
बिहार में अपराध को नियंत्रित कर नीतीश कुमार ने एक भरोसेमंद मुख्यमंत्री की छवि बनायी है। जबकि सुशासन के बल पर उन्होंने बिहार में विकास की एक नई लकीर खीची है जो शोध और विश्लेषण का विषय है। नीतीश कुमार के सात निश्चय से जुड़ी योजनाओं के क्रियान्वयन में पूरा सरकारी अमला जुटा हुआ है। नीतीश सरकार का विकास कार्य जमीन पर दिखता है। बिजली, पानी, सड़क, नाली, गली, घर, महिला अधिकार, आरक्षित रोजगार, शिक्षा… के क्षेत्र में नीतीश सरकार द्वारा किये गये कार्य से बिहार का स्वरूप बदला है। हालांकि नीतीश सरकार कई मोर्चे पर विफल रही है। फिर भी मौजूदा हालात में सीएम उम्मीदवार को लेकर नीतीश की तुलना में विपक्ष का एक भी नेता नहीं है। विपक्षी दलों के पास जितने भी खास चेहरे हैं वह सीएम उम्मीदवार के लिए उपयुक्त नहीं है, जनता उनपर विश्वास नहीं करेगी।
बिहार में राष्ट्रीय जनता दल ने पंद्रह साल (1990-2005) शासन किया था और नीतीश कुमार की अगुवाई में एनडीए का भी 15 साल का कार्यकाल पूरा होने जा रहा है। मौजूदा कार्यकाल नीतीश कुमार को पिछले दो टर्म से कहीं ज्यादा खट्टा-मीठा अनुभव दिया है। बिना सहयोगी के सरकार नहीं चला पाने की मजबूरी में नीतीश कुमार कभी राजद के साथ तो कभी बीजेपी के साथ हिचकोले खाते दिखे। कुछ समय के लिए ही सही लेकिन राजद का साथ लेकर नीतीश कुमार ने अपने खासमखास को भी विरोधी बना दिया था। विचारों की एकरूपता और एकरंगता जब मेल नहीं खाती है तो सत्ता में किसी पार्टी का बने रहना मुश्किल हो जाता है।
बिहार में एनडीए के मौजूदा कार्यकाल के अब कुछ दिन ही शेष बचे हैं। इसलिए नीतीश सरकार द्वारा योजनाओं के क्रियान्वयन में तेजी देखी जा रही है। ताबड़तोड़ फैसले लिये जा रहे हैं। बिहार में लालू-राबड़ी और नीतीश कुमार के 15-15 साल के कार्यकाल का मूल्यांकन किया जाये तो नीतीश कुमार का पलड़ा भारी नजर आता है। हालांकि नीतीश सरकार कई मोर्चे पर विफल रही है फिर भी मौजूदा हालात में सीएम उम्मीदवार को लेकर नीतीश की तुलना में विपक्ष का एक भी नेता नहीं है।
बिहार में अपराध को नियंत्रित कर नीतीश कुमार ने एक भरोसेमंद मुख्यमंत्री की छवि बनायी है। जबकि सुशासन के बल पर उन्होंने बिहार में विकास की एक नई लकीर खीची है जो शोध और विश्लेषण का विषय है। नीतीश सरकार का विकास कार्य जमीन पर दिखता है। बिजली, पानी, सड़क, नाली, गली, घर, महिला अधिकार, आरक्षित रोजगार, शिक्षा… के क्षेत्र में नीतीश सरकार द्वारा किये गये कार्य से बिहार का स्वरूप बदला है। नीतीश कुमार के सात निश्चय से जुड़ी योजनाओं के क्रियान्वयन में पूरा सरकारी अमला जुटा हुआ है। शहर से लेकर गांव-गांव तक नीतीश कुमार के द्वारा किये गये विकास कार्यो का मूल्यांकन भी किया जा रहा है।
बिहार में भाजपा की ओर से डिप्टी सीएम बने सुशील कुमार मोदी के साथ मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की टयूनिंग शुरू से ही अच्छी रही है। बिहार के हितों के लिए सरकार द्वारा लिए गये फैसले में दोनों की आम सहमति रहती है। दोनों ने कभी भी अहम और हितों के टकराव को आगे नहीं आने दिया।
कई चैनलों एवं सर्वे करने वाली निजी संस्थानों द्वारा मूल्यांकन और तुलनात्मक विश्लेषण कराये जा रहे हैं कि 2005 से पहले अर्थात लालू-राबड़ी के राज में बिहार में विकास की जमीनी हकीकत क्या थी और वर्तमान में क्या है। अगर इसका निष्पक्ष मूल्यांकन करेंगे तो आप नीतीश सरकार को लालू-राबड़ी सरकार से हर मोर्चे पर बेहतर पायेंगे।
