Monday, March 2, 2026
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बारिश ने खोल दी सुशासन की पोल

सरकार की कितनी योजनाएं साकार रूप लेती है यह विपरित हालातों में ही पता चलता है। महज 5-6 दिन की बारिश से उपजे हालातों से निपटने के लिए सरकार के पास कोई ठोस समाधान नहीं हैं। बिहार सरकार की महत्वाकांक्षी नल-जल योजना को इस बारिश ने बहा दिया। या यूं कहें कि इस आपदा ने बिहार सरकार के सुशासन की पोल खोल दी।

लौटता मानसून बिहार सरकार के सामने कई सवालों को छोड़कर जायेगा

सितम्बर के आखिरी सप्ताह में बिहार, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में बारिश ने कहर ढा दिया। बिहार की बात करें तो राज्य के लगभग 15 जिलों में चार दिनों की बारिश ने ऐसा तांडव मचाया कि लोगों का जीना मुहाल हो गया है। इस बारिश में पटना का अस्सी प्रतिशत भाग जलमग्न हो गया है। स्कूल, कॉलेज, अस्पताल, बस स्टैंड….सभी जगहों पर पानी भर चुका है। कुछ जगहों पर छह से आठ फीट तक पानी है, तो कुछ इलाके में मकान के ग्राउंड फ्लोर पानी भर गया है। जिन घरों में पानी भर गया है वहां के लोगों को एनडीआरएफ और एसडीआरएफ की टीम रेस्क्यू कर घरों से निकाल रही है।

पटना के एनएमसीएच के ग्राउंड फ्लोर में पानी भर गया है। वहां हॉस्टल में रहने वाली कुछ छात्राओं को रेस्क्यू घर सुरक्षित स्थानों पर भेजा गया है। उस छात्रावास में कई राज्यों की छात्राएं रह रही हैं और मेडिकल की पढ़ाई कर रही हैं। ग्राउंड फ्लोर में रहने वाली छात्राओं को उपर के कमरे में रहने वाली अन्य छात्राओं के साथ शिफ्ट किया गया है।

पटना में सड़कों पर नाव और मोटरबोट चल रहे हैं। पटना के लोगों को 1975 के बाद ऐसा मंजर देखने को मिला है। कंकड़बाग, पाटलीपुत्रा, राजेन्द्र नगर, डाकबंगला, फ्रेजर रोड, एक्जीविशन रोड, आर ब्लॉक, बाकरगंज, गर्दनीबाग, गुलजारबाग, बोरिंग रोड, बेली रोड, कृष्ण नगर सहित कई महत्वपूर्ण इलाकों में पानी भर गया है। यह सभी पटना के कॉमर्शियल जोन हैं।

राजधानी के वीवीआईपी इलाकों में भी पानी के भयावह दृश्य सरकार से कुछ सवाल कर रहे हैं। उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी को उनके बंगले से तीन बाद रेस्क्यू कर बाहर निकाला गया है। नेताओं और अधिकारियों के घरों और बंगलों में भी पानी भर गया है। जब सरकार के सामने ऐसी परिस्थितियां आ गई है तो पानी से भरे सुदूर इलाकों मे आम आदमी किस मुश्किल हालात में जी रहा है, उसका अंदाजा आप खुद लगा सकते हैं। शासन-प्रशासन और आवाम मुकदर्शक बनकर इस विभीषिका को देख रहा है। एहतियात बरतते हुए सरकार ने स्कूल, कॉलेज बंद करवा दिये।

यह बरसात का आखिरी चरण है लेकिन बिहार सरकार के सामने कई सवालों को छोड़कर जायेगा। प्राकृतिक आपदा के आगे कोई कुछ नहीं कर सकता, यह तो हर कोई जानता है। लेकिन महज तीन-चार दिनों की बारिश में पटना का जो हाल हुआ है, उसे सिर्फ प्राकृतिक आपदा कहना उचित नहीं है। बिहार सरकार इसे प्राकृतिक आपदा बता रही है लेकिन बीजेपी के सांसद गिरिराज सिंह ने इसे बिहार सरकार की नाकामी का परिणाम बताया है। गिरिराज सिंह का कहना है कि बिहार सरकार इसे प्राकृतिक आपदा कहकर अपनी जिम्मेदारियों से बचना चाहती है।

विपक्षी दल इस आपदा में भी सरकार को घेरने के लिए मौके तलाश रहा है। लेकिन विपक्ष के नेताओं को यह समझने की जरूरत है कि जब बिहार में आपका शासन रहा तब आपने ऐसी आपदा से निपटने के लिया क्या किया ? यह जवाबदेही तो सभी के उपर है कि आज पटना का अस्सी फीसदी इलाका पानी में कैसे डूबा है। सरकार के पास कोई जवाब नहीं है कि हालात कब सामान्य होंगे। बारिश का पानी शहर से बाहर कब तक निकल जायेगा, इसके भी ठोस जवाब सरकार के पास नहीं है।

