कश्मीर समस्या के समाधान के लिए इच्छाशक्ति की जरूरत थी, जो कांग्रेस एवं कांग्रेस गठबंधन नेतृत्व केन्द्र की सरकारों में नहीं दिखी। अब मोदी सरकार ने कश्मीर से जुड़ी विवादित धारा 370 को हटा दिया है, लेकिन इसे कांग्रेस नहीं पचा पा रही है।
धारा 370 ने देश की कई छोटी-बड़ी पार्टियों को फलने-फूलने का मौका दिया। देश एवं जम्मू कश्मीर के सियासतदानों ने इसे भूनाने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी। जिसे अमिट करार दिया जा रहा था, जिसे विवादित बताया जा रहा था, जिसे अनसूलझा करार दिया जा रहा था, उसे मोदी-शाह ने चुटकी में हल कर दिया। हां इसे हटाने के लिए जो जरूरी मानदंड था उसे मोदी सरकार ने पूरा किया है।
सवाल यह है कि इस विवाद के समाधान होने में 72 साल क्यों लग गये। जिसका उल्लेख संविधान में अस्थायी के तौर पर वर्णन किया गया है उसे हटाने में पूर्व की सरकारें क्यों नहीं रूचि दिखाई ? इससे पहले भी केन्द्र में कई सरकारें पूर्ण बहुमत में आयी है। लेकिन उन सरकारों ने इस विवादित मसले का समाधान करने से कहीं ज्यादा इसका सियासी हितों के लिए इस्तेमाल किया है।
कश्मीर में धारा-370 लागू हो जाने के बाद यह क्षेत्र एक तरह से भारत से कट चुका था। कश्मीर की सरकारों ने इस राज्य को भारत से अलग-थलग करने के हरसंभव प्रयास किये। इस क्षेत्र में केन्द्र सरकार को हस्तक्षेप करने के अधिकार भी सीमित थे। सिर्फ रक्षा, विदेश एवं संचार के क्षेत्र में केन्द्र सरकार कश्मीर में दखल दे सकती थी। जबकि सारी विधायी शक्तियां जम्मू और कश्मीर सरकार के पास थी। यहां तक की धारा 370 की वजह से कश्मीर का अलग झंडा और अलग विधान भी था। जिस विधान का इस्तेमाल वहां की सरकारें अपने सियासी फायदे और कौमी ताकतों को बढ़ाने के लिए किया।
कौमी ताकतों का फायदा पहुंचाने का आशय यह है कि एक साजिश के तहत 1989-90 में कश्मीर से साढ़े पांच लाख कश्मीरी पंडितों को बाहर कर दिया। ताकि, उनके मंशूबे में कोई रूकावट नहीं डाले। वह इस बात से पूरी तरह निश्चिंत होना चाहते थे कि उनके काम में कोई दखलंदाजी करें। इसलिए वहां के मजहबी अलम्बरदारों ने गैर मुस्लिमों को पलायन करने पर मजबूर कर दिया। मुस्लिम बहुल स्टेट बनाने के लिए उन्होंने वह सब कुछ किया जो वह करना चाहते थे। सियासी पार्टियां और सरकार आंख बंदकर यह सारा तमाशा देख रही थी। कश्मीर में अलगाववाद के फैलने में वहां की सियासी पार्टियों का भी योगदान रहा है। इतना ही नहीं कई अलगाववादी संगठनों के नेता भी कश्मीर की सियासत का हिस्सा बने हैं।
अलगाववादियों ने कश्मीर में हिंसा का वह खेल-खेेलना शुरू किया जिससे मानवता भी शर्मशार हो गई। 1989-90 के दशक में जब कश्मीरी पंडितों को अपना घर छोड़कर जाने का फरमान सुनाया गया, उस समय केन्द्र में कांग्रेस नेतृत्व और कश्मीर में नेशनल कांफ्रेंस की सरकार थी। अगर ये दोनों सरकारें चाहती तो कश्मीर में ऐसा कुछ नहीं होता जो अलगाववादियों ने मस्जिदों से ऐलान करके किया। देखते-देखते पांच लाख से ज्यादा कश्मीर दर-बदर कर दिये गये। अपने ही देश में वह आज विस्थापितों की जिंदगी जीने को मजबूर हैं। एक लोकतांत्रिक देश में इससे बड़ा धब्बा और क्या हो सकता है कि चंद अलगाववादियों के आगे केन्द्र एवं कश्मीर की सरकार नतमस्तक हो गई।
केन्द्र के पास फौजें और जम्मू-कश्मीर सरकार के पास राज्य की पुलिस थी जिसका इस्तेमाल कर तत्कालीन राज्य और केन्द्र की सरकार अलगाववादियों के मशूबे पर अंकुश लगा सकती थी। लेकिन ऐसा नहीं किया गया। केन्द्र सरकार हाथ पर हाथ रखकर अलगाववादियों के क्रूर तमाशे को देखती रही। कश्मीरी महिलाओं की आबरू लूटी जा रही थी। बलात्कार और हत्या का घिनौना रूप देखकर भी केन्द्र सरकार का दिल नहीं पसीजा। क्योंकि उस समय केन्द्र का गृह मंत्रालय कश्मीर वाले मुफ्ती मोहम्मद सईद के जिम्मे था। (जिनकी बेटी महबूबा मुफ्ती आज अलगाववाद की प्रमुख पैरोकार के रूप में जानी जाती हैं।) मुफ्ती मोहम्मद सईद ने रक्षा बल को भी इस मामले में दखल देने का आदेश नहीं दिया था। जेके पुलिस राज्य सरकार के अधीन थी इसलिए वहां की पुलिस भी हाथ पर हाथ रखकर बैठी रही। पुलिस को यह कहा गया था कि यह सिविलियन का मामला है, थोड़े दिन में शांत हो जायेगा।
कश्मीर को अलगाववाद की भेंट चढ़ाने में कश्मीर की सियासत ने कोई कसर नहीं छोड़ी। जबकि मुस्लिम वोट बैंक के कारण कत्लेआम पर भी केन्द्र ने नेशनल कांफ्रंेस की सरकार को कुछ नहीं कहा। मुस्लिम धू्रवीकरण की राजनीति के कारण कांग्रेस ने कश्मीर मसले और जटिल बना दिया। यहां तक कि कई कांग्रेसी नेता भी अलगाववादियों की तरफदारी करने लगे। उसके हक और हकूक की बात करने लगे। आज भी कश्मीर को लेकर कांग्रेस का स्टैंड नहीं बदला है और धारा 370 हटाये जाने के विरोध में आवाज बुलंद कर रही है। लोकसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी (जो अब इस्तीफा दे चुके हैं) ने कहा था कि सत्ता मे आने के बाद उनकी सरकार कश्मीर मुद्दे से छेड़छाड़ नहीं करेगी। मतलब कांग्रेस को धारा 370 से कोई दिक्कत नहीं है।
कश्मीर में कांग्रेस को अलगाववाद से कोई दिक्कत नहीं है। आतंकवाद से भी कोई दिक्कत नहीं है। पांच लाख कश्मीरी पंडितों की बेबसी से भी कांग्रेस को कोई मतलब नहीं है, क्योंकि कश्मीरी पंडित कांग्रेस के वोट बैंक नहीं हैं। मतलब देश की अस्मिता और अखंडता से हीं ज्यादा कांग्रेस को अपना वोट बैंक प्यारा है। धारा 370 हटाये जाने के बाद सदन में कांग्रेस के नेताओं द्वारा दिये जा रहे तर्क से तो यही समझ में आता है।




