Monday, March 2, 2026
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हार के बाद विपक्षी दलों में घमासान ! पाला बदलने लगे नेता

लोकसभा चुनाव में मिली पराजय ने विपक्षी दलों को अंदर तक झकझोर दिया है। चुनाव में हार के बाद पार्टियों में हाहाकार मची है। नेताओं के पार्टी छोड़ने का सिलसिला जारी है। बिहार से लेकर बंगाल तक यही बानगी देखने को मिल रही है। कर्नाटक, मध्य प्रदेश, राजस्थान एवं उत्तर भारत के कई राज्यों में विपक्षी नेता पाला बदलने की तैयारी में दिख रहे हैं। नेताओं की छटपटाहट, उदासी और कार्यकर्ताओं की मायूसी को देखकर कहा जा सकता है कि विपक्षी दलों को इस हार से उबरने में वक्त लगेगा।

लोकसभा चुनाव 2019 के परिणाम ने जहां एनडीए को दोबारा केन्द्र में सत्तासीन कर दिया, वहीं विपक्षी दलों में बगावत की चिंगारी सुलगने लगी है। अधिकांश विपक्षी दलों में शीर्ष नेतृत्व के खिलाफ विरोध के स्वर तेज होने लगे हैं। विपक्षी दलों में अजीब सी बेचैनी है और इस हार का ठीकरा किसपर फोड़ा जाये इसके लिए तरकीबें ढूंढी जा रही है। जबकि कई दलगत नेताओं का कहना है कि चुनाव लड़ना सामूहिक जिम्मेदारी है तो हार का ठीकरा सिर्फ पार्टी नेतृत्व पर ही क्यों ?

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने हार की जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफे की पेशकश की, लेकिन उनका इस्तीफा नामंजूर हो गया। इसपर चुटकी लेते हुए सीपीआई के नेता अतुल अंजान ने कहा है कि राहुल गांधी का यह सिर्फ ड्रामा है। इस्तीफे का नाटक कांग्रेस में कुछ दिन चलेगा, फिर सबकुछ सामान्य हो जायेगा। क्योंकि जब पार्टी पर परिवार का एकाधिकार है तो राहुल गांधी के इस्तीफे पर अड़े रहना हास्यास्पद लगता है। लेकिन कांग्रेस की ऐसी दशा क्यों हुई है इसपर पार्टी के शीर्ष नेताओं को आत्ममंथन करना चाहिए।

सीपीआई नेता अतुल अंजान की मानें तो पिछले साल तीन राज्यों के विधानसभा चुनावों में जीत दर्ज करने के बाद कांग्रेस ने सहयोगी दलों को तरजीह देना बंद कर दिया था। कांग्रेस के शीर्ष नेताओं को इस बात का दंभ हो गया था कि लोकसभा चुनाव में पार्टी बेहतर प्रदर्शन करेगी। इसलिए कांग्रेस ने सहयोगी राजनीतिक दलों के साथ सिर्फ औपचारिकतावश मेलजोल रखा। ताकि वक्त पड़ने पर इन दलों का साथ लिया जा सके।

बहरहाल, इस हार के बाद कांग्रेस, सपा-बसपा, राजद और तृणमूल सहित अन्य विपक्षी दल जो किसी न किसी घटक के हिस्सा बने हुए थे, उनके नेताओं और कार्यकर्ताओं में मायूसी छायी हुई है। सबसे बड़ी बात है कि अब कार्यकर्ता मुखर होकर इस हार का ठीकरा पार्टी नेतृत्व पर फोड़ रहे हैं।

राष्ट्रीय जनता दल के विधायक महेश्वर यादव द्वारा तेजस्वी यादव से नेता प्रतिपक्ष पद से इस्तीफा मांगने पर पार्टी में खलबली मच गई है। पार्टी के शीर्ष नेता और विशेषतौर पर कहें तो लालू परिवार डैमेज कंट्रोल में जुट गया है। राबड़ी देवी इस मामले को शांत करने की कोशिश में जुट गई हैं। उनके घर पर पार्टी के शीर्ष नेताओं की मीटिंग रखी गई, लेकिन उस मीटिंग में लालू के बड़े पुत्र तेजप्रताप यादव शामिल नहीं हुए। इसपर कयास लगाये जा रहे हैं कि तेजप्रताप ने पार्टी और परिवार से दूरी बना ली है। लोकसभा चुनाव के पहले से ही लालू के दोनों बेटों तेजप्रताप और तेजस्वी यादव के बीच अहम के टकराव दिख रहे थे। अब राजद के शीर्ष नेता खुलकर बोलने लगें हैं कि तेजप्रताप के बगावती सुर के कारण भी पार्टी को काफी नुकसान हुआ हैं।