सरकार की कितनी योजनाएं साकार रूप लेती है यह विपरित हालातों में ही पता चलता है। महज 5-6 दिन की बारिश से उपजे हालातों से निपटने के लिए बिहार सरकार के पास कोई ठोस समाधान नहीं हैं। बिहार सरकार की महत्वाकांक्षी नल-जल योजना को इस बारिश ने बहा दिया। या यूं कहें कि इस आपदा ने बिहार सरकार के सुशासन की पोल खोल दी।

सूत्र बताते हैं कि जिन-जिन इलाकों में पानी भर गया है, वहां कई दिनों से वाटर सप्लाई बंद है। क्योंकि वाटर सप्लाई के लिए चालू किया जाने वाला मोटर पानी में डूबा हुआ है। सप्लाई लाइन बंद रहने से बिहार के कई जिलों में लोगों को पीने के पानी की किल्लतों का सामना करना पड़ रहा है।  ऐसी हालातें कब तक रहेंगी इसका कोई ठोस अनुमान नहीं है। जब तक बारिश का पानी वहां से नहीं निकाला जायेगा तब तक वाटर सप्लाई का मोटर चालू नहीं हो सकता। जिला प्रशासन भी कुछ कर पाने में असमर्थ दिख रहा है।

विपक्ष ने इस आपदा के लिए बिहार सरकार को जिम्मेदार ठहराया है । विपक्ष का कहना है कि बरसात से पहले संपूर्ण पटना में नालों की सफाई पूरी तरह से नहीं हो पायी है। सरकार को यह अनुमान नहीं था कि पटना को कभी इस हाल से भी गुजरना पड़ेगा। स्मार्ट सिटी बनने की राह पर पटना में 3-4 दिनों की बारिश में अगर ऐसे हालात देखने को मिलें तो कैसे कह सकते हैं कि हम विकास की राह पर अग्रसर हैं।

बड़ी-बड़ी इमारतें, कॉमर्शियल कॉम्प्लेक्स, चौड़ी सड़कें, फ्लाई ओवर, हाइवे… से पटना एक विकसित शहर के रूप में पहचान बना लिया है। लेकिन कंक्रीट सिटी में तब्दील होते पटना में इस बारिश ने बुनियादी खामियों को उजागर कर दिया है। पिछले एक हफ्ते से हो रही बारिश से जिंदगी ठप हो चुकी है। बारिश और बाढ़ से जुड़े हादसों की संख्या बढ़ती जा रही है। हजारों लोग सुरक्षित स्थानों की तलाश में है लेकिन उन्हें हर जगह पानी ही पानी दिख रहा है। अस्पतालों में पानी भर गया है। मरीजों के बेड डूब चुके हैं। पटना में लोग अपने-अपने घरों में कैद हैं।

पटना से साठ-सत्तर किलोमीटर दूर अन्य जिलों अथवा गांवों में बसे लोग राजधानी में प्रतिदिन लाखों की संख्या में आजीविका के लिए आते हैं। कुछ दुकानदार हैं तो कुछ नौकरीपेशा वाले। जबकि कुुछ फूटपाथ, रेहड़ी अथवा रोजमर्रा की जिंदगी जीने वाले हैं। लेकिन इस भयावह जल त्रासदी नेे उन सभी को घर बैठा दिया। बारिश रूक भी गई तो वहां हालात सामान्य होने में वक्त लगेंगे।

देश में दशहरा एवं दिवाली की तैयारियां जोर-शोर से चल रही है। लेकिन कुछ लोगों पर कुदरत ने बारिश के रूप में कहर बरपा दिया है। उनके लिए क्या दशहरा, क्या दिवाली। वह तो इस विकट परिस्थिति से निकलने के लिए जद्दोजहद कर रहे हैं।

राजधानी की सड़कों पर सात से आठ फीट तक पानी जमा होना हैरान इसलिए करता है कि पटना गंगा के किनारे बसा है, लेकिन गंगा नदी के उफान से शहर में पानी नहीं भरा है। पटना के नालों की अच्छी तरह से सफाई नहीं होने की वजह से शहर की यह दुर्दशा हुई है। बिहार की पहचान कहलाने वाला पटना आज अपनी बेबसी पर रो रहा है और इस सैलाब को देखकर कह रहा है कि, इस शहर की दुर्दशा के लिए सत्ता और नौकरशाही की सांठ-गांठ जिम्मेदार है।

 

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