हैदराबाद में एक महिला डॉक्टर की सामूहिक गैंगरेप के बाद दुष्कर्मियों ने उसे जलाकर मार डाला। इस मामले में पुलिस ने चारो आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया है। आरोपियों ने जुर्म भी कबूल कर लिया है। इस वीभत्स घटना के बाद देशभर में उबाल है। दुष्कर्मियों को सख्त से सख्त सजा दिलाने के लिए लोग सड़कों पर उतर चुके हैं और सिस्टम के प्रति गुस्सा जाहिर कर रहे हैं। लोगों को गुस्सा करना जायज है।
इन घटनाओं से महिलाओं में असुरक्षा की भावना बढ़ रही है। माता-पिता और अभिभावक इन लोमहर्षक वारदातों को देखकर अपनी बेटियों को ज्यादा देर तक बाहर नहीं रहने एवं अनजान लोगों से बात नहीं करने की हिदायत दे रहे हैं। लेकिन यह समस्या का समाधान नहीं है। ऐसे में तो अपराधियों का मनोबल और बढ़ जायेगा और वह बेखौफ होकर इस तरह के वारदातों का अंजाम देते रहेंगे। क्योंकि उन अपराधियों में सिस्टम का डर खत्म हो गया है।
इस तरह के जघन्य अपराधोें में शामिल लोगों के खिलाफ अदालती कारवाई इतनी मंद गति से चलती है कि अपराधी कोई न कोई जुगाड़ कर बचने से रास्ता निकाल लेते हैं। चाहे वह राजनीति के माध्यम से हो, अदालत के माध्यम से हो या पुलिस-प्रशासनिक सिस्टम के माध्यम से।
हैदराबाद गैंगरेप कांड की गूंज ससद में भी सुनी गई। पक्ष एवं विपक्ष के सभी सांसदों ने बलात्कारियों को सख्त से सख्त सजा देने की मांग की है। जिसपर केन्द्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने सभी संसद सदस्यों की सहमति से सख्त कानून बनाने का वायदा किया है। लेकिन सवाल जस के तस हैं।
यौन उत्पीड़न, रेप, गैंगरेप और इसी तरह के अन्य अपराध में सजायाफ्ता कैदियों को लेकर कानून बनने के बाद भी उसके अनुपालन में खामियां साफ झलकती है। बीते कुछ दिनों में देश के कई हिस्सों में बलात्कार एवं यौन अपराधों से जुड़ी की कई घटनाएं घटी हैं। इस तरह के अपराध रूक नहीं रहे हैं। लेकिन जिस दिन सरकार चाह लेगी इस तरह के अपराध करने से पहले उसके अंजाम के बारे में वैसे लोग सौ बार सोचेंगे। शासन-प्रशासन की लापरवाही का फायदा अपराधी उठा रहे हैं। कानून बनने के बाद भी अपराधियों में खौफ नहीं है। क्योंकि सख्त काननू के तहत उन्हें त्वरित सजा नहीं दी जा रही है। ऐसे मामले कई सालों तक अदालतों के चक्कर काटते हैं।
इन अपराधों में अगर किसी को फांसी की सजा हो भी जाती है तो देश में फांसी देने की प्रक्रिया काफी लम्बी है। अपराधी को फांसी की सजा मिलने के बाद उसके मानवाधिकार का हवाला देकर राष्ट्रपति से क्षमा की अपील की जाती है। अपराधी की क्षमा याचना की फाइल जेल, गृह मंत्रालय और राष्ट्रपति भवन के बीच कई सालों तक घूमते रहती है। सजा में देरी की वजह से भी इस तरह के अपराधों में वृद्धि हो रही है। नाबालिग एवं महिलाओं के साथ यौन उत्पीड़न के मामलों में देश भर में न जाने कितने रसूखदार जेल के अंदर हैं लेकिन उनकी खातिरदारी में कोई कमी नहीं है। इन रसूखदारों का कोई न कोई उपर तक पहुंच वाला निकल जाता ही है। रसूखदारों की जांच की गति धीमी पड़ जाने का फायदा अन्य अपराधियों को भी मिलता है।
हत्या, बलात्कार एवं संगीन अपराधों में शामिल कई ऐसे लोग हैं जो सदन की शोभा बढ़ा रहे हैं। इसलिए सवाल यह उठता है कि हम किससे उम्मीद पाल रहे हैं। 2012 के निर्भया कांड ने देश को हिलाकर रख दिया था। सुप्रीम कोर्ट से अपराधियों को फांसी की सजा मुकर्रर कर दी गई, लेेकिन अब तक उन्हें फांसी नहीं दी गई है। हैदराबाद की घटना ने दिल्ली की निर्भया कांड को ताजा कर दिया। लोग सरकार से पूछ रहे हैं कि निर्भया के आरोपियों को फांसी देने में देरी की क्या वजह है। महिलाओं के साथ बढ़ते यौनाचार, बलात्कार एवं हत्या को लेकर अब देश उबल रहा है और सरकार को इसपर गंभीरता से सोचने की जरूरत है। ऐसे अपराधियों को त्वरित सजा देने की मांग की जा रही है। अगर निर्भया के आरोपियों को जल्द फांसी दी जाती तो अपराधियों में भय जरूर कायम होता।
मीडिया चैनलों में हो रही डिबेट एवं सड़कों पर हो रहे प्रदर्शन में आक्रोशित लोग सरकार से सवाल कर रहे हैं कि और कितनी निर्भया के बाद सरकार जागेगी। सिर्फ सख्त कानून बना देने से महिलाओं के खिलाफ दुराचार कम नहीं होने वाला है। जब तक कानूनों का सख्ती से अनुपालन नहीं किया जायेगा तब तक वैसे लोगों में भय नहीं बनेगा और वह कानून की धज्जियां उड़ाकर ऐसे घृणित कृत्यों का अंजाम देते रहेंगे।




