Monday, March 2, 2026
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तीन दशक पहले लिखी गई अलगाववाद के नाम पर घृणित पटकथा

पाकिस्तान के इशारे पर अलगाववादी और कथित धार्मिक संगठनों ने अलग कश्मीर के नाम पर युवाओं को बहकाना शुरू किया और गैर मुस्लिमों से नफरत करना सिखाया। वहां के बच्चों और युवाओं में इतना जहर भर दिया गया कि वह सही और गलत का फर्क करने में असमर्थ हैं। उन्हीं में जो अपने कॉम के लिए मरने मारने पर भी उतारू हो जाते हों, उनकी नब्ज को पहचानते हुए उन्हें फ्रीडम फाइटर करार देना शुरू किया। सीमा पार ले जाकर आतंक के आकाओं के निर्देश पर ट्रेनिंग दी जाने लगी और उन्हें चलता-फिरता आत्मघाती दस्ता बना दिया गया। आश्चर्य की बात है कि इतना सबकुछ एक दिन में नहीं हुआ है। यह पाक सरकार और अलगाववादियों की कई वर्षो की प्लानिंग है। बुरहान बानी, गाजी, गाबा, आदिल डार जैसे न जाने कितने कॉमपरस्त युवा कश्मीर में अब भी मौजूद होंगे जो मरने, मारने और खुद को बम से उड़ाने में जरा भी नहीं हिचकेंगे।

तत्कालीन केन्द्र और राज्य की सरकारों ने इससे निपटने की जगह अपना-अपना हित साधा

अक्सर कहा जाता है कि धरती पर अगर कहीं स्वर्ग है तो वह है कश्मीर। लेकिन पिछले तीन दशकों से कश्मीर आये दिन लहू लुहान हो रहा है। प्राकृतिक सौंदर्य और संपदाओं से भरपूर इस राज्य की धरती पर आतंकवाद और अलगाववाद की फसल उगाई जा रही है। वहां की नई पीढ़ी अलगाववाद की भाषा बोेल रही है और आतंकवादी गतिविधियों में सक्रिय है। वहां की फिजा में नफरत, वैमनस्य और कट्टरवाद की लहर है। नई पीढ़ियों को यह बताया जा रहा है कि भारत तुम्हारा देश नहीं है। तुम आजाद कश्मीर के लिए जिहाद करो। कथित धार्मिक संगठनों की इसमें सलिप्तता भी पायी जा रही है। नई पीढ़ी सही और गलत में फर्क ना करते हुए लोभ और लालचवश उन संगठनों के चंगुल में फंस जाती है जिनका उद्देश्य दीन-धर्म के नाम पर युवाओं को बहकाना है। जम्मू-कश्मीर में आज जो हालात पनपे हैं उसकी बीज करीब तीन दशक पहले बोई गई थी। अलगाववाद के पैरोकार लम्बे समय तक कश्मीर की सियासत का हिस्सा बने रहे और कश्मीर को भारत से अलग करने के लिए हर कथकंडे अपनाये, और आज भी कश्मीर के मसले पर उनकी भाषा और उनके तेवर नहीं बदले हैं।

जबकि, क्रॉस बॉर्डर नीति को अपनाकर चलने वाले ये सभी अलगाववादी नेता एक तरह से पाकिस्तानी सियासत का मोहरा बने हुए हैं, जिनमें कहीं न कहीं कश्मीर की सियासत की भी भूमिका रही है। क्योंकि इस जख्म को कश्मीर की सियासत ने ही नासूर बनाया है। अलगाववाद को लेकर वहां की सियासी पार्टियों के स्टैंड आज भी स्पष्ट नहीं हैं। यहां तक की अलगाववादी हिंसा को लेकर इन पार्टियों के नेता भारत सरकार की नीतियों को ही गलत ठहराते हैं। जबकि अलगाववाद से जुड़ी हिंसा पर पाकिस्तान को लेकर इन पार्टियों के रूख नरम रहते हैं। पुलवामा आतंकी हमले के बाद भी इन नेताओं के रूख नहीं बदले हैं और जिम्मेदार भारत सरकार को ही ठहरा रहे हैं। यहां तक कि कुछ अलगाववादी नेता तो अब भी पाकिस्तान को एक मौका और देने और वार्ता जारी रखने की वकालत कर रहे हैं। एक नापाक इरादों के तहत 90 के दशक में ही कश्मीर से पांच लाख कश्मीरी पंडितों को दर बदर कर दिया गया था। उनके प्रवास के लिए आज तक न वहां की सरकार ने कोई नीति बनायी और ना ही केन्द्र की सरकार अलगाववादी गतिविधियों पर रोक लगाने के लिए कोई ठोस कदम उठा सकी।