राजद के शीर्ष नेता रघुवंश प्रसाद सिंह इस हार के लिए तेजप्रताप को भी जिम्मेदार मानते हैं। इसपर तेजप्रताप ने पलटवार करते हुए कहा है कि उन्होंने पहले ही तेजस्वी को चेतावनी दी थी कि वह भीतरघात करने वाले लोगों से बच के चलें, लेकिन उनकी बात नहीं मानी गई ।

बहरहाल, हार का ठीकरा तेजस्वी यादव पर फोड़ने के बाद राजद सहित महागठबंधन के कई नेता उनके बचाव में उतर गये हैं। हिन्दुस्तानी अवाम मोर्चा के अध्यक्ष जीतन राम मांझी ने कहा है कि तेजस्वी ने भरपूर प्रयत्न किया है। हार-जीत तो लगी रहती है लेकिन परिणाम उम्मीद के अनुकूल नहीं आये हैं तो उसपर हम सभी मिलकर विचार करेंगे। तेजस्वी यादव राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव की राजनीतिक विरासत को आगे ले जा रहे है। लालू यादव के जेल जाने के बाद पार्टी की पूरी जिम्मेदारी तेजस्वी यादव पर ही है।

जबकि, राजद विधायक महेश्वर यादव की मानें तो, अगर तेजस्वी यादव नेता प्रतिपक्ष पद से इस्तीफा नहीं देते हैं तो पार्टी दो फाड़ हो जायेगी। महेश्वर यादव ने कहा है कि उनके पास 25 विधायक है जो पार्टी छोड़ने का मन बना चुके हैं। उन्होंने यहां तक कहा है कि या तो नई पार्टी बनेगी या फिर हम किसी अन्य दल में शामिल हो जायेंगे। क्योंकि तेजस्वी यादव के नेतृत्व में राजद का भविष्य अंधकारमय दिख रहा है। पार्टी पर परिवार का वर्चस्व बढ़ने से आज राष्ट्रीय जनता दल का ऐसा हाल हुआ है। अगर ऐसा ही चलता रहा तो आरजेडी एक परिवार की पार्टी बनकर रह जायेगी।

राष्ट्रीय जनता दल में अब बिखराव दिखने लगा है क्योंकि तेजस्वी का नेतृत्व आरजेडी के कई नेताओं और कार्यकर्ताओं को मंजूर नहीं हैं। पार्टी में विरोध की चिंगारी सुलगने लगी है। अब राजद के कई नेता कहने लगे हैं कि इस हार के जिम्मेदार तेजस्वी यादव हैं। पार्टी और महागठबंधन ने उनको बड़ी जिम्मेदारी दे दी थी। इतनी बड़ी जिम्मेदारी उनको अभी देने की जरूरत नहीं थी।

रालोसपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष उपेन्द्र कुशवाहा ने सीटों के लालच में एनडीए से अलग होकर महागठबंधन का हाथ थाम लिया था। लेकिन लोकसभा चुनाव में मिली पराजय में उन्हें न घर का छोड़ा न घाट का। दो सीट पर चुनाव लड़ने के बावजूद वह हार गये। बाकी तीन सीट पर उनके उम्मीदवारों को भी हार का सामना करना पड़ा है। समस्या यहीं खत्म नहीं हुई। इस हार का असर यह हुआ कि रालोसपा के दो विधायक जदयू में शामिल हो गये। पार्टी के अंदर शीर्ष नेतृत्व को लेकर एक अजीब सा असंतोष व्याप्त है। पहले ही रालोसपा दो गुट में बंट चुका हैं। कहा जा रहा है कि उपेन्द्र कुशवाह की पूरी सियासी जमीन ही खिसक गई है। आने वाले दिनों में कई और चुनौतियों का सामना उपेन्द्र कुशवाहा को करना पड़ सकता है।

