Thursday, April 16, 2026
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फ्रंटफुट पर खेलने की कांग्रेस की रणनीति

महागठबंधन में शामिल कई दलों को कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी प्रधानमंत्री उम्मीदवार के रूप में मंजूर नहीं हैं। लिहाजा, कहीं न कहीं कांग्रेस ने प्रियंका गांधी को एक विकल्प के तौर पर चुना है। क्योंकि राहुल गांधी के बयान से स्पष्ट हो रहा है कि कांग्रेस फ्रंटफुट पर खेलना चाहती है। इसलिए ऐसा कोई ठोस कदम उठाओ की पीएम के तौर पर महागठबंधन के सारे दावेदार पीछे रह जायें। अगर परिस्थतिजन्य कांग्रेस प्रियंका गांधी को पार्टी का चेहरा बना देती है तो महागठबंधन में पीएम के दावेदार उनके आगे नहीं टिक पायेंगे।

नेहरू-गांधी घराने कीे एक और सदस्य की मुख्यधारा की राजनीति में एंट्री हो गई। वह कोई और नहीं बल्कि प्रियंका गांधी है जिन्हें अरसे से भारतीय राजनीति में लाने की मांग की जाती रही है। प्रियंका गांधी को कांग्रेस का महासचिव नियुक्त किया गया है और उन्हें पूर्वी उत्तर प्रदेश की जिम्मेदारी दी गई है। यह क्षेत्र बीजेपी का गढ़ माना जाता है। विशेषकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का संसदीय क्षेत्र वाराणसी पूर्वी उत्तर प्रदेश में ही आता है। इसलिए कहीं न कहीं मोदी को घेरने की रणनीति कांग्रेस द्वारा तैयार की गई है। मतलब कांग्रेस सहित तमाम विपक्षी दलों द्वारा मोदी को शिकस्त देना ही मुख्य लक्ष्य है। इसलिए इस बार का चुनाव आर-पार की लड़ाई में तब्दील होती दिख रही है।

मोदी को घेरने के लिए कांग्रेस ने सही समय पर प्रियंका गांधी  को मैदान में उतार दिया है। स्पष्ट तौर पर कहें तो कांग्रेस की रणनीति मोदी को उनके गढ़ में ही मात देने की है। इसके लिए कांग्रेस के पास प्रियंका गांधी एकमात्र विकल्प के तौर पर हैं। प्रियंका गांधी के आते ही कांग्रेसियों में गजब का उत्साह देखा जा रहा है। प्रियंका गांधी में इंदिरा गांधी का अक्श नजर आता है। उनके बोलने का अंदाज लोगों का भाता है। इसलिए जब-जब कांग्रेस विकट परिस्थितियो में आई है कांग्रेसी कार्यकर्ता प्रियंका गांधी को राजनीति में लाने की मांग करते रहे हैं। कांग्रेस के शीर्ष नेता कह रहे हैं कि प्रियंका गांधी को सक्रिय राजनीति में उतारने का यह सही वक्त है।

देश की सबसे पुरानी पार्टी पिछले कुछ सालों से शीर्ष नेताओं के होते हुए लीडरशिप की कमी से जूझ रही है। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी राजनीति में अब परिपक्व हो गये हैं लेकिन उन्हें देश का अवाम मोदी का विकल्प मानने को तैयार नहीं है। पहले तो एनडीए के दल कहते थे तो कांग्रेस इसे हल्के में ले रही थी। लेकिन जब सहयोगी दल भी राहुल गांधी को दरकिनार करने लगे तो कांग्रेस के रणनीतिकारों को ठोस कदम उठाने पर मजबूर होना पड़ा। महागठबंधन में शामिल कई दलों को राहुल गांधी प्रधानमंत्री उम्मीदवार के रूप में मंजूर नहीं हैं। जबकि कांग्रेस की ओर से स्पष्ट कहा गया कि यूपीए राहुल गांधी को ही प्रधानमंत्री उम्मीदवार बनायेगी। इस लिहाज से देखा जाये तो यूपीए लोकसभा चुनाव में मोदी के खिलाफ राहुल गांधी को उतारने की तैयारी में है जबकि महागठबंधन मोदी के खिलाफ नया चेहरा उतारना चाहता है।

