चमकी बुखार नये-नये स्वरूप में बच्चों के लिए काल बनकर आता रहा है।
एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम (एईएस) नाम की बीमारी जिसे लोग चमकी बुखार कह रहे हैं, वह बिहार में नौनिहालों पर कहर बरपा रहा है। इस बुखार से अब तक 148 बच्चों की मौत हो चुकी है। पिछले 15 दिनों से इस बीमारी को लेकर बिहार में सियासत हो रही है। बिहार सरकार इसे पहले हल्के में लेती रही, लेकिन जब बच्चों की मौत के आंकड़े बढ़ने लगे तो राज्य सरकार आनन-फानन में चिकित्सा व्यवस्था को सुधारने में जुट गई। लेकिन इस बीमारी ने बिहार सरकार की पोल खोल दी है। बिहार में सुशासन सरकार के लिए दमघोटू साबित हो रही इस बीमारी के उपचार को लेकर सरकार आश्वासन देने की स्थिति में भी नहीं है।
जब बच्चों की मौत का आंकड़ा सौ से पार कर गया तो मीडिया की खबरों से अवगत होकर सरकारी मशीनरी बिहार की स्वास्थ्य सेवाओं की सुध लेने लगी। मुजफ्फरपुर का श्रीकृष्ण मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पीटल बिहार के सुशासन की पोल खोल रहा है। इस हॉस्पीटल में बीमार बच्चों को देखने के लिए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने दौरा किया, लेकिन हालात बदलते नहीं दिख रहे हैं। अस्पताल में बदइंतजामी ने सरकार को आलोचनाओं के घरे में ला दिया है। डॉक्टरों का कहना है कि आपात स्थितियों से निपटना पहली प्राथमिकता है। बेड की संख्या सीमित है और बीमार बच्चों की संख्या बढ़ती जा रही है। ऐसी स्थिति में हमें एक बेड पर दो-तीन बच्चों को एडजस्ट करना पड़ रहा है।
जबकि, बच्चों की मौत पर विपक्षी दल नीतीश सरकार को घेर रहे हैं। हालांकि नीतीश सरकार के मंत्रियों का कहना है कि चिकित्सा सुविधा हर स्तर पर मुहैया करायी जा रही है। लेकिन जब मीडिया ने हॉस्पीटल के अंदर के हालातों को दिखाया तो नीतीश सरकार के सुशासन की पोल खुल गई है। सरकार के मंत्री अपनी दलील दे रहे हैं लेकिन हालात कुछ और बयां कर रहे हैं।
बिहार में अब तक 148 नौनिहालों को चमकी बुखार लील गया और हम विकसित भारत का तमगा पाने के लिए एड़ी चोट एक कर रहे हैं। हम कई मामलों में पड़ोसी देशों से भी नीचले पायदान पर हैं, जिसमें स्वास्थ्य भी एक बड़ा मसला है।
फिलहाल, मुजफ्फरपुर का श्रीकृष्ण मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पीटल बदइंतजामी के कारण चर्चा में है। लेकिन सिर्फ मुजफ्फरपुर का हॉस्पीटल ही क्यों ? अब तो सरकार को उन सभी अस्पतालों की भी खबर लेनी चाहिए जहां स्वास्थ्य विभाग की लापरवाही के कारण मरीजों को जरूरी संसाधनों के अभाव में मूलभुत चिकित्सा सुविधा उपलब्ध नहीं हो पाते।
चमकी बुखार की वजह नहीं पता चल सका है। इसके लिए केन्द्र सरकार ने चिकित्सा विशेषज्ञों की टीम गठित करने का फैसला किया है। इस तरह की बीमारी हर साल बच्चो को लील जाती हैं। कई राज्यों में इस तरह की घटनायें घटती रही है। लेकिन जिन-जिन राज्यों में कुपोषण, गरीबी, अशिक्षा और प्रदूषण के मामले ज्यादा पाये जाते हैं उन राज्यों में चमकी जैसा बुखार नये-नये स्वरूप में हमेशा बच्चों के लिए काल बनकर आता रहा है। यह अवाम से जुड़ा मुद्दा है और इसपर राष्ट्रीय स्तर पर केन्द्र सरकार को भी पहल करने की जरूरत है। लेकिन सरकार तब जागती है जब हालात नियंत्रण से बाहर हो जाते हैं।
जबकि जिन-जिन बीमारियों से आमजन प्रभावित होते हैं उन बीमारियों के उपचार की पूरी व्यवस्था कई सरकारी अस्पतालो में नहीं है। बिहार में सरकारें बदलती रही हैं लेकिन स्वास्थ्य विभाग आज भी जर्जर हालात में है। कहीं सर्जरी की व्यवस्था नहीं है तो कहीं ऑक्सीजन सहित कई चिकित्सकीय संसाधनों की कमी मरीजों को निजी अस्पतालों में जाने पर मजबूर कर देती है। जिला स्तर के अस्पतालों में भी जरूरी संसाधनो के अभाव दिखते हैं। इमरजेंसी में उन अस्पतालों के डॉक्टर मरीज को बड़े अस्पतालों में रेफर कर देते हैं। जबकि, आर्थिक तौर पर सक्षम परिजन अपने मरीज को लेकर निजी अस्पतालों में चले जाते हैं।
कई बार तो मरीज की मौत इस वजह से भी हो जाती है कि डॉक्टरों को यह समझ पाने में काफी देर लग जाती है कि मरीज को हुआ क्या है। तकनीकी विकास के दौर में भी कई अस्पतालों में चिकित्सा जांच प्रणाली के परम्परागत तरीके मरीजों के लिए घातक साबित हो रहे हैं। कई घंटे के बाद जांच रिपोर्ट मिलने पर डॉक्टर इलाज शुरू करते हैं, जिससे मरीज के शरीर में रोग विकराल रूप धारण कर लेता है।
सरकार की जिम्मेदारी सिर्फ अस्पताल खोलने और डॉक्टरों को बहाल करने के बाद खत्म नहीं हो जाती। सरकार को यह भी देखने की जरूरत है उन अस्पतालों में किन-किन सुविधाओं के अभाव हैं।
कुछ मरीज बड़े सरकारी अस्पतालों में इलाज कराने इसलिए जाते हैं क्योंकि जिला स्तर के अस्पतालों की व्यवस्था पर उन्हें भरोसा नहीं है। अन्य राज्यों की सरकारों को भी उन सभी अस्पतालों का मुआयना करना चाहिए, जहां भारी-भरकम सरकारी खर्च के बावजूद वहां मरीजों का इलाज किया जाना सिर्फ खानापूर्ति है और आपातकालीन स्थितियों से निपटने में अक्षम है।




