Monday, March 2, 2026
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येदियुरप्पा के लिए भी चुनौती बन सकते हैं बागी विधायक ?

कर्नाटक में कांग्रेस-जेडीएस की सरकार गिरने के बाद बीजेपी के वरिष्ठ नेता बीएस येदियुरप्पा ने चौथी बार मुख्यमंत्री की शपथ ली है। कर्नाटक में लम्बे समय से चल रहे इस सियासी नाटक का अब पटाक्षेप हो गया। सियासी रस्साकस्सी में अस्थिरता के दौर से गुजरता कर्नाटक को येदियुरप्पा कितनी स्थिरता दे पायेंगे यह तो वक्त ही बतायेगा, लेकिन इतना तो जरूर है कि बागी विधायकों को लेकर येदियुरप्पा भी चिंतित हैं। क्योंकि कई बागियों ने मंत्री पद की दावेदारी पेश की है।
बीजेपी ने सरकार तो वहां बना ली है लेकिन पार्टी के सामने चुनौतियां कम नहीं हैं। क्योंकि कर्नाटक बीजेपी में भी बागियों की भरमार हैं जो येदियुरप्पा के लिए चुनौती बन सकते हैं।

सूत्र बताते हैं कि कर्नाटक बीजेपी में 56 बीजेपी विधायक मंत्रीपद के दावेदार बताये जा रहे हैं। जबकि कर्नाटक में सीएम समेत 34 मंत्री ही बनाये जा सकते हैं। इस लिहाज से मंत्री पद की आस लिए उन विधायकों को निराशा हाथ लगेगी जो पाला बदलने में भी माहिर हैं। इस मामले में येदियुरप्पा किसी भी निर्णय ले पाने में असमर्थ दिख रहे हैं और वह अब दिल्ली दरबार के फैसले का इंतजार रहे हैं। येदियुरप्पा ने हाल ही में दिल्ली में भाजपा अध्यक्ष और केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह और केन्द्रीय मंत्री जेपी नड्डा से मुलाकात कर उन्हें कर्नाटक के हालातों से अवगत कराया है। मंत्री पद पाने के लिए बागी विधायकों से निपटने का सटीक फार्मूला अमित शाह ही निकाल सकते हैं।

उम्मीद है कि इस सप्ताह येदियुरप्पा कैबिनेट का आकार तय हो जायेगा। जेडीएस-कांग्रेस से बगावत करने वाले विधायकों की येदियुरप्पा की सरकार में क्या भूमिका होगी, यह भी अभी स्पष्ट नहीं हुआ है। बागी विधायकों के कारण कर्नाटक की सत्ता से कांग्रेस-जेडीएस सरकार को बाहर होना पड़ा है। हालांकि कांग्रेस-जेडीएस ने सरकार बचाने की भरपूर कोशिश की, लेकिन अंततः दोनों दल सरकार बचाने में नाकाम रहे। विधायकांें को बीजेपी से दूर रखने के लिए कांग्रेस-जेडीएस ने महंगे होटलों और रिसोर्ट में कई दिनों तक रखा ताकि उनके विधायक बीजेपी से नहीं मिल पा सकें। बागी विधायकों के बगावत से कुमारस्वामी की सरकार कमजोर होती चली गई और बीजेपी इस गठजोड़ सरकार पर हावी होती गई। येदियुरप्पा कुमार स्वामी की हर गतिविधि पर नजर रखे हुए थे। बागी विधायकों के कारण कई बार सरकार मुश्किल में आ गई और बीजेपी ने कुमार स्वामी को सदन में बहुमत साबित करने की चुनौती कर बार दी, लेकिन फ्लोर टेस्ट की तारीखें कई बार बदली गई।

कर्नाटक के बागी विधायकों का मसला अदालती संज्ञान में चला गया और बागी विधायकों पर अदालत का फैसला आना अभी बाकी है। वहीं बागी विधायकों ने भी कोर्ट में याचिका दायर की है कि उनकी आवाज भी सुनी जाये।
बहरहाल, कर्नाटक में बहुमत साबित कर पाने में कांग्रेस-जेडीएस की सरकार नाकाम रही। सरकार में पक्ष में 99 मत पड़े जबकि बीजेपी में पक्ष में 105 मत आये। कुमार स्वामी को शुरू से ही अंदेशा था कि यह सरकार ज्यादा दिन तक नहीं चल पायेगी। इसी कारण उन्होंने पिछले साल ही कहा था कि कर्नाटक की सरकार कभी भी गिर सकती है। जुगाड़ से बनी यह सरकार शुरूआती दौर से ही लड़खड़ाती दिख रही थी।

