Sunday, March 1, 2026
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महाराष्ट्र का पावर गेम: शिवसेना का सेक्युलर अवतार

राजनीतिक समीक्षक कह रहे हैं कि कट्टर हिन्दुवादी पार्टी शिवसेना ने सत्ता की खातिर अपने सिद्धांतों और आदर्शों की बलि चढ़ा दी है। सियासी परिस्थितियां हमेशा एक जैसी नहीं रहती। ऐसे में भविष्य में प्रतिकूल हालातों में उद्धव ठाकरे को दिन के उजाले में दीये लेकर शिवसेना के मूलभूत सिद्धांतों और आदर्शों की तलाश करनी होगी, जिसके सहारे उन्होंने अब तक का राजनीतिक सफर तय किया है। जिस हिन्दुत्व की धारा में बहकर आज शिवसेना यहां तक पहुंची है, उसे दरकिनार करने में उद्धव ठाकरे ने जरा भी वक्त नहीं लगाया। सियासी महात्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए उन्होंने भविष्य को दांव पर लगाकर वर्तमान के हितों का लाभ उठाना ज्यादा उचित समझा।

महाराष्ट्र में सियासी नाटक का पटाक्षेप हो गया है। राज्य में शिवसेना-कांग्रेस-एनसीपी की गठबंधन सरकार बनी है और उद्धव ठाकरे महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बन गये हैं। मुख्यमंत्री के शपथ ग्रहण के बाद उद्धव ठाकरे ने कहा है कि उन्होंने बाला साहब ठाकरे का सपना पूरा किया है। लेकिन राजनीतिक आलोचक उनसे पूछ रहे हैं कि बाल ठाकरे के आदर्शो और सिद्धांतों को मातोश्री से हटाकर माताश्री (सोनिया गांधी) के चरणों में गिरवी रखकर उद्धव ठाकरे ने कौन सी जंग जीत ली है।

पिछले एक महीने से चल रहे इस नाटक में मुख्यतः राजनीतिक पार्टियों में बीजेपी, शिवसेना, एनसीपी और कांग्रेस की भूमिका यादगार मानी जायेगी। लेकिन एनसीपी प्रमुख शरद पवार का कैरेक्टर सब पर भारी पड़ गया। लगभग अस्सी वर्ष का यह मराठा छत्रप मोदी-शाह की रणनीति को मात दे दिया। लेकिन, यह बेमेल तिकड़ी (शिवसेना-एनसीपी-कांग्रेस) महाराष्ट्र के लिए कितना लाभकारी साबित होगी इसके लिए वक्त का इंतजार करना होगा। महाराष्ट्र के गठबंधन सरकार के चलने पर इसलिए संशय है कि दलों के बीच विचाराधाराएं समुद्र के दो किनारों जैसी है, जिसमें मेल खाने की संभावना बहुत कम है।

हालांकि शिवसेना ने अपने सिद्धांतों और विचारधाराओं की पहले ही बलि चढ़ा दी है। फिर भी संभावना शिवसेना समर्थकों को लेकर ही व्यक्त की जा रही है कि कहीं शिवसैनिक पार्टी विरोधी मुहिम न चला दें। क्योंकि हिन्दुत्व समर्थकों का अब शिवसेना से मोहभंग होने लगा है। बाला साहब ठाकरे के आदर्शो पर चलने वाले शिवसेना के फायर ब्रांड नेता अरूण पाठक उद्धव ठाकरे के व्यवहार से इतने आहत हुए कि उन्होंने विश्व हिन्दू सेना का गठन कर अलग रास्ता अख्तियार कर लिया। जबकि रमेश सोलंकी ने शिवसेना की आईटी सेल से इसलिए रिजाइन दे दिया क्योंकि वह एनसीपी और कांग्रेस की तारीफ करने में खुद को असहज महसूस कर रह रहे थे। करीब दो दशक पहले बाल ठाकरे के आदर्शो से प्रभावित होकर उन्होंने शिवसेना ज्वाइन की थी। लेकिन पार्टी से इस्तीफा देने के बाद उन्होंने मीडिया को बताया कि बाल ठाकरे ने ताउम्र हिन्दुत्व की बात करते थे। लेकिन आज शिवसेना से उस पार्टी के साथ मिलकर गठबंधन सरकार बनायी है जो हिन्दुत्व विरोधी है।

इससे पहले भी कई राज्यों में बेमेल सरकारें में बनी है लेकिन उक्त सरकारें राज्य के हितों से ज्यादा निहित स्वार्थों में लिप्त पायी गई है। महराष्ट्र की बात करें तों एक पार्टी कट्टर हिन्दुत्व की पक्षधर रही है ( भले ही आज वह इससे पिंड छुड़ाने की कोशिश करे) तो वहीं दूसरी पार्टी (कांग्रेस) कथित धर्मनिरपेक्षता का चोला तमाम प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद नहीं उतार पायी है। जबकि इसमें तीसरा घटक (एनसीपी) जिसका एजेंडा आज तक किसी को समझ नहीं आया। यह दल परिस्थितियों के अनुकूल अपना चोला और एजेंडा बदलता रहा है। इसलिए मौकापरस्त राजनीति का यह बेजोड़ उदाहरण है जिसमें तीन अलग-अलग विचारधाराओं की त्रिवेणी को एक घड़ा में समाहित होते देखा जा रहा है।