दोनों दलों के शासनकाल के अंतराल में बिहार में एक पीढ़ी जवान ही नहीं बल्कि मैच्योर हो गई है और वह अपराध मुक्त बिहार चाहती है। नीतीश सरकार में बिहार में शैक्षणिक माहौल में सुधार हुआ है। बिहार का युवा वर्ग अपने कैरियर के प्रति गंभीर है और राज्य सरकार ने नौकरी के अवसर भी प्रदान किये हैं। लड़कियों में शिक्षा के प्रति जागरूकता बढ़ी है और सुबह-सुबह लड़कियों को साइकिल चलाकर स्कूल और कोचिंग जाते हुए देखा जा सकता है। बिहार में ऐसा माहौल 15 साल पहले नहीं था।
बिहार में एक दौर वह भी था कि अभिभावक अपनी लड़कियों को अकेले बाजार अथवा स्कूल-कॉलेज भेजने से डरते थे लेकिन आज की परिस्थतियां बदली हुई है। नीतीश सरकार पर आरोप लगाने वाले लोगों को यह सोचने की जरूरत है कि 2005 से पहले और आज के बिहार में कितना अंतर है।
बिहार की राजधानी पटना एजुकेशनल हब बनता जा रहा है। सिविल सर्विस एवं उच्च स्तरीय प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारियों के लिए बिहार के युवा दिल्ली और बंगलुरू के साथ-साथ पटना भी को तरजीह देने लगे हैं। ऐसा इसलिए हुआ कि बिहार में कानून का शासन है। नीतीश सरकार ने अपराध और आपराधिक तत्वों के खिलाफ सख्ती बरतकर बिहार के लोगों में मर चुकी उम्मीदों को पुनः जिंदा किया है।
जबकि, शराबबंदी कानून लाकर नीतीश सरकार ने बिहार की महिलाओं का भी विश्वास जीता है। हालांकि बिहार मे कई जगहों पर स्थानीय प्रशासन की मिलीभगत अथवा लापरवाही के कारण चोरी-छिपे शराब बेची जा रही है। लेकिन जो लोग शराब पीकर खुलेआम हुड़दंग करते थे, घरों एवं गली-मोहल्ले में अनाप-शनाप बकते थे, उनमें इतना डर जरूर है कि पकड़े जाने पर उन्हें जेल हो जायेगी। फलतः शराबबंदी से सामाजिक माहौल में भी बदलाव आया है।
बिहार में अपराध का चरम उत्कर्ष ही लालू की राजनीतिक ढलान का कारण बना। कई सजायाफ्ता अपराधी लालू की मंडली में शामिल थे और बिहार की तकदीर का फैसला करते थे। हत्या, लूट, फिरौती, अपहरण, बलात्कार, नरसंहार जैसी वारदातों को रोक पाने में लालू-राबड़ी सरकार विफल हो गई थी। लालू-राबड़ी शासनकाल में अपराध का ग्राफ इतना ज्यादा बढ़ गया था कि राज्य के बड़े-बड़े कारोबारी, डॉक्टर और धनाढ्य लोग बिहार छोड़कर भाग गये। यही कारण है कि बिहार में निवेश को लेकर बड़े-बड़े उद्योगपति इसलिए असहज हो जाते हैं कि कहीं सरकार बदल गई तो उनके लिए कई मुश्किलें खड़ी हो सकती है। इसलिए वह बिहार में रिस्क लेने से आज भी घबराते हैं। जबकि लालू-राबड़ी शासनकाल में कई सिविल अधिकारियों ने भी अपना ट्रांसफर अन्य राज्यों में करवा लिया और कई अधिकारियों ने इस्तीफा दे दिया था।
वर्तमान परिदृश्यों के मद्देनजर बिहार के व्यापारियों का कहना है कि नीतीश कुमार ने अपराध को नियंत्रित कर दिया, यह बिहार के प्रति उनका सबसे बड़ा योगदान है। नीतीश सरकार में शासन-प्रशासन की इतनी की सख्ती है कि फिरौती और रंगदारी मांगने वाले अब दिखाई नहीं देते। जबकि लालू-राबड़ी के शासनकाल में सड़कछाप गुंडा-मवाली भी अपने-आपको डॉन समझ बैठता था। व्यापारी सिर्फ व्यापार करना चाहते हैं। आपराधिक तत्वों से उलझना उनकी फितरत में नहीं होती। आज बिहार के भयमुक्त माहौल से सबसे ज्यादा खुश कारोबारी वर्ग है।
