की संतान निर्मला ने मुंबई में अपनी पहली फिल्म 3 वर्ष की उम्र में की जिसमें उन्होंने नन्ही कलाकार श्यामा का किरदार निभाया । 1950 के दशक से इन्होंने फिल्मों में ग्रुप डांसर के रूप में कार्य शुरू कर दिया था । आपने लगभग 70 के दशक तक यह काम किया । मगर 1974 में उन्हें स्वतंत्र नृत्य निर्देशक का काम “गीता मेरा नाम ” फिल्म से मिला । जबकी इस फिल्म के माध्यम से उन्हें इतनी शोहरत नहीं मिली । जब भी किसी फिल्म में नृत्य को तैयार किया जाता है तो यह देखा जाता है कि वह किस पर फिल्माया जा रहा है और उसका निर्देशन कौन कर रहा है । किसी भी शुद्ध नृत्य शैली को ऐसी शैली में ढाला जाता है जिससे वह आम आदमी को लुभाए तथा व्यावसायिक स्तर पर उस फिल्म को कामयाबी मिले । ऐसी ही कला में माहिर थी सरोज खान |
निर्मला से सरोज खान बनी निर्देशिका को तलाश थी ऐसे किरदारों को तराशने की जिनसे उन्हें शोहरत मिले, और ऐसा मौका मिला उन्हें श्रीदेवी के रूप में जब उन्होंने उनके नृत्य “हवा हवाई” की कोरियोग्राफी भी की । श्रीदेवी को ऐसा तराशा की हर कोई वाह वाह कर उठा । फिर क्या था , एक के बाद एक “नगीना ” और “चांदनी” जैसी फिल्मों में नृत्य कोरियोग्राफी ने उनका नाम ज़मीन से उठा कर आसमान पर रख दिया । श्रीदेवी और उसके बाद माधुरी दिक्षित जैसी अदाकाराओं के लिए नृत्य संरचना करके सरोज खान का नाम पूरी इंडस्ट्री में छा गया । माधुरी दिक्षित का गाना “एक दो तीन” , फिल्म “बेटा” का गाना “धक धक” करने लगा, इतनी हिट हुई कि सरोज खान बॉलीवुड की महान कोरियोग्राफर बन गयी। फिर तो फिल्मों में उनका दौर ऐसा चला कि हर कोई उनके कार्य का दीवाना हो गया ।
1985 से 2010 तक सरोज खान ने अपनी Best कही जाने वाली संरचनाओं को तराशा और लोगों की वाह वाही लूटी । फिल्म “नगीना” , “मिस्टर इंडिया ” , “बेटा” , “थानेदार” तथा “गुलाब गैंग” उनकी मनपसंद फिल्में रही । फीमेल किरदारों के अलावा सरोज खान ने अपने समय के मेल किरदारों सलमान खान, अनिल कपूर, अमिताभ बच्चन जैसे कलाकारों को ता थेइया करवाई । कहा जाता है की वह दिल से काफी भावुक थी और नए नए कलाकारों को अपने साथ कार्य में सहायक बनाकर उनके करियर और उनको आगे लाने की कोशिश करती थी, जिससे नृत्य जगत के ऐसे कलाकार जो बॉलीवुड में काम से अपना करियर बनाना चाहते, उन्हें काफी मदद मिलती थी । चोली के पीछे क्या है ?
सरोज खान बॉलीवुड के साथ साथ छोटे परदे पर जिसे टेलीविज़न या धारावाहिकों की दुनिया भी कहा जाता है, उस पर भी नाम कमाया । पहली बार 2005 में “नाच बलिये” में वह स्टार टीवी के चैनल पर जज बन कर आयी और उनका कार्य निर्देशकों के साथ साथ जनता को भी काफी पसंद आया । इसके साथ वह इसकी दूसरी श्रृंखला में भी आयी ।
इसके बाद तो सभी टीवी चैनलों पर नृत्य के बड़े शो, चाहे वह “उस्तादों के उस्ताद ” (सोनी एंटरटेनमेंट ), 2008 में “नचले इण्डिया”, नृत्य शिक्षा पर आधारित शो “नचले विथ सरोज खान” (NDTV) सोनी टीवी के “बूगी वूगी” 2009 जिसमें जावेद जाफरी तथा रवि बहल जैसे जज थे । यह शो अपने समय में काफी हिट रहा । इसके अलावा टीवी शो “झलक दिखला जा ” आदि जिसमें माधुरी, जूही, पल्लवी, जैसे जजेज ने इनका साथ दिया ।
सरोज खान को अपने कार्य के लिए बॉलीवुड में तो प्रशंसा मिली, साथ ही परन्तु उन्हें राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी काफी प्रशंसा प्राप्त हुई । हर कोई उनके काम का दीवाना था । हज़ारों नर्तक उनके नृत्य को अपना आधार मानकर उन्हें अपना मानते थे | सन 2003 में उन्हें फिल्म “देवदास” में “डोला रे डोला” गाने के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया | 2006 में इन्हे फिल्म “श्रृंगारम” तथा 2008 में “जब वी मेट” के लिए भी राष्ट्रीय पुरस्कार से अलंकृत किया गया |
फिल्म “लगान” के लिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अमेरिकन कोरियोग्राफी अवार्ड भी दिया गया | लगातार तीन बार 1989, 1990, 1991 में उन्हें फिल्मफेयर अवार्ड दिया गया | यह अवार्ड भी उन्हें अपने बॉलीवुड करियर में 8 बार प्राप्त हुआ | 1999 में नंदी अवार्ड “चूडालानी वुंडी” के लिए तथा 2011 में कलाकार पुरस्कार प्राप्त हुआ | सरोज खान का फ़िल्मी सफर काफी लम्बा रहा | 1950 से अपनी आखरी सांस तक वह बॉलीवुड से जुडी रही |
अपने बच्चों और पति के साथ वह अपनी ज़िन्दगी को काफी खुशहाल रूप में जीती रही | इन्हे बॉलीवुड की मदर ऑफ़ डांस के नाम से भी जाना जाता है | “तेज़ाब” , “बेटा” , “देवदास” , “हम दिल दे चुके सनम” , “खलनायक” जैसी फिल्मों की बात होगी तो सरोज खान के नृत्य के बिना पूरी नहीं होगी |
कहा जा रहा है कि अंतिम दिनों में वह कार्य को लेकर काफी सोचती थी | उन्हें यह लगता था कि काम कम हो गया है | अब पहले वाली बात नहीं रही, बस यह बात उनके ज़हन में बस गयी थी | परन्तु उन्होंने जितना भी कार्य किया वह हमेशा याद किया जायेगा | बॉलीवुड ने एक ऐसी कोरियोग्राफर को खो दिया है जो शायद सदी में एक बार जन्म लेती है |