सपा-बसपा में भी इस हार के बाद आत्ममंथन का दौर शुरू हो गया है। चुनाव परिणाम के तुरंत बाद ही समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने टीवी डिबेट में शामिल होने वाले प्रवक्ताओं को तत्काल प्रभाव से हटा दिया और इस हार की कमजोर कड़ी ढूंढी जा रही है। राजनीतिक समीक्षकों का मानना है कि जिस उम्मीद से उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा गठबंधन हुआ था उसका उल्टा परिणाम निकला।

समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता मुलायम सिंह यादव शुरू से ही इस गठबंधन के खिलाफ थे और उन्होंने कहा था कि हम तो आधी सीट पहले ही हार चुके हैं। मुलायम सिंह यादव ने अखिलेश यादव के फैसले को आत्मघाती बताया था। लेकिन सपा-बसपा गठबंधन के लिए मुलायम सिंह से सहमति तक नहीं ली गई थी। सपा की हार के बाद मुलायम सिंह ने तल्ख लहजे में कहा है कि हम पार्टी को बर्बाद होते नहीं देख सकते। मुलायम ने अखिलेश यादव को फटकार लगाते हुए कहा है कि अपनी मनमानी बंद करो नहीं तो कहीं के नहीं रहोगे। चाचा रामगोपाल यादव ने भी हार का ठीकरा अखिलेश यादव पर फोड़ा है। उनका मानना है कि गठबंधन की वजह से जीतने वाली कई सीट हम बसपा के लिए छोड़ दिये और कई गलत उम्मीदवारों का भी चयन किया गया, जिसके परिणाम सामने हैं। जबकि बसपा अध्यक्ष मायावती हार के बाद मीडिया से दूरी बना ली हैं और हार पर स्वतः मंथन कर रही हैं। बसपा के शीर्ष नेता भी कुछ भी बोलने को तैयार नहीं हैं शायद उन्हें पार्टी नेतृत्व द्वारा कुछ भी बयान देने से बचने की हिदायत दी गई है।

इस हार का सबसे बड़ा झटका तृणमूल कांग्रेस अध्यक्ष और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को लगा है। लोकसभा चुनाव में पश्चिम बंगाल में तृणमूल से कई मजबूत गढ़ बीजेपी ने छिन ली। चुनाव के दौरान पश्चिम बंगाल में राजनीतिक हिंसा भी दिखी जिसमें बीजेपी के कई कार्यकर्ता मारे गये हैं। बीजेपी ने ममता बनर्जी पर आरोप लगाया था कि चुनाव जीतने के लिए बंगाल सरकार अराजक तत्वों का सहारा ले रही है। तृणमूल के दुर्ग में बीजेपी की सेंधमारी से ममता बनर्जी परेशान हो गई हैं और अब उनको वह झटका लगा है जिसकी उम्मीद उन्हें नहीं थी। अब तक तृणमूल के 4 विधायक, 63 पार्षद और कई नेता बीजेपी में शाामिल हो गये हैं। सूत्रों का कहना है कि ममता बनर्जी की तानाशाही रवैये के कारण आने वाले दिनों में और भी विधायक, नेता और कार्यकर्ता पार्टी छोड़ सकते हैं।

बहरहाल, लोकसभा चुनाव में मिली पराजय ने विपक्षी दलों को अंदर तक झकझोर दिया है। चुनाव में हार के बाद पार्टियों में हाहाकार मची है। नेताओं के पार्टी छोड़ने का सिलसिला जारी है। बिहार से लेकर बंगाल तक यही बानगी देखने को मिल रही है। कर्नाटक, मध्य प्रदेश, राजस्थान एवं उत्तर भारत के कई राज्यों में विपक्षी नेता पाला बदलने की तैयारी में दिख रहे हैं। नेताओं की छटपटाहट, उदासी और कार्यकर्ताओं की मायूसी को देखकर कहा जा सकता है कि विपक्षी दलों को इस हार से उबरने में वक्त लगेगा।

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