केन्द्र में मोदी सरकार के नये मंत्रिमंडल के गठन के बाद से ही बीजेपी और जदयू की दोस्ती में दरार दिख रही है। जदयू के सांसदों को मोदी कैबिनेट में नहीं लिया जाना बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार सहित जदयू के शीर्ष नेताओं को खल रही है। अब नीतीश कुमार बीजेपी से बदले के मूड में दिख रहें हैं या यूं कहें कि बीजेपी से रिश्ता तोड़ने का बहाना ढूंढ रहे हैं।
जदयू ने एनडीए गठबंधन में रहकर भी बीजेपी के कुछ एजेंडों का विरोध करने का फैसला किया है। जिसमें धारा 370, राम मंदिर का मसला, तीन तलाक सहित कई एजेंडों के साथ जदयू बीजेपी के साथ असहज महसूस कर रहा है। इसे वोट बैंक की सियासत भी कह सकते हैं। क्योंकि ये सभी ऐसे मसले हैं जिसका साथ देने पर जदयू का मुस्लिम वोट प्रभावित हो सकता हैं। इसलिए जदयू ने सेक्युलरिज्म का चोला ओढकर ही बीजेपी के साथ रहने का फैसला किया है। अगर जदयू को इन मसलों पर असहजता महसूस होगी तो यह पार्टी बीजेपी से अलग होने में जरा भी संकोच नहीं करेगी।
केन्द्र में मोदी सरकार के दोबारा आने के बाद से ही कयास लगने शुरू हो गये हैं कि धारा 370 पर सरकार ठोस कदम उठाने जा रही है। अमित शाह ने गृह मंत्री बनते ही उन तमाम पहलुओं पर प्रकाश डाला जिससे कश्मीर अव्यवस्थित हो रहा है। इसमें दो मत नहीं कि कश्मीर के नेताओं को वहां की समस्याएं खाद-पानी देने का काम करती रही हैं। उनका सितारा अलगाववाद की सियासत से बुलंद होता रहा है। इसीलिए पूर्व की सरकारों चाहे केन्द्र में हो या राज्य में इसे सियासी मसला बनाकर छोड़ दिया और इसे सुलझा पाने में उनकी दिलचस्पी नहीं रही।
जबकि बीजेपी कश्मीर से धारा 370 को हटाने के लिए प्रतिबद्ध दिखती है। कश्मीर के संबंध में अमित शाह की हाल के दिनों में कई उच्चस्तरीय मीटिंग हो चुकी है। जिससे कहा जा रहा है कि मोदी सरकार कश्मीर को लेकर कोई योजना बना रही है।
एक तरफ कश्मीर मसले पर मोदी सरकार की सक्रियता को देखकर अलगाववाद को समर्थन करने वाले नेता परेशान दिख रहे हैं, वहीं अब एनडीए के घटक दल जदयू ने धारा 370 पर मोदी सरकार का विरोध करने का फैसला किया है।
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बीजेपी को खरी-खरी सुना दी है कि जिन-जिन एजेंडों पर हमें असहजता महसूस होगी, हम उसका विरोध करेंगे।
जदयू के महासचिव केसी त्यागी ने कहा है कि धारा 370, तीन तलाक, राम मंदिर का मुद्दा.. ये सारे बीजेपी के एजेेडे में शामिल हैं। जदयू को बीजेपी के इन एजेंडों से कोई मतलब नहीं है। इन मसलों पर मोदी सरकार को जदयू का समर्थन नहीं मिलेगा। हमारी पार्टी का जो मूल सिद्धांत है, हम उससे अलग नहीं चल सकते।
बहरहाल, जदयू के तेवर देखकर इतना तो स्पष्ट हो गया कि धारा 370, तीन तलाक, राम मंदिर पर विपक्ष के साथ-साथ बीजेपी को घटक दल जदयू के विरोध का भी सामना करना पड़ेगा। जदयू ने एनडीए घटक में रहकर बीजेपी का विरोध करने का फैसला किया है।
जदयू के इस फैसले के बाद विरोधी दल तंज कस रहे हैं। जदयू के इस तेवर को देखकर विरोधी दलों को आत्मबल मिला है। लोकसभा चुनाव में करारी पराजय के बाद मीडिया से मुंह छिपाते फिर रहे महागठबंधन में शामिल कई नेता अपनी हार को भूलकर बीजेपी-जदयू की दोस्ती पर सवाल उठा रहे हैं।
जबकि, धारा 370 को लेकर कश्मीर के नेताओं की मोदी सरकार के प्रति भौहें तन गई हैं। पीडीपी अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती, नेशनल कांफ्रेंस के नेता फारूख अब्दुल्ला, उमर अब्दुल्ला के अलावा कई अलगाववादी संगठनों के नेताओं ने केन्द्र सरकार को हद में रहने की हिदायत दी है। महबूबा मुफ्ती ने कहा है कि मोदी सरकार आग से मत खेले। जिस दिन कश्मीर से धारा 370 हटेगा, उसी दिन कश्मीर भारत से अलग हो जायेगा। कश्मीर एक समझौते के तहत भारत से जुड़ा हुआ है। अगर वह समझौता टूट जाता है तो कश्मीर को भारत के साथ जुड़े रहने का कोई औचित्य नहीं रहेगा है। इससे पहले भी महबूबा मुफ्ती अपने बयानों से जहर उगलती रही हैं जिससे कश्मीर में अलगाववादी ताकतों को प्रश्रय मिलता है।
मोदी सरकार का मानना है कि कश्मीर की कुछ समस्याओं को वहां के नेताओं ने और जटिल बना दिया है। अगर सियासी नफा-नुकसान से इत्तर इसे राष्ट्रीय मसला मानकर देखा जाये तो इस समस्या का निदान बहुत पहले हो जाना चाहिए था। लेकिन इन मसलों पर पूर्व की सरकारों के नरम रूख के कारण कश्मीर में अलगाववाद को बढ़ावा मिला है और इन अलगाववादियों की मदद से अब कश्मीर में आतंकवाद पैर पसारने लगा है। पुलवामा हमला एवं इससे पहले और हाल के दिनों में हुए कई आतंकी हमलों में कश्मीर के स्थानीय युवकों की संलिप्तता से देश की आंतरिक सुरक्षा खतरे में है।
उसके बावजूद देश की सियासी पार्टियां अपने-अपने हितों को साधने के लिए इन मसलों पर एकजुट नहीं है। कोई इसे सिर्फ बीजेपी का एजेंडा बता रहा हैं तो कोई इस मसले पर देश को बांटने का आरोप बीजेपी पर लगा रहा है। जबकि कांग्रेस पार्टी के शीर्ष नेताओं ने लोकसभा चुनाव से पूर्व स्पष्ट तौर पर कह दिया था कि अगर केन्द्र में कांग्रेस की सरकार बनती है तो कश्मीर मसले को हम नहीं छेड़ेंगे। इससे यह संदेश जाता है कि कश्मीर के प्रति कांग्रेस का रूख नहीं बदलेगा, भले ही देश की सुरक्षा खतरे में पड़ जाये।
जबकि, कश्मीर में पैर पसारते अलगाववाद, आतंकवाद, हिंसा और अराजकता की जड़ें कहीं नहीं न कहीं धारा 370 और 35ए, जैसे गंभीर मुद्दों से जुड़ती दिखती है। जिसे जानकर और समझकर भी इस देश के सेक्युलरवादी नेता सियासी हितों के कारण इग्नोर करते रहे हैं।
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