बदजुबानी में अली, बजरंग बली से होते हुए अंडरवियर तक पहुंच गये नेता
लोकसभा चुनाव 2019 का दौर शुरू हो चुका है। राजनीतिक दलों की रैलियां भी इस बार सुर्खियों में हैं और नेता चर्चे में। बदजुबानी में किसी भी दल का नेता दूसरे से खुद को कमतर नही आंक रहा है। बीजेपी, कांग्रेस, सपा, बसपा, त्रृणमूल जैसे कई राजनीतिक दलों के शीर्ष नेता इस बार बदजुबानी के कारण चर्चा में बने हुए हैं।
इस चुनाव में राजनीतिक दलों के पास मुद्दों का अभाव दिख रहा है। इसलिए नेताओं ने अनाप-शनाप बयानबाजी कर जनता को उलझाकर रख दिया है। सियासत में कभी बजरंग बली को तो कभी अली को घसीटा जा रहा है। इतना ही नहीं अपने-अपने इलाके में वर्चस्वता को दिखाने के लिए नेताओं द्वारा प्रतिद्धंद्धी उम्मीदवारों की निजता का भी माखौल उड़ाया जा रहा हैं। हालांकि इन सब मसलों पर चुनाव आयोग सख्ती से पेश आ रहा है लेकिन नेताओं पर इसका कोई फर्क नहीं पड़ रहा है। नेताओं ने चर्चा में बने रहने के लिए और भी तरीके ढूंढ लिये हैं।
आचार संहिता का उल्लंघन करने वाले नेताओं और उम्मीदवारों पर चुनाव आयोग ने अल्पकालीन बैन लगाया है। किसी को 48 घंटे तो किसी को 72 घंटे चुनावी रैलियों से दूर रखा गया।
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा बजरंग बली के उपर दिये गये बयान पर पलटवार करते हुए सपा के वरिष्ठ नेता आजम खान ने बजरंग अली का नाम दिया था। इसपर काफी हो हल्ला मचा। चुनाव के दौरान इस तरह के सियासी घमासान पहले देखने को नहीं मिले।
आचार संहिता के उल्लंघन के आरोप में अब तक उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, बसपा अध्यक्ष मायावती, सपा नेता आजम खान और बीजेपी की नेता मेनका गांधी पर चुनाव आयोग ने प्रतिबंध लगाया है।
लेकिन, महिला पर बदजुबानी को लेकर सबसे ज्यादा सुर्खियों में सपा नेता आजम खान बने हुए हैं। बता दें कि आजम खान ने रामपुर से बीजेपी की उम्मीदवार अभिनेत्री जया प्रदा पर शर्मनाक बयान दिया है, जिसकी घोेर निंदा की जा रही है। आजम खान के बयान पर समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव और मुलायम सिंह ने चुप्पी साध ली है। गौर हो कि जिस रैली में आजम खान बदजुबानी कर रहे थे उसी रैली में अखिलेश यादव बैठे थे।
सपा अध्यक्ष होने के नाते अखिलेश यादव से प्रतिक्रिया मांगी जा रही है लेकिन वह अब तक खामोश हैं। जबकि अखिलेश यादव की पत्नी डिंपल यादव ने इसे मामूली सी बात करार दिया है। जया प्रदा पर दिये गये बयान को लेकर महिला आयोग और चुनाव आयोग द्वारा संज्ञान में लिये जाने पर आजम खान ने मीडिया के सामने कहा है कि उन्होंने किसी का नाम नहीं लिया है।
ज्ञात हो कि, जया प्रदा पहले समाजवादी पार्टी में थी और रामपुर से दो बार सांसद चुनी गई थीं। इस बार जया प्रदा ने बीजेपी का दामन थाम लिया है और बीजेपी की ओर से रामपुर में आजम खान के खिलाफ चुनावी मैदान में हैं। जया प्रदा को अपना प्रतिद्धंद्धी देखकर आजम खान अपना आपा खो बैठे हैं और उनपर अनाप-शनाप बयान दे रहे हैं। उन्होंने मर्यादा की हद यहां तक लांघ दी कि उन्होंने चड्डी का रंग खाकी बता दिया। आजम खान के बयान पर पार्टी की किरकिरी होने के बाद सपा के कई शीर्ष नेता आजम खान के बचाव मे उतर गये हैं। सपा के प्रवक्ता टीवी डिबेट में आजम खान के बचाव में बेसिर पैर की बात करने लगे और मीडिया को ही नसीहत देने लगे।
बहरहाल, जया प्रदा पर अश्लील बयान देने पर महिला आयोग ने आजम खान को नोटिस भेज दिया है। हैरानी इस बात की है कि इतना सब कुछ होने के बावजूद गठबंधन पार्टी बसपा की अध्यक्ष मायावती ने भी चुप्पी साध ली है। जबकि नारी अस्मिता के नाम पर मायावती से इसपर प्रतिक्रिया की मांग की जा रही है, लेकिन अभी तक उन्होंने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है। बहरहाल, इस बार चुनाव मैदान में उतरे नेता जीत-हार से कहीं ज्यादा अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं। लिहाजा मौका-दर मौका एक दूसरे नीचा दिखाने, बदजुबानी और निजता पर हमले से भी बाज नहीं आ रहे हैं।
मीडिया चैनलों में भी राजनीनिक दलों के प्रवक्ता एक दूसरे को नीचा दिखाने के लिए मर्यादा की सीमाएं लांघ जा रहे हैं। प्रवक्ताओं की फिसलती जुबान से कई बार राजनीतिक दलों की किरकिरी हुई है। लेकिन गंभीर मुद्दों पर जब पार्टी का स्टैंड उन्हें रखना पड़ता है तो प्रवक्ता असहज हो जाते हैं और उससे बचने के लिए अनाप-शनाप बयान देने लगते हैं, जो तर्कसंगत नहीं लगता है।
सूत्रों के मुताबिक, एनडीए, यूपीए, गठबंधन, महागठबंधन और अन्य को मिलाकर 149 राजनीतिक दल चुनाव मैदान में हैं, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर उनके पास मुद्दों का अभाव दिख रहा है। रोटी, पानी, आवास, रोजगार, महंगाई और बीमारी जैसे मुद्दे चुनावी रैलियों से लगभग गायब हैं। गैरजरूरी मुद्दों पर चुनाव लड़े जा रहे हैं। राष्ट्रवाद, धर्मनिरपेक्षता, जातिवाद, क्षेत्रवाद और वंशवादी सोच में उलझती दिख रही है इस बार की चुनावी रैलियां।
इतना ही नहीं एनडीए सरकार की नीतियों की विफलता को विपक्षी दल हथियार बनाकर चुनाव लड़ रहे हैं। जबकि उनका अपना एजेंडा कुछ नहीं दिख रहा हैं। विपक्ष नोटबंदी, जीएसटी, बेरोजगारी और साम्प्रदायिक मामलों को तूल देकर चुनाव जीतने की कोशिश में है।
विपक्षी दलों की एकजुटता महज नाम की है। इन दलों के बीच सियासी मतभेद इस कदर है कि सभी दल मिलकर भी विपक्ष की ओर से पीएम उम्मीदवार तक घोषित नहीं कर सके हैं। अवसरवाद के घोड़े पर सवार विपक्षी दल अपने घटक के उम्मीदवारों को भी हराने के लिए खेमेबाजी करते दिख रहे हैं।
आगे-आगे क्या होता है देखते जाइये…!




