नफरत और हिंसा की आग में जल रहा पूरा देश
सिटिजन अमेंडमेंट बिल अब सिटिजन अमेंडमेंट एक्ट बन चुका है। संसद के दोनों सदनों लोकसभा और राज्यसभा में इसे बहुमत से पारित किया गया है। राष्ट्रपति ने कानून बनाने की मंजूरी भी दे दी। केन्द्र सरकार का कहना है कि यह कानून पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश में धार्मिक रूप से प्रताड़ित अल्पसंख्यकों के लिए है। भारत में निवास करने वाले अल्पसंख्यक विशेषकर मुस्लिम समुदाय को इससे कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है। बीजेपी के प्रवक्ताओं के द्वारा भी कई बार मीडिया चैनलों में इसपर स्पष्टीकरण दिये गये और अब भी दिये जा रहे हैं। लेकिन देश के मुस्लिम समुदाय में भ्रम की स्थिति अब भी बनी हुई है। विपक्षी दलों के नेता इस कानून को लेकर शुरू से ही खिलाफ हैं और अब अपने-अपने तरीके से सियासी रोटियां सेंकने में जुट गये हैं। कई विपक्षी नेताओं के बयान ने इस आंदोलन में आग में घी का काम किया है।
सीएए के खिलाफ विपक्ष के द्वारा देशव्यापी विरोध प्रदर्शन हिंसक रूप ले चुका है। बिहार, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, असम, पश्चिम बंगाल सहित कई राज्यों के विरोध प्रदर्शन में सरकारी संपत्तियों का जितना नुकसान हुआ है उसका सटीक आकलन किया जाना अभी बाकी है। क्योंकि प्रशासन की तमाम कोशिशों के बावजूद सीएए के विरोध के नाम पर प्रदर्शनकारी सरकारी संपत्तियों को अब भी नुकसान पहुंचा रहें हैं। जबकि कुछ राज्यों की सरकारें मूक दर्शक बनकर इस बर्बादी में भी अपना सियासी हित देख रही है और विरोध प्रदर्शन के नाम पर सड़कों पर फैली अराजकता का ठीकरा केन्द्र सरकार पर फोड़ रही है।
राजनीतिक पार्टियां बारी-बारी से देश एवं राज्य बंद का एलान कर रही है। कुछ पार्टियों ने बंद करवा दिया है। जबकि कुछ पार्टियां सड़कों पर उतरने से पहले ठोस रणनीति बना रही है। बीजेपी से शिकस्त खायी पार्टियां सीएए और एनआरसी के खिलाफ हो रहे विरोध प्रदर्शन को संजीवनी के रूप में देख रही है। कांग्रेस, लेफ्ट, तृणमूल, राजद, सपा, बसपा, सहित कई विपक्षी पार्टियां आगामी चुनाव के मद्देनजर अपनी सियासी जमीन तैयार करने में जुट गई है। हैरानी की बात है कि विरोध प्रदर्शन के दौरान हिंसा एवं आगजनी को भी कुछ विरोधी नेता सही ठहरा रहें हैं और इसे प्रशासन की विफलता बता रहे हैं। इस बार विपक्षी पार्टियां ने युवाओं को ढाल बना लिया है।
दिल्ली में सीएए के विरोध के दौरान प्रदर्शनकारियों ने दिल्ली पुलिस को दौड़ा-दौड़ाकर पीटा है जो काफी शर्मनाक है।विरोध प्रदर्शन के नाम पर हिंसा और उपद्रव की जो तस्वीरें सामने आई है उससे दिल्ली की सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े हो रहे हैं। जब दिल्ली में ये हाल है तो अंदाज लगा सकते हैं कि अन्य राज्यों में विरोध का कैसा आलम होगा।
प्रदर्शनकारियों ने रेलवे की संपत्ति को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया है। कई राज्यों में रेल की पटरियां उखाड़ दी गई, प्लेटफार्म छतिग्रस्त कर दिये गये, स्टेशन के कई आफिसों को आग के हवाले कर दिया गया। विरोध के नाम पर जो अराजकता का माहौल बना है उससे निपटना राज्य एवं केन्द्र सरकार की सबसे बड़ी चुनौती है।
इस अराजकता पर राज्य की सरकारें केन्द्र सराकर को जिम्मेदार ठहरा रही है। जबकि केन्द्र सरकार का कहना है कि राज्य सरकारें अपना सियासी नफा नुकसान देखकर कदम उठा रही है जिससे माहौल और बिगड़ रहा है।
केन्द्र सरकार का स्पष्ट तौर पर कहना है कि विपक्षी पार्टियों ने मुसलमानों के बीच डर और भय का माहौल बना दिया गया है कि सीएए के कारण उनकी नागरिकता छिन जायेगी। जबकि यह कानून भारतीय मुसलमानों के लिए नहीं बल्कि पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान में धार्मिक रूप से प्रताड़ित अल्पसंख्यकों के लिए है।
इस कानून में इन तीन देशों के मुसलमानों को क्यों अलग रखा गया? इसपर सरकार का तर्क है कि पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश इस्लामिक राष्ट्र है इसलिए वहां मुसलमानों का धार्मिक उत्पीड़न नहीं हो सकता। इन देशों में मुसलमानों का धार्मिक अधिकार नहीं छीना जा सकता है। लेकिन भारत के मुसलमानों में यह माइंडसेट कर दिया गया है कि सीएए से उनकी नागरिकता छिन जायेगी और उन्हें भारत छोड़ना पड़ सकता है। अगर भारत नहीं छोड़ सकते तो उन्हें डिटेंशन कैंप में भेज दिया जायेगा।
इस अफवाह को इतना तूल दे दिया गया कि देशभर के मुसलमान सड़कों पर आ गये। जामिया, अलीगढ़ यूनिवर्सिटी सहित देश के कई शैक्षणिक संस्थानों में पढ़ने वाले छात्र लगातार सड़कों पर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। अब यह विरोध प्रदर्शन हिंसा और उन्माद में बदल गया है।
लेकिन यह भी स्पष्ट रूप से दिख रहा है कि इस विरोध प्रदर्शन को सियासी चासनी में लपेट दिया गया है और विपक्षी पार्टियों का भरपूर समर्थन मिल रहा है। लोकसभा चुनाव परिणाम के बाद हाशिये पर जा पहुंची पार्टियां इस आंदोलन में अपना भविष्य तलाशती दिख रही है।





