तुष्टिकरण की राजनीति कांग्रेस के लिए अब मुसीबत बनती जा रही है।
यह देश कई आंतरिक और बाह्य चुनौतियों से गुजर रहा है। उसे देखने के लिए नेताओं को अपनी आंखों पर से जातिवाद, परिवारवाद और तृष्टिकरण का चश्मा उतारना होगा। लेकिन भारतीय सियासत में लम्बी पारी खेलने के लिए हर नेता सेफ जोन तलाशकर बैठे हैं। उनकी रणनीति, उनके बयान और उनकी पार्टीगत विचारधारा देश के करोड़ों मतदाताओं विशेषकर युवाओं की नजर में क्या अहमियत रखते हैं, उसे लोकसभा चुनाव-2019 के परिणामों से समझा जा सकता है। दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश भारत में सबसे अधिक युवा हैं जिनकी सोच परम्परागत राजनीतिक सोच से बिल्कुल भिन्न है। वह खुशहाल भारत की कल्पना करता है। विकसित भारत के सपने देखता है। तकनीकी दौर ने उसकी सोच को और मजबूत किया है। इसलिए वह जातिवाद, वंशवाद और कई दिकियानुसी विचारधाराओं को छोड़कर अलग राह चलने का प्रयास करते हैं।
दुर्भाग्य है कि हमारे देश के राजनेता युवा पीढ़ी की सोच पढ़ पाने में असमर्थ हैं। इस लोकसभा चुनाव परिणाम में वंशवाद, परिवारवाद और जातिवाद की जड़ें हिला दी है। कई नेताओं के राजनीतिक विरासत खतरे में है तो कई नेताओं के राजनीतिक कैरियर ही समाप्त होते दिख रहे हैं। इस परिणाम ने उन्हें भी हाशिये पर ला दिया कि जिन्हें हमेशा लगता था कि वह राजनीति में अपराजेय हैं। क्योंकि उनके पूर्वजों ने देश के विकास में अतुल्य योगदान दिया है। उनकी राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाना ही जिन्होंने अपनी नैतिक जिम्मेदारी समझी। लेकिन यह भी सच है कि पूर्वजों की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाने से इत्तर उनके हिस्से में कोई बड़ी उपलब्धि नहीं है। उन नेताओं को यह समझने की जरूरत है कि आज के बदलते भारत में उनका क्या योगदान है। वह किस तरह की आइडियोलॉजी पेश करते हैं और उनका विकास का मॉडल क्या हैं। क्योंकि सोशल मीडिया के दौर में अब कम्प्रिजन वाली बातें बहुत जल्द लोगों के बीच आ जाती है। किसका विकास मॉडल कितना अच्छा है यह जानने में अब ज्यादा वक्त नहीं लगता। लोगों में यह धारणा बहुत जल्द बन जाती है कि राष्ट्र और समाज के हित में बेहतर कौन होगा। विशेषतौर पर राजनीतिक पार्टियों के एजेंडे से ही यह तय हो जाता है कि सत्ता में आने के बाद वह पार्टी देश को किधर लेकर जायेगी।
इन सबके इत्तर कई ऐसे मुद्दे हैं जो दिखते नहीं है लेकिन वह लोगों की भावनाओंके करीब होते हैं। लेकिन राजनेता अपने हितों को साधने के दौरान जनता की भावनाओं से भी खिलवाड़ करने से बाज नहीं आते। चाहे वह धाार्मिक मुद्दा हो, सांस्कृतिक मुद्दा हो अथवा राष्ट्रवाद से जुड़ा मसला हो। कुछ राजनीतिक दल फ्रंट पर नहीं आकर तुष्टिकरण की राजनीतिक करते पाये जाते हैं। इसमें कांग्रेस पार्टी का नाम सबसे पहले लिया जा सकता है, जो तुष्टिकरण के चक्कर में आज हाशिये पर पहुंच गई है। देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस, जिसकी शाखायें देश भर में जड़े जमायी हुए थी और पूरे देश में कांग्रेस पार्टी का डंका बजता था। 6 दशक तक देश की तकदीर का फैसला करने वाली पार्टी आज अपने पार्टी के हित में भी निर्णय ले पाने में असमर्थ दिखती है।