इस हिंसा में लाखों लोगों की जानें गई। महिलाओं की आबरू लूटी गई। नवजातों को जूते के नीचे रौंद दिया गया। अलगाववादी संगठनों द्वारा माइक से एलान किये गये थे कि गैर मुस्लिम 24 घंटा के अंदर कश्मीर खाली कर दें। कश्मीर नहीं छोड़ने वाले गैर मुस्लिमों को रूह कंपा देने वाली मौत दी गई। लेकिन तत्कालीन केन्द्र और राज्य की सरकार खामोश रही। ऐसा महज इसलिए किया गया कि कश्मीर में इस्लामिक जनाधार मजबूत किया जा सके। ताकि भविष्य में कश्मीर को लेकर वोटिंग की भी नौबत आये तो जीत का आधार सुनिश्चित की जा सके। अलगाववादी संगठन के नेता कश्मीर पर वोटिंग की मांग अरसे से करते आ रहे हैं। पाकिस्तान अंतर्राष्ट्रीय मंच पर भी कश्मीर को लेकर वोटिंग की बात कई बार दुहरा चुका है। पाकिस्तान कश्मीरी अलगाववादियों को मोहरा बनाकर भारत के खिलाफ प्रॉक्सी वॉर में जुटा है। भारत के खिलाफ सामने से हर बार युद्ध में मात खा जाने पर पाकिस्तान अब फ्रंट पर न आकर जिहादी मानसिकता से जुड़े लोगों को उकसाना शुरू किया और भारत के खिलाफ उन्हें हर तरह से सपोर्ट करने लगा। पाक सरकार के इस कार्य में कश्मीर में दर्जनों अलगाववादी और जिहादी संगठन पे रोल काम करने लगे और उन्हें हवाला के जरिये पैसा भेजा जाने लगा, जिसकी जांच एनआईए कर रही है। हवाला से पैसा पाने वालों में कई अलगाववादी संगठनों के भी नाम हैं और इस मामले में कई बार उन नेताओं से भी पूछताछ की जा चुकी है।

पाकिस्तान के इशारे पर पैसे के लालच में वहां के अलगाववादी और कथित धार्मिक संगठनों ने अलग कश्मीर के नाम पर युवाओं को बहकाना शुरू किया और गैर मुस्लिमों से नफरत करना सिखाया। वहां के बच्चों और युवाओं में इतना जहर भर दिया गया कि वह सही और गलत का फर्क करने में असमर्थ हैं। उन्हीं में जो अपने कॉम के लिए मरने, मारने पर भी उतारू हो जाते हों, उनकी नब्ज को पहचानते हुए उन्हें फ्रीडम फाइटर करार देना शुरू किया। सीमा पार ले जाकर आतंक के आकाओं के निर्देश पर ट्रेनिंग दी जाने लगी और उन्हें चलता-फिरता आत्मघाती दस्ता बना दिया गया। यह भी देखा गया है कि पाकिस्तान में संचालित आतंकी कैम्पों में ट्रेनिंग लेकर कश्मीर आने वाले उन युवाओं को कश्मीर की जनता हीरो की तरह सम्मान करती है। उनके माता-पिता और उनके संबंधी उनपर गर्व करते हैं। आश्चर्य की बात है कि इतना सबकुछ एक दिन में नहीं हुआ है। यह पाक सरकार और अलगाववादियों की कई वर्षो की प्लानिंग है। बुरहान बानी, गाजी, गाबा, आदिल डार जैसे न जाने कितने कॉमपरस्त युवा कश्मीर में अब भी मौजूद होंगे जो मरने, मारने और खुद को बम से उड़ाने में जरा भी नहीं हिचकेंगे।

बहरहाल, वहां की नई पीढ़ी को आग में झोंकने का काम कश्मीर के सियासतदानों ने किया है, लेकिन इस सच्चाई को स्वीकार करने को कोई तैयार नहीं है। आज कश्मीर में लाखों युवा बेरोजगार हैं तो तो उसके लिए वहां की सियासत जिम्मेदार है, जो उन्हें कलम थमाने की जगह बंदूक थमा दिया है। अलगाववादी संगठनों के संचालक और पैरोकारी नेता मीडिया चैनलों पर चिल्ला-चिल्लाकर कह रहे हैं कि कश्मीर का युवा बंदूक उठाने पर मजबूर है। जबकि यह सवाल उन्हें अपने आप से पूछने की जरूरत है कि अलगाववाद के नाम पर कश्मीरियों को दोराहे पर कौन खड़ा किया है। उन्हें मुख्यधारा से बाहर रखने के लिए कौन जिम्मेदार है। उन युवाओं को काम करने की जगह आरामपरस्त जिंदगी जीने का आदी कौन बनाया। जमीनी तौर पर ऐसे कई सवाल हैं जो वहां के बच्चों और युवाओें को भटकाने वाले अलगाववादी नेताओं को खुद से करने की जरूरत है कि, आखिर किसकी वजह से कश्मीर आज जन्नत की जगह नर्क में तब्दील होता जा रहा है। अलगाववादी संगठनों के संचालकों ने अगर हालातों पर गौर किया होता तो आज कश्मीर और वहां के अवाम की ऐसी दशा नहीं होती।

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