लोगों में वोटिंग के प्रति उत्साह और बम्पर हुए मतदान ने राजनेताओं की बैचैनी बढ़ा दी है। 23 मई को उम्मीदवारों के भविष्य का मूल्यांकन होगा, लेकिन कुछ नेताओं को अभी से ही हार का डर सताने लगा है और आरोप-प्रत्यारोप के दौर शुरू हो गये हैं। कोई अभी से ही ईवीएम पर ठीकरा फोड़ने लगा है तो कोई प्रशासनिक व्यवस्था पर। बहरहाल, कुछ राजनीतिक दल विपक्षी एकजुटता को और मजबूत करने पर बल दे रहे हैं, ताकि एनडीए को हर मोर्चे पर घेरा जा सके। जातीय ध्रूवीकरण के आधार पर कहा जा सकता है कि इस बार ज्यादातर क्षेत्रीय दल विपक्ष के पाले में जाते दिख रहे हैं।
गत महीने सपा-बसपा गठबंधन के दौरान उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने कहा था कि अगर उत्तर प्रदेश की लोकसभा सीटों को हटा दिया जाये तो केन्द्र की बीजेपी सरकार अल्पमत में आ जायेगी। उन्होंने गठबंधन दलों के नेताओं से कहा था कि जिन राज्यों में जातीय बहुलता है उन राज्यों में हम सभी मिलकर बीजेपी को करारी शिकस्त दे सकते हैं।
लिहाजा, एक दूसरे के कट्टर विरोधी सपा-बसपा गठबंधन के पीछे मकसद यही है कि जातिगत वोटों के बिखरने से रोका जाये। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बसपा के आधार वोट हैं और पार्टी अध्यक्ष मायावती की कोशिश है कि दलितों के वोट बीजेपीे के पाले में नहीं जाये। जबकि समाजवादी पार्टी इस बार यादव और अल्पसंख्यक वर्ग को भुनाने की पुरजोर कोशिश में है।
बदलते चुनावी परिदृष्य से पता चलता है कि सपा-बसपा का अपना आधार वोट उसके पाले में आता दिख रहा है। लोगों के रूझान से भी लग रहे हैं कि सपा-बसपा का जमीनी आधार मजबूत हो रहा है, जो 2014 में पूरी तरह हिल गया था।
बहरहाल, सपा-बसपा गठबंधन इस बार बीजेपी को भरपूर चुनौती देने की तैयारी में है। इसलिए लिए दोनों ही दलों नेे अपने-अपने इलाके में बीजेपी के उम्मीदवारों के खिलाफ जातीय मोर्चाबंदी शुरू कर दी है।
चुनावी समीक्षक मान रहे हैं कि 2014 लोकसभा चुनाव के परिणामों से सबक लेते हुए विपक्षी दल एनडीए को चुनौती देने के लिए जातिगत राजनीति की धूरी पर केन्द्रीत हो गये हैं।
भारतीय राजनीति में जाति एक महत्वपूर्ण फैक्टर है। कुछ राज्यों में दलों की राजनीति तो जातियों के इर्द-गिर्द ही घूमती रहती है। वहीं कुछ नेताओं की पहचान ही भारतीय राजनीति में जाति के आधार पर बनी हुई है। अगर जातिगत वोट का आधार खिसक गया तो वैसे नेता हाशिये पर भी पहुंच जाते हैं। 2014 का चुनाव परिणाम तो उन दलों के लिए राजनीतिक आपदा से कम नहीं थी। उस परिणाम से यह पता चलता है कि कई दलों के जातीय समीकरण ही फेल हो गये थे।
इस सच्चाई को नकारा नहीं जा सकता है कि, जातिगत समीकरणों के आगे सारे मानदण्ड, नैतिकता और तमाम तरह के वायदे-कवायदे धरे के धरे रह जाते हैं। भारत में हर जाति की एक राजनीतिक वैल्यू है। लिहाजा जिस क्षेत्र में जिस जाति की बहुलता होती है उस जाति का उम्मीदवार जीत की गारंटी माना जाता है। देश-राज्य में जातिगत समीकरणों का आधार भले ही अलग अलग है लेकिन राजनीतिक दलों का नजरिया अलग नहीं है। चुनावों में विकास के एजेंडे से कहीं ज्यादा यह मायने रखते हैं कि पार्टियों की जीत में किस जाति की क्या भूमिका होगी।
उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा, रालोद, बिहार में राजद और वामपंथी दल, झारखण्ड में झामुमो और पश्चिम बंगाल में त्रृणमूल एवं अन्य राज्यों में भी पार्टियों के आधार वोट हैं। यह अलग बात है कि परिस्थितिजन्य ये आधार वोट अन्य दलों में बिखरते भी रहे हैं। यही कारण है कि इन दलों के साथ राष्ट्रीय पार्टियां गठबंधन के लिए हमेशा तैयार रहती है।
लोकसभा चुनाव 2019 के परिदृष्य मेें जिस तरह मोदी सरकार के खिलाफ विपक्षी दलों की गोलबंदी शुरू हुई है उसका प्रभाव तो चुनाव परिणाम मे दिखने की प्रबल संभावना है।
इस बार राजनीतिक दलों की गोलबंदी जाति की बिसात पर है। हालांकि एनडीए भी अपने घटकों के साथ जातिगत समीकरणों को बिठाने में पीछे नहीं है। बीजेपी ने सवर्ण, पिछड़ों और अल्पसंख्यक वर्ग को लुभाने के लिए कई वायदे किये हैं और उम्मीदवारों के चयन में भी काफी सतर्कता बरती गई है। लेकिन विपक्षी गठबंधन के आगे एनडीए का जातीय समीकरण कमजोर दिख रहा है। क्योंकि गठबंधन दलों की रणनीति है कि विशेषकर छोटे-छोटे क्षेत्रीय दलों को बीजेपी के खेमे में जाने से रोका जाये। इसके लिए उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखण्ड, पंजाब, पश्चिम बंगाल और दक्षिण के राज्यों में विपक्षी एकजुटता बनाये रखने पर बल दिया गया है। जातीय ध्रूवीकरण के आधार पर कहा जा सकता है कि इस बार ज्यादातर क्षेत्रीय दल विपक्ष के पाले में जाते दिख रहे हैं।
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