जैसे-जैसे लोकसभा चुनाव नजदीक आ रहा है राजनीतिक पार्टियों की रणनीतियां, गोलबंदी और शह-मात की तैयारियां भी खुलकर सामने आने लगी है। हर पार्टी अपने-अपने हिसाब से नफा-नुकसान का आकलन कर रही है और उसी के अनुरूप कदम उठा रही है। आगामी चुनाव के मद्देनजर सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव और बसपा अध्यक्ष मायावती का एक साथ आना सुर्खियों में है। सपा-बसपा ने लोकसभा चुनाव 2019 के लिए सहमति से सीटों का बंटवारा कर लिया है। दोनों दलों के बीच यह गठबंधन उत्तर प्रदेश के 80 लोकसभा सीटों के लिए हुआ है, जिसमें दोनों पार्टियां 38-38 सीटों पर चुनाव लड़ेंगी। बाकी चार सीटें सहयोगी पार्टियों के लिए छोड़ दी गई है।
दो सीटें कांग्रेस के लिए और दो सीटें राष्ट्रीय लोक दल के लिए छोड़ी गई है। लेकिन दोनों ही पार्टियों ने दो-दो सीटें लेने से इनकार कर दिया है। दो सीटें छोड़ने पर तिलमिलाई कांग्रेस ने एलान कर दिया है कि पार्टी उत्तर प्रदेश में 80 सीटों पर उम्मीदवार उतारेगी। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता गुलाम नबी आजाद ने कहा है कि कांग्रेस एक राष्ट्रीय पार्टी है और क्षेत्रीय पार्टियों के भरोसे नहीं चल रही है। पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने यही फैसला किया है कि यूपी की सभी लोकसभा सीटों पर कांग्रेस अपना उम्मीदवार उतारेगी। जबकि राष्ट्रीय लोक दल के अध्यक्ष अजीत सिंह ने कहा है कि पार्टी की ओर से अभी इसपर कोई फैसला नहीं किया गया है लेकिन दो सीटें पार्टी को मंजूर नहीं है। हम निर्णय लेने के लिए और किसी के साथ अलायंस करने के लिए स्वतंत्र हैं।
बहरहाल, सपा-बसपा का यह गठबंधन उत्तर प्रदेश की राजनीति में नई पटकथा लिखने की तैयारी में है। लेकिन इस गठबंधन से जहां सपा कुनबे में खलबली है वहीं बसपा के कार्यकर्ताओं ने इस गठबंधन को उत्तर प्रदेश के लिए जरूरी बताया है। लेकिन समाजवादी पार्टी के शीर्ष नेता इस गठबंधन से खुश नहीं है। पार्टी के वरिष्ठ नेता आजम खान ने इस गठबंधन को एक मजाक करार देते हुए अखिलेश यादव को नसीहतें भी दे डाली है। आजम खान का मानना है कि जो गठबंधन पार्टी के हित में नहीं है उससे अब क्या उम्मीद की जा सकती है। अखिलेश यादव ने तो हम सबको तमाशा बनाकर रख दिया है। उन्होंने यहां तक कह दिया है कि सपा-बसपा गठबंधन से तो बेहतर यही होगा कि हम सभी बीजेपी को ही समर्थन कर दें।
अखिलेश यादव के संबंधियों और करीबियों ने भी इस गठबंधन को पार्टी के हित में अनुचित बताया है। उन सभी का कहना है कि अखिलेश यादव ने सियासी अपरिपक्वता दिखाते हुए पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस से गठबंधन कर यूपी की सत्ता गंवा दी, और अब लोकसभा चुनाव के लिए बसपा से गठबंधन किया है जो आत्मघाती भी साबित हो सकता है।
बहरहाल, इस गठबंधन से सपाई कुनबा परेशान है। परेशानी की एक और वजह है कि अब समाजवादी पार्टी 38 सीटों पर ही अपने उम्मीदवार उतारेगी। इसलिए चुनाव लड़ने के इच्छुक कई सपाई उम्मीदवारों का पत्ता कट सकता है। लिहाजा इस गठबंधन पर पार्टी से जुडे लोग अपना-अपना नजरिया पेश कर रहे हैं जिसमें उनके अपने हित भी छिपे हैं।
जबकि, सपा-बसपा गठबंधन से उन दलों में हताशा साफ दिख रही है जो राष्ट्रीय स्तर पर महागठबंधन की कवायद में जुटे हैं। जिनमें कांग्रेस, राजद, रालोसपा, रालोद, हम जैसे दर्जनों राजनीतिक दल अपनी सियासी तकदीर संवारने के लिए महागठबंधन बनाने पर जोर दे रहे हैं। लेकिन सपा-बसपा गठबंधन से बीजेपी के खिलाफ राष्ट्रीय स्तर पर एक मजबूत विकल्प बनने से पहले ही दलों में बिखराव आने शुरू हो गये हैं। अब अगर महागठबंधन बनता भी है तो उत्तर प्रदेश में उसकी संभावनायें खत्म हो गई। वहीं उत्तर प्रदेश के बाहर महागठबंधन में सपा-बसपा की क्या भूमिका होगी अथवा होगी भी या नहीं यह भी स्पष्ट नहीं है। महागठबंधन भी अब सपा-बसपा को उत्तर प्रदेश से बाहर अपनी शर्तो पर ही शामिल करेगा। क्योंकि इन दोनों दलों ने भी सबसे पहले अपने हितों को साधा है।