पिछले दो लोकसभा चुनाव परिणामों में कांग्रेस अपने बूते विपक्ष में भी बैठने की हैसियत नहीं बना पायी। पिछली बार 44 सीटें और इस बार 52 सीटें कांग्रेस के हिस्से में आयी हैं। जबकि लोकसभा में प्रतिपक्ष का दर्जा पाने के लिए 55 सीटें जरूरी हैं। विचारणीय है कि कांग्रेस पार्टी हालात से भी कुछ सीखने को तैयार नहीं है। आज कांग्रेस पार्टी की हालत ऐसी क्यों हुई है इस पर पार्टी में आत्ममंथन चल रहा है। कई दशकों से तुष्टिकरण की राजनीति कांग्रेस के लिए अब मुसीबत बनती जा रही है। हालांकि कांग्रेस पार्टी ने उन दायरों से बाहर निकलने का प्रयास किया है। लेकिन जब वह लकीरों से हटकर चलने का प्रयास करती है तो, विरोधी कहने लगते हैं कि यह सिर्फ वोट पाने के लिए किया जा रहा है। कांग्रेस अपनी चाल और चरित्र नहीं बदल सकती।
कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी इस बार बीजेपी की तरह हिन्दुत्व को भूनाने का प्रयास किया लेकिन वह असफल रहे। इस परिणाम ने उन्हे सबक सिखा दिया कि एक वर्ग विशेष पर केन्द्रीत राजनीति उन्हें कितनी भारी पड़ी है। अब कांग्रेस पार्टी अपना चोला बदलने की तैयारी में है, लेकिन चाल और चरित्र कितने बदलेंगे इसके लिए इंतजार करना होगा।
लोकसभा चुनाव में करारी हार के बाद राहुल गांधी अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने पर अड़े हैं। उनका इस्तीफा स्वीकार नहीं किया गया है। सूत्र बताते हैं एक कार्यवाहक अध्यक्ष की तलाश जारी है। पिछले एक महीने से पार्टी नये चेहरे की तलाश कर रही है, लेकिन अब तक पार्टी को कोई नया चेहरा नहीं मिला है।
कांग्रेस पार्टी पर गांधी परिवार का एकाधिकार रहा है। इसलिए चेहरा भी ऐसा तलाशा जा रहा है कि जो पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह की तरह सोनिया-राहुल के आदेश का पालन करने वाला हो। मतलब स्वामीभक्ति की भावना उनमें जागृत होनी चाहिए। मतलब गांधी परिवार पर्दे के पीछे से पार्टी पर नियंत्रण चाहती है। पार्टी में शीर्ष नेताओं की लंबी फेहरिश्त है। लेकिन उन्हें सिर्फ पार्टी के लिए ही नहीं गांधी परिवार के प्रति भी निष्ठावान अध्यक्ष चाहिए।
बहरहाल, कांग्रेस में संपूर्ण बदलाव की कवायद जारी है। राज्य स्तर पर कई समितियां भंग कर दी गई है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल है कि क्या कांग्रेस खुद को बदलने को तैयार है। यह सिर्फ चेहरा बदलकर औपाचारिकता पूरी करनी है? क्या बदलते सियासी परिवेश में कांग्रेस खुद को ढालने को तैयार है? सच तो यही है कि बदलते भारतीय सामाजिक, राजनीतिक परिवेश में कांग्रेस को लिबरल का चोला ओढ़कर मलाई खाने की आदत छोडनी होगी। क्योंकि अब यह बातें किसी से छिपी नहीं है कि कांग्रेस तुष्टिकरण की राजनीति करने में, सेक्युलरवाद का चोला ओढ़ने में सबसे आगे रही है। उसी का नतीजा है कि आज कांग्रेस जमीनी स्तर पर सिमटती जा रही है।




