महाराष्ट्र की एक क्षेत्रीय राजनीतिक पार्टी शिवसेना जिसकी पहचान पिछले तीन दशकों से एक कट्टर हिन्दुवादी पार्टी के रूप में रही है। शिवसेना के संस्थापक बाला साहब ठाकरे जब तक जिंदा रहे तब तक अपनी जमीर से कभी समझौता नहीं किया। भले ही पार्टी सत्ता में रहे या नहीं रहे। बाल ठाकरे की दहाड़ की शिवसेना की असल पूंजी थी। एक समय वह भी था जब मतोश्री में बीजेपी-कांग्रेस के बड़े नेता बाल ठाकरे के चरण स्पर्श करने जाते थे। सियासी शर्तें और समझौतों के लिए बाल ठाकरे कभी किसी के दर पर नहीं गये। लेकिन आज हालात बदले हुए हुए हैं। बाल ठाकरे के उत्तराधिकारी उद्धव ठाकरे ने कभी परिपक्व नेता का परिचय नहीं दिया है। आज उसी का नतीजा है कि उद्धव ठाकरे ने सत्ता की लालच में शिवसेना साख की जो गंवाई है उसकी भरपाई शायद ही संभव हो।
शिवसेना की आज देशभर में किरकिरी हो रही है और अब उनके अपने भी मजे ले रहे हैं। मुख्यमंत्री की कुर्सी पद के लिए उद्धव ठाकरे बीजेपी से तीस साल का नाता तोड़ कांग्रेस और एनसीपी की गोद में जा बैठे, यह उनकी राजनीतिक अपरिपक्वता को पुख्ता कर दिया।
हमेशा ही सौदेबाजी में जुटी रही शिवसेना के रिश्ते बीजेपी के साथ महाराष्ट्र में कभी भी सहज नहीं रहें। फिर भी देवेन्द्र फड़नवीस ने सियासी सुझबूझ से कार्यकाल पूरा किया। गठबंधन सरकार में रहते हुए भी शिवसेना ने बीजेपी के सामने कई बार मुश्किलें खड़ी की है। लेकिन, इस बार तो शिवसेना ने हद पार कर दी। महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में बीजेपी-शिवसेना गठबंधन को सरकार बनाने के लिए पर्याप्त बहुमत मिले। 288 विधानसभा सीटों में से बीजेपी ने 105 और शिवसेना ने 56 सीटों पर जीत दर्ज की। जबकि 54 सीटें एनसीपी को और कांग्रेस को 44 सीटें मिली।
जनादेश को देखते हुए महाराष्ट्र में बीजेपी-शिवसेना की गठबंधन सरकार के वापसी की मुहर लग गई थी। लेकिन ऐन मौके पर शिवसेना ने बीजेपी से मुख्यमंत्री पद की मांग कर डाली और सारा खेल यही से बिगड़ गया। देवेन्द्र फड़नवीस का कहना है कि शिवसेना अब सौदेबाजी और बयानबाजी पर उतर गई है। चुनाव से पहले किसी तरह की शर्तें नहीं रखी गई थी। शिवसेना किस आधार पर मुख्यमंत्री पद की मांग कर रही है यह समझ से परे हैं। शिवसेना के इस तेवर को देखते हुए बीजेपी हाईकमान ने महाराष्ट्र में सरकार बनाने से मना कर दिया।
पैतरेेंबाजी, सौदेबाजी और भाषायी क्षेत्रवाद को बढ़ावा देने वाली शिवसेना इस बार मुख्यमंत्री की कुर्सी पाने के लिए अपने प्रखर हिन्दुवादी होने की पहचान को खूंटी में टांगकर कथित सेक्युलर पार्टियों के साथ साम-दाम में जुट गई। मुख्यमंत्री पद के लिए शिवसेना को ना अब कांग्रेस से परहेज है और ना ही एनसीपी एवं अन्य छद्म धर्मनिरपेक्ष दलों सें।
इस सियासी ड्रामे के बाद भी शिवसेना को अब तक कुछ भी हासिल नहीं हुआ। हालांकि शिवसेना-कांग्रेस-एनसीपी के बीच बातचीत के दौर अभी खत्म नहीं हुए हैं। शिवसेना की एकमात्र शर्त है, चाहे वह बीजेपी मान ले या कांग्रेस-एनसीपी। महाराष्ट्र का अगला मुख्यमंत्री शिवसेना का ही होगा। इसके लिए आदित्य ठाकरे का नाम सबसे उपर है। मतलब, आदित्य ठाकरे को मुख्यमंत्री बनाने के लिए शिवसेना ने इतना तिकड़म किया है। शिवसेना की इस मांग को बीजेपी ने सिरे से ठुकरा दिया है। उधर कांग्रेस और एनसीपी भी असहज दिख रही है। एनसीपी प्रमुख शरद पवार रोटेशन मुख्यमंत्री की बात कर रहे हैं जो शिवसेना को मंजूर नहीं है। शिवसेना की इस मांग पर कांग्रेस और एनसीपी में माथापच्ची चल रही है, लेकिन अब तक कोई रास्ता नहीं निकल पाया है।
कांग्रेस-एनसीपी मौका हाथ से निकलने भी नहीं देना चाह रही है और शिवसेना की मांग पर भी उन्हें ऐतराज है। जबकि शिवसेना के बिना महाराष्ट्र में किसी कि सरकार नहीं बन सकती है। ना ही अकेले बीजेपी बना सकती है और ना ही कांग्रेस-एनसीपी। इस लिहाज से महाराष्ट्र की सत्ता की चाबी शिवसेना के पास है। लेकिन उद्धव ठाकरे और उनके सलाहकार संजय राउत का अड़ियल रवैया पार्टी को काफी नुकसान पहुंचा रहा है।
हालांकि शिवसेना ने जो शर्त बीजेपी के सामने रखी थी वहीं शर्त कांग्रेस और एनसीपी के सामने भी रखी गई है। अब अगर कांग्रेस-एनसीपी महाराष्ट्र की सत्ता में वापसी चाहती है तो उनके लिए यह सुनहरा मौका भी है, बशर्ते दोनों दलों को मुख्यमंत्री पद का त्याग करना होगा। अन्यथा तु डाल-डाल मैं पात-पात जैसी स्थितियां बनी रहेगी। बहरहाल 18 दिन तक चली सियासी जोड़-तोड़ के बावजूद महाराष्ट्र में अब तक किसी की सरकार नहीं बन पायी है और समय सीमा समाप्त होने के बाद राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया है।
कहा जा रहा है कि एनसीपी प्रमुख शरद पवार ने उद्धव ठाकरे को न घर का रहने दिया न घाट का। शरद पवार जानबूझ कर महाराष्ट्र में सरकार बनाने में देरी कर रहे हैं। क्योंकि बीजेपी से निराशा हाथ लगने के बाद एनसीपी ही उद्धव ठाकरे के लिए वह आखिरी विकल्प हैं जो आदित्य ठाकरे को मुख्यमंत्री का ताज पहनाने में मददगार बन सकती है। शिवसेना के लिए ऐसा मौका दोबारा मिलेगा या नहीं इसलिए वह इस दौर का पूरी तरह भूनाने की तैयारी में है। शिवसेना की कमजोरी को एनसीपी ने भांप लिया है इसलिए शरद पवार ने उद्धव ठाकरे को घुटनों पर ला दिया है। कभी वह उद्धव ठाकरे को मीटिंग के लिए होटलों में बुला रहे हैं तो तो कभी दिल्ली में दस जनपथ जाकर मत्था टेकने पर मजबूर कर रहे हैं।