बहरहाल, नीतिगत विचारधाराओं से इतर निजी हितों की पूर्ति के लिए लोग गठबंधन और महागठबंधन में शामिल हो रहे हैं। मायावती ने खुद कहा है कि वह गेस्ट हाउस कांड भूल चुकी हैं। उनके लिए इस कड़वे सच को भूल पाना कितना मुश्किल होगा यह शायद उनसे बेहतर कोई नहीं जान पायेगा। गेस्ट हाउस कांड सियासत का वह स्याह पक्ष है जिसे कभी नकारा नहीं जा सकता है। लेकिन सियासत ने उन्हें सारे गिले शिकवे भूलकर एक दूसरे के करीब आने को मजबूर कर दिया है।
यह वही समाजवादी पार्टी है जिसके विधायकों और कार्यकर्ताओं ने सरकार से समर्थन वापस लेने के खिलाफ 2 जून 1995 को लखनऊ के गेस्ट हाउस में ठहरे बसपा विधायकों को जानवरों की तरह पीठा था। जबकि जिस कमरे मेें मायावती ठहरी थी उसके दरवाजे को तोड़कर उनपर हमला किया गया। मुश्किल से मायावती अपनी इज्जत बचा सकीं। बसपा विधायकों को एक गाड़ी में बोरे की तरह लादकर परिसदन लाया गया था। उन विधायकों में इतना खौफ भर गया कि उन्होंने कोरे कागज पर साइन कर दिया था। ये राजनीतिक कलंक तमाम राजनीतिक पार्टियों के लिए एक सबक हैै। लेकिन उन नेताओं पर यह कहावत फिट बैठती है कि राजनीति में न कोई स्थायी दोस्त होता है और ना ही दुश्मन। यह तो सियासी हालातों और निजी हितों पर पर निर्भर करता है कौन किसका साथ देगा।
बहरहाल, सपा-बसपा गठबंधन लोकसभा चुनाव के मद्देनजर तैयारियों में जुट गया और सीटों को लेकर मंथन चल रहा है कि कौन सीट किसके लिए फायदेमंद रहेगा। उसी के अनुरूप उन सीटों पर सपा-बसपा के उम्मीदवार उतारे जायेंगे।
दूसरी ओर महागठबंधन की अगुवाई करने वाले दलों के नेता परेशान दिख रहे हैं। वह सपा-बसपा गठबंधन की तारीफ तो कर रहे हैं लेकिन महागठबंधन विस्तारिक रूप अख्तिायार कर पायेगा, इसका उन्हें अंदेशा है। एनडीए के खिलाफ बनने वाला मोर्चा कहीं कमजोर न पड़ जाये इसलिए वह चिंतित हैं।
जबकि, महागठबंधन में दलों की भीड़ जरूर बढ़ रही है लेकिन ज्यादातर उनमें ऐसे दल हैं जिनकी राष्ट्रीय स्तर पर पहचान नहीं हैं। क्षेत्रीय स्तर पर भले ही कुछ प्रभाव डाल सकते हों लेकिन उनसे राष्ट्रीय स्तर पर उम्मीद नहीं की जा सकती है। यही वजह है कि अभी भी कई दल किन्तु-परंतु में लगे हैं क्योंकि सपा-बसपा के गठबंधन के बाद सवाल उठ रहे हैं कि महागठबंधन की ओर से सभी दलों को एक मंच पर लाने का सूत्रधार कौन होगा।
राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव के जेल में रहने के कारण महागठबंधन वह मजबूत रूप नहीं ले पा रहा है जिसकी उम्मीदें की जा रही थी। वही सपा-बसपा ने अलग ही राह अख्तियार कर ली है। फिलहाल राजद की कमान संभाल रहे तेजस्वी यादव पुरजोर कोशिश कर रहे हैं कि महागठबंधन को एनडीए के खिलाफ मजबूत विकल्प बनाया जाये। लेकिन वह उम्मीदें धूमिल होती नजर आ रही है। अब एकमात्र उम्मीदें टिकी हुई हैं पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष ममता बनर्जी पर, जो एनडीए को मजबूती से चुनौती देने वाली दिखती हैं। लेकिन अभी तक उन्होंने यह संकेत नहीं दिया है कि उनकी पार्टी महागठबंधन का हिस्सा बनेगी या नही। क्योंकि तेलूगु देशम पार्टी के अध्यक्ष चंद्रबाबू नायडु और तेलंगाना राष्ट्र समिति के अध्यक्ष के.सी.राव सहित कई दलों के नेता तीसरा मोर्चा बनाने पर जोर दे रहे हैं।




