उत्तराखण्ड के आईजी संजय गुंज्याल ने एक सोच विकसित की
उत्तराखण्ड के आईजी संजय गुंज्याल ने एक सार्थक पहल की है। उन्होंने एक स्ट्रीट डॉग को ट्रेनिंग दिलवायी है। उनका मानना है कि स्ट्रीट डॉग को अगर बेहतर ट्रेनिंग दी जाये तो वह भी सुरक्षा प्रहरी में अहम भूमिका निभा सकते हैं। आम तौर पर देखा जाये तो अंग्रेजी काल से लेकर अब तक भारत में विभिन्न सुरक्षा विभाग में विलायती नस्ल के कुत्तों को ही प्राथमिकता दी जाती रही है। जिनमें लैब्राडोर, जर्मन सेफर्ड सहित कई विलायती नस्ल के कुत्तों शामिल किये जाते हैं।
इन विदेशी नस्ल के कुत्तों का प्रशिक्षण, रख-रखाव एवं खान-पान पर सरकार को काफी खर्च करना पड़ता है। फिर भी एक ऐसी सोच बनी हुई है कि स्ट्रीट डॉग के मुकाबले विदेशी नस्ल के कुत्ते ज्यादा मजबूत और समझदार होते हैं। आर्मी एवं पुलिस विभाग में विदेशी नस्ल के कुत्तों को ट्रेनिंग देने के लिए विशेष व्यवस्था की जाती रही है। लेकिन आज तक कभी स्ट्रीट डॉग को ट्रेनिंग देने के बारे में किसी ने भी नहीं सोचा था। स्ट्रीट डॉग की विशेषता यह है कि उन्हें किसी भी पर्यावरण और परिवेश में ढाला जा सकता है और वह कुछ भी खा लेते हैं। जबकि जिन कुत्तों को विदेश से लाया जाता है उन्हें खाने से लेकर रहने तक के लिए काफी ध्यान देना पड़ता है। उनमें कुछ ऐसे होते हैं जिन्हें सामान्य परिवेश में रखना आसान नहीं होता है। अत्यधिक गर्मी एवं अत्यधिक ठंढ में उन्हें विशेष रखरखाव की जरूरत होती है। लेकिन स्ट्रीट डॉग खुद को सभी मौसम एवं तापमान में ढालने में सक्षम होते हैं।
आईजी संजय गुंज्याल ने एक अभिनव पहल करते हुए विदेशी डॉग्स के साथ ही एक स्ट्रीट डॉग को प्रशिक्षण दिये जाने पर विचार किया। जिनमे किसी साक्ष्य के तहत अपराधी तक पहुंचना, बम की खोज करना….हाई जम्प, लॉंग जम्प, इत्यादि प्रशिक्षण दिये गये। प्रशिक्षण के बाद पाया गया कि उक्त स्ट्रीट डॉग विदेशी नस्ल के डॉग से कमतर नहीं है। तीन महीने की प्रशिक्षण के बाद उसके उत्साहजनक परिणामों से संतुष्ट होकर उत्तराखण्ड के डॉग स्क्वायड में उसे भर्ती कर लिया गया है। आईजी संजय गुंज्याल ने एक नयी सोच विकसित की है जो सराहनीय है। देश एवं अन्य राज्यों में भी इसपर पहल की जानी चाहिए। देश में विदेशी नस्ल के कुत्तों को ही रक्षा एवं पुलिस विभाग में शामिल करने का जो ट्रेंड अर्से से चला आ रहा है उसपर विचार करने की जरूरत है।
समाज में लोगों का कुत्तों से आत्मीय लगाव है। कुत्ते अपने मालिक के प्रति वफादार भी होते हैं। स्ट्रीट डॉग बिना प्रशिक्षण के ही अंजान चेहरे को देखकर भौंकने लगते हैंं क्योंकि उन्हें आभास होता है कि वह आस-पास का नहीं है। ऐसे में स्ट्रीट डॉग को बेहतर प्रशिक्षण की व्यवस्था की जाये तो यह समाज के भी हित में होगा। समाज के धनाढ्य एवं कद्रदान लोग विदेशी नस्ल के कुत्तों की जगह प्रशिक्षित स्ट्रीट डॉग को भी अपने घरोें में रख सकते हैं।