लिहाजा कांग्रेस के शीर्ष नेताओं ने यही सोचा कि सहयोगी दल कांग्रेस को दोयम नजरिये से देख रहे है और ऐसी स्थितियां चुनाव से पहले की है। अगर चुनाव के बाद महागठबधन में ही प्रधानमंत्री पद के कई दावेदार खड़े हो जाते हैं तो कांग्रेस के पास क्या विकल्प है। इसलिए कहीं न कहीं कांग्रेस ने प्रियंका गांधी को एक विकल्प के तौर पर चुना है। क्योंकि राहुल गांधी के बयान से स्पष्ट हो रहा है कि कांग्रेस फ्रंटफुट पर खेलना चाहती है। इसलिए ऐसा कोई ठोस कदम उठाओ की पीएम के तौर पर महागठबंधन के सारे दावेदार पीछे रह जाये। अगर परिस्थतिजन्य कांग्रेस प्रियंका गांधी को पार्टी का चेहरा बना देती है तो महागठबंधन में पीएम पद के दावेदार उनके आगे नहीं टिक पायेंगे।

सक्रिय राजनीति में प्रियंका गांधी को उतारने की वजह

कांग्रेस जिस तेजी से देशभर में जनाधार खोती जा रही है यह पार्टी के लिए चिंता की बात है। सही नेतृत्व के अभाव में कांग्रेस का ही जनाधार आज कई पार्टियों में बंट गया है। कांग्रेस उसी जनाधार को पाने के लिए बेताब दिखती है। कांग्रेस के वर्तमान चेहरे से भी पार्टी को बहुत ज्यादा उम्मीद नहीं है। इधर देखा जा रहा है कि क्षेत्रीय दलों के सहारे कांग्रेस सत्ता का सफर तय कर रही है। कभी- कभी तो कांग्रेस इतना मजबूर दिखती है कि क्षेत्रीय पार्टियां बरगलाती हुई नजर आती है। लेकिन कांग्रेस के पास कोई चारा नहीं है। सीटों के बंटवारे में भी कांग्रेस के साथ सहयोगी पार्टियां दोयम दर्जें जैसा व्यवहार कर रही है।

हाल ही में उत्तर प्रदेश में हुए सपा-बसपा के गठबंधन से कांग्रेस को बाहर रखा गया है। सहयोगी दलों के लिए सिर्फ चार सीटें छोड़ी गई है। जिनमें दो कांग्रेस के लिए और दो रालोद के लिए। लेकिन दोनों ही दलों को दो-दो सीटें मंजूर नहीं है। इसका मतलब यूपी में अब सपा-बसपा के साथ कांग्रेस का गठबंधन नही होगा। यह कांग्रेस के लिए कड़वा घूंट है जिसे न चाहते हुए पीना पड़ा है। लिहाजा कांग्रेस की ओर से बयान आया कि पार्टी उत्तर प्रदेश में सभी सीटों पर चुनाव लड़ेगी।

वहीं बिहार में सीटों के बंटावारें पर राजद के साथ भी पेंच फंसा है। बिहार की 40 लोकसभा सीटों में 20 सीटें राजद खुद अपने पास रखना चाहता है। बाकी सीटें सहयोगी दलों को दी जायेगी। कांग्रेस बिहार में 15 सीटों की मांग कर रही है जिसपर राजद सहमत नहीं है। राजद सूत्रों की मानें तो पार्टी के साथ और भी सहयोगी दल जुड़े है। सीटों पर किसी तरह के मतभेद नहीं हो इसलिए कांग्रेस को 8 सीट से ज्यादा नहीं दे सकते हैंं। बाकी सीटें अन्य सहयोगी दलों को दी जायेगी। इस तरह देखा जाये तो एक राष्ट्रीय पार्टी को क्षेत्रीय पार्टियों के सामने सीटों के लिए गिड़गिड़ाना पड़ रहा है।  कांग्रेस को सहयोगी पार्टियां अब हल्के में लेने लगी है। लिहाजा कांग्रेस ने प्रियंका गांधी को सक्रिय राजनीति में उतारकर एक मास्टर स्ट्रॉक खेला है। प्रियंका गांधी के बहाने विरोधियों के साथ-साथ सहयोगी पार्टियों पर भी दबाव बनाने की कांग्रेस की रणनीति है।

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