पांच राज्यों में चुनाव हारने के बाद एनडीए में बेचैनी है। घटक दल प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर निशाना साध रहे हैं। मामूली राजनीतिक हैसियत वाले भी अब मोदी पर आखें तरेर रहे हैं और इस हार का ठीकरा मोदी पर फोड़ रहे हैं। जिन्हें मौका मिल रहा है वह एनडीए छोडकर नये ठिकाने की तलाश में हैं। हाल ही में रालोसपा के अध्यक्ष और पूर्व केन्द्रीय मंत्री उपेन्द्र कुशवाहा ने एनडीए छोड़कर महागठबंधन का दामन थाम लिया है। कुशवाहा को अब कांग्रेस में उम्मीदें नजर आ रही है। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी अब उपेन्द्र कुशवाहा को अच्छे लगने लगे हैं।
लोकसभा सीटों के बंटवारे को लेकर एनडीए और रालोसपा के बीच स्पष्ट रूपरेखा तैयार नहीं हो रही थी। इसीलिए अपनी बात मनवाने के लिए उपेन्द्र कुशवाहा ने पहले केन्द्रीय मंत्री से इस्तीफा दिया। कुशवाहा कई बार कह चुके हैं कि वह एनडीए में असहज महसूस कर रहे थे, क्योंकि उन्हें भाव नहीं दिया जा रहा था। अंततः उन्होंने एनडीए को बाय-बाय कहकर महागठबंधन का दामन थाम लिया।
जबकि मौसम वैज्ञानिक कहलाने वाले लोजपा अध्यक्ष और केन्द्रीय मंत्री रामविलास पासवान पांच राज्यों के चुनाव परिणाम आते ही अपना तेवर दिखाने लगे। विदित हो कि बिहार में बीजेपी और जेडीयू के बीच लोकसभा सीटों का बंटवारा हो चुका है। दोनों दल बिहार में 17-17 सीटों पर चुनाव लड़ेंगे। बाकी छह सीटों पर रामविलास की नजर थी और उन्होंने अपने बेटे सांसद चिराग पासवान के साथ बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह से मिलकर अपना पक्ष रख दिया। पांच राज्यो के चुनाव परिणाम भाजपा के पक्ष में नहीं आने के बाद मीडिया में दिये उनके बयानों से ऐसा लग रहा था कि उपेन्द्र कुशवाहा की तरह वह भी बीजेपी के साथ आर-पार के मूड में आ चुके थे।
रामविलास पासवान बिहार में बाकी बचे सभी छह सीट चाहते थे। मजबूरीवश बीजेपी हाईकमान को रामविलास पासवान की बातें माननी पड़ी। बीजेपी बिहार में लोकसभा सीटों को लेकर घटक दल के साथ किसी तरह की परेशानी मोल लेना नहीं चाहती है। इसलिए सीटों के मसले पर उपेन्द्र कुशवाहा की बात नहीं बनी लेकिन लोजपा के साथ समझौता करना बीजेपी की मजबूरी है। एनडीए से लोजपा के अलग होेने की नौबत आने पर देश में विशेषकर दलित जातियों में अच्छा संदेश नहीं जायेगा। इसी कारण समझौते के तहत लोजपा को छह सीटें दे दी गई है।
जबकि, रालोसपा अध्यक्ष उपेन्द्र कुशवाह के आधार वोट कोईरी और कुर्मी हैं, जिसके बडे नेता बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार माने जाते हैं। इसलिए उपेन्द्र कुशवाहा के जाने से एनडीए पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा। दलित, कोईरी, कुशवाहा अति पिछड़े और अल्पसंख्यक वर्ग के वोटों के लिए एनडीए को नीतीश कुमार की जरूरत है। इसीलिए बीजेपी और जेडीयू के बीच बराबर-बराबर सीटों का बंटवारा हुआ है। इस बंटवारे से दोनों दल खुश हैं। लेकिन इस बंटावारे पर विपक्षी दल का अलग नजरिया है। कांग्रेस के युवा नेता और राजस्थान के उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट ने बीजेपी पर चुटकी लेते हुए कहा है कि बीजेपी को बिहार में सीटों के बंटवारे पर जिस तरह घटक दलों के सामने झुकना पड़़ा है, उससे यह साबित होता है कि बीजेपी और मोदी सरकार दबाव में है।
बहरहाल, महागठबंधन में अन्य दलों को इकट्ठा करने के लिए मोदी विरोधी गाजे-बाजे के साथ तैयार बैठे हैं। आने वाले दिनों में एनडीए की नीतियों से नाराज अन्य दलों का भी समर्थन महागठबंधन को मिलने की संभावना है। जबकि, मोदी सरकार की नीतियों से एनडीए घटक दलों के कई नेता भी खुश नहीं दिख रहे हैं। अगर उनके साथ सम्मानजनक समझौता नहीं हुआ तो उन्हें पाला बदलने में देर नहीं लगेगी। 2019 लोकसभा के मद्देनजर एनडीए में अभी तो समझौते की शुरूआत भर है। अन्य राज्यों में समझौते होने अभी बाकी हैं। वहीं शिवसेना ने पहले ही एलान कर दिया है कि अगला लोकसभा चुनाव बीजेपी साथ नहीं लड़ेगी। इसलिए महाराष्ट्र में बीजेपी का एक बड़ा साझीदार खुद को अलग कर लिया है। यह बीजेपी के लिए बड़ी चुनौती है।
राष्ट्रीय स्तर पर देखा जाये तो जो दल कल तक एनडीए के साथ थे उनमें ज्यादातर ने महागठबंधन में जाने का अथवा अकेले चुनाव लड़ने का मन बना लिया है। टीडीपी अध्यक्ष चंद्र बाबू नायडु ने एनडीए के साथ विकट परिस्थितियों में भी साथ दिया है लेकिन कुछ महीने पहले ही एनडीए से अलग होकर वह अब महाठगबंधन अथवा तीसरा मोर्चा में अपना भविष्य तलाश रहे हैं। जबकि एनडीए घटक में शामिल रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इडिया के अध्यक्ष रामदास अठावले समय-समय पर केन्द्र सरकार को अपनी राजनीतिक हैसियत का अहसास कराते रहे है, और कई मौके पर एनडीए सरकार को कोसने में भी पीछे नहीं रहे है। जबकि हाल ही में अपना दल की नेता अनुप्रिया पटेल ने भी केन्द्र सरकार को खरी-खरी सुना दी है। इस तरह देखा जाये तो एनडीए में शामिल कई दल पाला बदलने की तैयारी में हैं। सभी को सीटों के बंटवारे का इंतजार है।




