Monday, March 2, 2026
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एनडीए के खिलाफ चुनावी मैदान में महागठबंधन या तीसरा मोर्चा ?

लोकसभा चुनाव 2019 से पहले उम्मीद है कि मोदी विरोधी सारे दल एक धूरी पर केन्द्रीत हो जायेंगे। क्योंकि मोदी विरोधियों को उनकी एकजुटता ही उनकी राजनीतिक हैसियत को चुनावी मैदान में उतरने लायक बना रही है। अन्यथा वह 2014 के लोकसभा चुनाव परिणाम से भली भाति अवगत हैं, और वैसी राजनीतिक आपदा वह दोबारा नहीं देखना चाहते हैं। अगर जो दल महागठबंधन में शामिल नहीं होंगे वह तीसरे मोर्चे की कवायद में जुटे हैं जिसकी पुरजोर कोशिश ममता बनर्जी, के सी राव, चंद्रबाबू नायडु सहित अन्य नेता कर रहे हैं।

बीजेपी के हाथ से तीन महत्वपूर्ण राज्यों की सत्ता छीन लेने से कांग्रेस में एक नई जान आ गई है। पार्टी कार्यकर्ताओं का हौसला बढ़ा है। महागठबंधन में भी कांग्रेस को फिर एक बार सिरमौर की तरह देखा जा रहा है। भले ही महागठबंधन में शामिल कुछ दलों को कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी का नेतृत्व मंजूर नहीं हो। लेकिन कांग्रेस की इस जीत के बाद यह भी साफ हो गया महागठबंधन में कांग्रेस की भूमिका रिंग लीडर की ही होगी, भले ही किसी को मंजूर हो या ना हो। सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव, बसपा अध्यक्ष मायवती और तृणमूल कांग्रेस अध्यक्ष ममता बनर्जी का रवैया कांग्रेस के प्रति अब तक साफ नहीं है। इन नेताओं का कहना है कि महागठबंधन की ओर से पीएम उम्मीदवार कौन होगा इसका फैसला अभी नहीं किया जाना चाहिए।

क्योंकि, कुछ दलों ने तीसरा मोर्चा का भी खाका पेश कर दिया है, जिसमें यह तो तय है कि पीएम के उम्मीदवार के रूप में राहुल गांधी नहीं होंगे। हालांकि आने वाले दिनों महागठबंधन और तीसरा मोर्चा की तस्वीर और साफ हो जायेगी। साथ ही यह भी स्पष्ट हो जायेगा कि एनडीए के खिलाफ चुनावी मैदान में मजबूती से कौन उतरेगा।

जबकि, महागठबंधन में भी राहुल गांधी अब स्वीकार्य होते जा रहे हैं। विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की जीत को राहुल गाधी की जीत कही जा रही है। महागठबंधन के नेता भी कहने लगे हैं कि राहुल गांधी अब परिपक्व नेता हो गये हैं। बीजेपी को करारी शिकस्त देने में राहुल गांधी का प्लान कामयाब रहा। वहीं, एनडीए छोड़ने वाले नेताओं का महागठबंधन सॉफ्ट ठिकाना बन रहा है। महागठबंधन भी रेड कार्पेट बिछाकर बैठा है।

2019 के चुनाव में एनडीए की घेराबंदी के लिए महागठबंधन कोई कसर बाकी नहीं छोड़ना चाहता। कभी एनडीए और नरेन्द्र मोदी का राग अलापते रहने वाले नेता भी अब कांग्रेस का गुणगान करने लगे हैं, और वह तेल और तेल की धार देख रहे हैं। हाल ही में रालोसपा के अध्यक्ष और पूर्व केन्द्रीय मंत्री उपेन्द्र कुशवाहा का एनडीए छोड़कर महागठबंधन में शामिल होने से एनडीए में खलबली मची है और उन्होंने मोदी से नाखुश एनडीए के घटक दल का रास्ता आसान कर दिया है।

बहरहाल, पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव परिणामों ने कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को ग्रेस दे दिया है। अब यूपीए में शामिल दल राहुल गांधी पर सवाल नहीं उठा रहे हैं। यूपीए में नाराज दलों के बीच भी राहुल गाधी स्वीकार्य बनते जा रहे हैं। इसलिए अब यह तय माना जाना चाहिए कि 2019 के लोकसभा चुनाव के लिए यूपीए की तरफ से राहुल गांधी ही पीएम उम्मीदवार होंगे। सीट समझौते को लेकर थोड़ी बहुत नाराजगी कांग्रेस से सपा और बसपा की है। लेकिन दोनों दलों को साधने की तैयारी में कांग्रेस जुट गई है। सलाहकारों से राय ली जा रही है और उम्मीद है कि जल्द ही सपा-बसपा के साथ सारे मतभेद खत्म कर लिये जायेंगे।

लोकसभा चुनाव 2019 से पहले उम्मीद है कि मोदी विरोधी सारे दल एक धूरी पर केन्द्रीत हो जायेंगे। क्योंकि मोदी विरोधियों को उनकी एकजुटता ही उनकी राजनीतिक हैसियत को चुनावी मैदान में उतरने लायक बना रही है। अन्यथा वह 2014 के लोकसभा चुनाव परिणाम से भली भाति अवगत हैं, और वैसी राजनीतिक आपदा वह दोबारा नहीं देखना चाहते हैं। अगर जो दल महागठबंधन में शामिल नहीं होंगे वह तीसरे मोर्चे की कवायद में जुटे हैं, जिसकी पुरजोर कोशिश ममता बनर्जी, के सी राव, चंद्रबाबू नायडु सहित अन्य नेता कर रहे हैं।

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