बिहार की राजनीति को बारीकी से समझने वाले युवा नेता मयंक मधुर का मानना है कि बिहार में अगली सरकार एनडीए की ही बनेगी। क्योंकि बिहार में सीएम उम्मीदवार के लिए नीतीश कुमार को चुनौती देने वाले नेता नहीं हैं। विपक्षी दलों के पास जितने भी खास चेहरे हैं वह सीएम उम्मीदवार के लिए उपयुक्त नहीं है, जनता उनपर विश्वास नहीं करेगी। जबकि, लालू-राबड़ी के जंगलराज को बिहार की जनता अब भी नहीं भूल पायी है।
भाजपा के जहानाबाद के जिला मंत्री अनिल ठाकुर का कहना है कि, भाजपा-जदयू का गठजोड़ बिहार के विकास के लिए जरूरी है। बिहार सरकार को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का पूरा समर्थन मिल रहा है। केन्द्र सरकार की कई योजनाएं बिहार में लागू किये जाने से जनता लाभान्वित हो रही है। केन्द्र सरकार और बिहार सरकार के समन्वय और रणनीति से राज्य प्रगति के पथ पर है। बिहार में पुनः नीतीश कुमार के नेतृत्व में एनडीए की सरकार बनेगी। जबकि, तेजस्वी यादव आरजेडी के उत्तराधिकारी और सीएम उम्मीदवार हैं इसलिए बिहार की जनता उनसे उम्मीद लगाये नहीं बैठी है। बिहार की प्रबुद्ध जनता राजद को पसंद नहीं करती।
फिलहाल, बिहार में बढ़ते कोरोना और लचर सरकारी व्यवस्था के कारण मरीजों की हो रही परेशानी को विपक्ष भूनाने की कोशिश में है। कोरोना ने विपक्ष को नीतीश सरकार ने खिलाफ एक सियासी अवसर प्रदान किया है। लेकिन जानकार कहते हैं कि कोरोना चुनावी मुद्दा नहीं बन सकता क्योंकि यह नेशनल डिजास्टर है। देश के अधिकांश राज्य कोरोना से प्रभावित हैं और विपक्ष को इसपर सियासत नहीं करनी चाहिए। सियासत करने के लिए बिहार मेें विपक्ष को सीएम उम्मीदवार के साथ-साथ मुद्दों को भी तलाशने की जरूरत है।
हालांकि, बिहार का प्रतिपक्ष राष्ट्रीय जनता दल इस कोशिश में है कि शाम-शाम-दण्ड-भेद अर्थात सभी तरीकों को अपनाकर इस चुनाव में बीजेपी-जदयू गठबंधन को मात दी जाये। तेजस्वी यादव बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को सत्ता से हटाने के लिए बड़ी-बड़ी बातें कर रहे हैं लेकिन विरासत में मिली राजनीति को संभाल पाने में वह असमर्थ दिख रहे हैं। राजद के कई विधायक, नेता, कार्यकर्ता पार्टी छोड़कर जदयू में शामिल हो गये हैं। इनमें ज्यादातर ने तेजस्वी यादव पर तानाशाही का आरोप लगाया है। पार्टी के कई शीर्ष नेता जो लालू यादव के अच्छे और बुरे वक्त में पार्टी का दामन नहीं छोड़ा आज वह राजद में असहज महसूस कर रहे हैं।
बिहार की सत्ता से बाहर होने और चारा घोटाले में जेल जाने के बाद राजद सुप्रीमो लालू यादव का राजनीतिक साम्राज्य चरमरा गया है। लालू के नक्शेकदम पर चलने की कोशिश कर रहे उनके पुत्र तेजस्वी की अग्नि परीक्षा इस बार होनी है। जबकि, लालू के बड़े पुत्र तेज प्रताप यादव अपनी बेबाक बयानवाजी के जाने जाते हैं और राजनीति के प्रति उनकी गंभीरता तेजस्वी से कम है। इसलिए लालू की अनुपस्थिति में राजद की कमान तेजस्वी यादव संभाल रहे हैं।
2020 का चुनाव परिणाम तेजस्वी यादव के राजनीतिक भविष्य का भी आकलन कर देगा। जबकि, महागठबंधन में शामिल दल तेजस्वी को लेकर एकमत नहीं हैं। तेजस्वी यादव के मुख्यमंत्री उम्मीदवारी पर भड़के हिन्दुस्तान अवामी मोर्चा के अध्यक्ष जीतन राम मांझी महागठबंधन से नाता तोड़कर पुनः एनडीए का हिस्सा बन गये। सूत्र बताते हैं कि और भी कई शीर्ष नेता राजद एवं महागठंधन से अलग होकर एनडीए में ससम्मान वापसी चाहते हैं।




