दिल्ली में 12 मई को लोकसभा चुनाव हुए थे। परिणाम 23 मई को आयेंगे लेकिन उसके पहले आम आदमी पार्टी के संयोजक और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने एक बयान दिया है जिसके कारण वह सुर्खियों में हैं। उस बयान की चर्चा सियासी गलियारों से लेकर अवाम के बीच भी हो रही है कि देश के मुसलमानों के प्रति नेताओं की सोच क्या हैं।
केजरीवाल ने कहा है कि चुनाव के अंतिम समय में दिल्ली के मुस्लिम वोटर्स कांग्रेस के पाले में चले गये। चुनाव परिणाम से पहले ही केजरीवाल के बयान के कई मायने निकाले जा रहे हैं। शायद आम आदमी पार्टी को हार का अंदेशा हो गया है और इसका ठीकरा इवीएम के साथ-साथ मुसलमानों पर भी फोडना चाहती है।
लोकसभा चुनाव से पहले आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के बीच गठबंधन की पुरजोर कोशिश की गई। सारे हथकंडे अपनाये गये। दोनो ओर से शर्तें और सहमति भी बनी लेकिन किसी रणनीतिक कारणवश कांग्रेस ने आम आदमी पार्टी से गठबंधन नहीं किया और दोनों पार्टियों ने एक दूसरे के खिलाफ चुनाव मैदान में उम्मीवार उतारे। इसलिए दिल्ली में आम आदमी पार्टी, कांग्रेस और बीजेपी के बीच मुकाबला रहा। केजरीवाल की मानें तो इस त्रिकोणीय मुकाबले में सबसे ज्यादा नुकसान आम आदमी पार्टी को होना है क्योंकि मुस्लिम वोट कांग्रेस में शिफ्ट हो गये।
दिल्ली की सातों सीटों पर बीजेपी का कब्जा है। लिहाजा बीजेपी को चुनौती देने के लिए आम आदमी पार्टी ने कांग्रेस के सामने गठबंधन का प्रस्ताव रखा था। गठबंधन को लेकर दोनों दलों के नेताओं के बीच कई बार बैठकें भी हुई और केजरीवाल के मुताबिक गठबंधन को लेकर 95 प्रतिशत उम्मीदें दोनों तरफ बन गई थी। लेकिन अंततः कांग्रेस ने गठबंधन करने से मना कर दिया।
आम आदमी पार्टी के साथ गठंबंधन को लेकर कांग्रेस में दो धड़ा बन चुका था। एक धड़ गठबंधन को लेकर तैयार था लेकिन दूसरा धड़ा कांग्रेस के लिए आत्मघाती बता रहा था। दूसरे धड़े में शामिल कांग्रेस की वरिष्ठ नेता और दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित थी जिन्होंने उन तमाम पहलुओ से कांग्रेस हाईकमान को अवगत कराया कि आखिर अरविंद केजरीवाल कांग्रेस के साथ गठबंधन क्यों करना चाहते हैं।
आम आदमी पार्टी, जिसने कांग्रेस को दिल्ली की सत्ता से ही बाहर नहीं किया बल्कि एक सीट के लिए भी तरसा दिया। दिल्ली विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी ने कांग्रेस का क्लीन स्वीप कर दिया। कांग्रेस के सारे परम्परागत वोटर्स आम आदमी पार्टी के पाले में चले गये। इन सभी हालातों से कांग्रेस हाईकमान को अवगत कराया गया है कि दिल्ली में कांग्रेस को खोने के लिए कुछ भी नहीं है तो आम आदमी पार्टी के साथ गठबंधन करने की जरूरत क्या है।
पार्टी सूत्रों के मुताबिक हम ऐसा करके अपनी जमीन तलाशने का अवसन गंवाना नहीं चाहते थे। यही कारण आम आदमी पार्टी के साथ गठबंधन करने के कांग्रेस ने साफ मना कर दिया। कांग्रेस नेताओं को भरोसा है कि समय के साथ-साथ दिल्ली में और केन्द्र की सत्ता में भी कांग्रेस पाटी की वापसी होगी।
जबकि आम आदमी पार्टी के पार्टी की लोकप्रियता में तेजी से गिरावट आई है। पिछले लोकसभा चुनाव में वाराणसी से मोदी को टक्कर देने वाले अरविंद केजरीवाल इस बार चुनाव लड़ने से भी मना कर दिया। पार्टी के प्रति कार्यकर्ताओं और शीर्ष नेताओं में बढ़ते असंतोष के कारण केजरीवाल के कई साथी उनका साथ छोड़ चुके हैं और जो साथ में हैं उनमें से ज्यादा को दिल्ली से बाहर कोई जानता भी नहीं है।
लेकिन, केजरीवाल ने लोकसभा चुनाव के संदर्भ में जो बयान दिया है उसके कई मायने निकाले जा रहे हैै। उन्होंने साफ तौर पर कहा है कि दिल्ली का पूरा मुस्लिम वोट कांग्रेस में शिफ्ट हो गया है। लिहाजा उन्हें इस बात का डर अभी से ही हो गया है लोकसभा चुनाव परिणाम अगर आम आदमी पार्टी के लिए संतोषजनक नहीं रहा तो इसका प्रभाव विधानसभा चुनाव पर पड़ना तय है। लिहाजा दिल्ली की सत्ता को बचाना केजरीवाल की पहली प्राथमिकता है।
क्योंकि, अगर हार-जीत का पैमाना अभी छोड़ दे तो कांग्रेस दिल्ली में मजबूत हो रही है, क्योकि कांग्रेस के परम्परागत मतदाता कांग्रेस की ओर रूख कर रहे है। अगर दिल्ली में आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के बीच गठबंधन हो जाता तो केजरीवाल के सामने मुस्लिम जनाधार खिसकने का डर नहीं रहता, क्योंकि दिल्ली की कई सीटों पर मुस्लिम का वोट निर्णायक माना जाता है। लिहाजा अरविंद केजरीवाल को लोकसभा चुनाव परिणाम के साथ-साथ आगामी विधानसभा चुनाव का भी डर सताने लगा है। दिल्ली की 67 विधानसभा सीटों पर जीत दर्ज करने वाली आम आदमी पार्टी के सामने उस सफलता को दोहराना सबसे बड़ी चुनौती होगी।