आंकड़ों के आधार पर बीजेपी कर्नाटक की सबसे बड़ी पार्टी हैं लेकिन अकेले बहुमत का आंकड़ा पूरा करने से थोड़ी पीछे रह गई थी। दूसरी ओर कांग्रेस-जेडीएस का गठजोड़ ही इसीलिए हुआ था कि बीजेपी को कर्नाटक की सत्ता से बाहर रखा जाये। इसलिए दोनों पार्टियों ने मिलकर कुमार स्वामी के नेतृत्व में सरकार बना ली। 224 विधानसभा सीटों वाला राज्य कर्नाटक में बीजेपी-105, कांग्रेस-78 जेडीएस-37, बसपा-1 और निर्दलीय को 2 सीटें हासिल हुई थी। 37 सीटें लाने वाले जेडीएस तीसरे नंबर पर थी, जिसे कांग्रेस ने बीजेपी को सत्ता से बाहर रखने के लिए कर्नाटक का ताज सौंप दिया था। लेकिन इस सियासी गठजोड़ की गांठ उतनी मजबूत नहीं रह पायी और सरकार गिरने का डर कुमार स्वामी के मन में हमेशा बना रहा। क्योंकि कुमार स्वामी को बागी विधायकों पर विश्वास नहीं रहा। इसी उधेड़बुन में कुमार स्वामी की सरकार उलझी रही और विपक्ष में बैठी बीजेपी सरकार पर हावी होती गई।

सूत्र बताते हैं कि कुमार स्वामी भी गठबंधन सरकार के विधायकों को विश्वास में लेने में असफल रहे। सत्ताधारी गठबंधन के 16 विधायकों के इस्तीफा दिये जाने के बाद कुमार स्वामी की सरकार पर संकट के बादल मंडराने लगे थे। कर्नाटक में यह सियासी नाटक पिछले कई महीनों में चल रहा था। सरकार को बचाने के लिए कांग्रेस हाईकमान को भी आगे आना पड़ा। कांग्रेस हाईकमान ने कई शीर्ष नेताओं को कर्नाटक दौरे पर भेजा और बागी विधायकों को मनाने की जिम्मेदारी सौंपी। 13 महीने पुरानी इस सरकार को बचाने की जुगत में विधायकों का खूब मान मनौव्वल हुआ। उन्हें महंगे रेस्टोरेंट में कई दिनों तक रखा गया। इतना ही नहीं कई राज्यों मे उन्हें सैर कराया गया। ताकि वह बीजेपी से दूर रह सके। लेकिन कुमार स्वामी की सरकार को इससे कोई फायदा नही हुआ। अब कुमार स्वामी बीजेपी को चाहे जितना कोस लें। लेकिन जब अपना ही सिक्का खोटा है तो दूसरों पर दोष मढ़ना ठीक नहीं है।

कर्नाटक का प्रसंग भारतीय राजनीति में कोई नया नहीं है। लेकिन लम्बे समय तक चले इस सियासी नाटक से कांग्रेस को सबक लेने की जरूरत है। क्योंकि जेडीएस एक क्षेत्रीय पार्टी है और सरकार गिर जाने से उसकी सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है। कुमार स्वामी की सरकार के गिरने से जेडीएस से कहीं ज्यादा बदनामी कांग्रेस की हुई है।
जब कांग्रेस का देश में स्वर्णिम दौर चल रहा था तो इस पार्टी की सत्ता लोलुपता के कारण भी कई राज्यों की चलती फिरती सरकारें गिरी हैं। आज जो कांग्रेसी नैतिकता की दुहाई देकर बीजेपी को कोस रहे हैं। उन्हें खुद से यह सवाल करनी चाहिए कि कांग्रेस पार्टी ने विरोधियों के साथ मिलकर किन-किन राज्यों में कब-कब सरकारें गिरायी है। जब झारखण्ड की बीजेपी नेतृत्व अर्जून मुंडा की चलती फिरती सरकार को कांग्रेस पार्टी ने विपक्षी दलों के साथ मिलकर गिरा दिया था और राजनीतिक नौसिखिया मधु कोड़ा को झारखण्ड का सीएम बना दिया था। ऐसे कई उदाहरण हैं, जिसमें कांग्रेस पार्टी की सत्ता लोलुपता के कारण देश एवं राज्यों की राजनीतिक अस्थिरता के दौर से गुजरी है।

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