पिछले तीन दशकों की राजनीति में शिवसेना ने अपने एजेंडे के साथ कभी समझौता नहीं किया था। लेकिन इस बार उद्धव ठाकरे ने जो किया है कि उसपर कहा जा रहा है कि इसकी कीमत शिवसेना को भविष्य में चुकानी पड़ सकती है।
बहरहाल, महाराष्ट्र में जो कुछ भी हुआ है और आगे होने वाला है वह एनसीपी और कांग्रेस के लिए फायदेमंद हैै। जबकि राजनीतिक समीक्षक इसे शिवसेना के हित में उचित नहीं ठहरा रहे हैं। पार्टी के अंदर से ही अब यह आवाज मुखर होने लगी है कि उद्धव ठाकरे ने अपनी महात्वाकांक्षा को पूरा करने के लिए पार्टी को भविष्य में होने वाले नफा और नुकसान को नजरअंदाज किया है।

शपथ ग्रहण के बाद जब उद्धव ठाकरे से एक पत्रकार ने सेक्युलर पर सवाल किया तो वह असहज हो गये और उक्त पत्रकार पर भड़क गये। बता दें कि 2015 में शिवसेना के सांसद संजय राउत ने संविधान की प्रस्तावना से सेक्युलर और समाजवाद शब्द को हटाने की वकालत की थी। संजय राउत का मानना था कि भारत एक हिन्दू राष्ट्र है और यहां धर्मनिरपेक्षता और समाजवाद की कोई जगह नहीं होनी चाहिए।

एक राष्ट्रीय पार्टी अगर अपना एजेंडा राज्य के सियासी परिस्थितियों के अनुकूल बदलती रहती है तो पार्टी की सेहत पर ज्यादा फर्क नहीं पड़ता है। लेकिन शिवसेना एक क्षेत्रीय पार्टी है और पार्टी का एजेंडा, चरित्र और सिद्धांत से वहां के लोग पूरी तरह अवगत हैं। इसलिए शिवसेना के वह कार्यकर्ता और नेता जिनकी पहचान एक शिवसैनिक और कट्टर हिन्दुत्व समर्थक के रूप में रही है वह इस बेमेल तिकड़ी में खुद को असहज महसूस कर रहे हैं।

जब मुख्यमंत्री पद के लिए शिवसेना ने बीजेपी से गठबंधन तोड़कर एनसीपी-कांग्रेस की ओर रूख किया उसी दिन यह स्पष्ट हो गया था कि शिवसेना को मुख्यमंत्री पद के सिवाय और कुछ नहीं चाहिए। एनसीपी प्रमुख शरद पवार ने भी मौके का भरपूर लाभ उठाया और शिवसेना को अपनी कोर एजेंडे को छोड़ने पर मजबूर कर दिया। कोर एजेंडा मतलब कट्टर हिन्दुत्व की विचारधारा से पूरी तरह अलग होकर शिवसेना की पहचान अब सेकुलर के तौर पर होनी चाहिए। एनसीपी प्रमुख शरद पवार शिवसेना प्रमुख को जिस तरह नचाते गये उसे पूरा देश देख रहा था और उद्धव ठाकरे के सामने इसके सिवाय कोई विकल्प नहीं था।

पिछले एक महीने से चले इस सियासी नाटक में शिवसेना का जितना चरित्र हनन हुआ है, एक गैरतमंद राजनीतिज्ञ शर्म से पानी-पानी हो जायेगा। लेकिन उद्धव ठाकरे को इससे कोई फर्क नहीं पड़ा है। वह इसे अपनी बड़ी जीत मान रहे हैं। लेकिन सियासत से इत्तर यह इनकी बड़ी हार मानी जा रही है।

कहना यह उचित होगा कि इस गठबंधन का रिमोट कंट्रोल शरद पवार के हाथ में हैं। इस मराठा छत्रप ने भविष्य की रणनीति के तहत महाराष्ट्र की राजनीति से शिवसेना के अंत की शुरूआत कर दी है। परिणाम सामने आने में समय लगेंगे। एनसीपी ने महाराष्ट्र की राजनीति में अपना विस्तार करने के लिए एक ऐसी सधी चाल चली है जिसका अंदाजा सत्ता के मद में चूर उद्धव ठाकरे को नहीं हुआ। आगे-आगे देखते जाइये, अभी तो सिर्फ ट्रेलर शुरू हुआ है।

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